
आज का समय जब मुख्यधारा मीडिया में सवर्ण समाज का दबदबा है और वंचित, दलित, आदिवासी तथा बहुजन वर्ग की सच्ची आवाज़ उठाने में किसी को खास रुचि नहीं दिखती, उसी दौर में The Mooknayak जैसे एक छोटे से डिजिटल प्लेटफॉर्म ने सच्ची पत्रकारिता के दम पर देश के कोने-कोने में अपना प्रभाव जमाया है। पत्रकार मीना कोटवाल द्वारा 2021 में शुरू किया गया यह माध्यम, जहां बड़े मीडिया हाउस अनदेखी कर देते हैं, वहाँ उन छोटी-छोटी लेकिन गहरी पीड़ा वाली खबरों को आवाज़ देता है।
जातिगत अत्याचार, सरकारी योजनाओं में भेदभाव, शिक्षा-स्वास्थ्य में असमानता और रोज़मर्रा के अन्याय- मूकनायक टीम ने सभी मुद्दों को पूरे दम के साथ उठाया है. सीमित संसाधनों, क्राउडफंडिंग और अटूट प्रतिबद्धता के सहारे यह प्लेटफॉर्म न केवल उन कहानियों को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाता है, बल्कि कई बार प्रशासन को कार्रवाई के लिए मजबूर करता है, FIR दर्ज करवाता है और नीतियों में बदलाव लाता है। यह साबित करता है कि जब सवर्ण-प्रधान मीडिया चुप रहता है, तब एक छोटा लेकिन साहसी माध्यम भी वंचितों की बुलंद आवाज़ बन सकता है और समाज में असली बदलाव ला सकता है।
यह सफर आसान नहीं था, लेकिन आपका भरोसा हमारी ताकत बना। इन 5 सालों में द मूकनायक टीम ने कई ऐसी ग्राउंड रिपोर्ट्स कीं, जिन्हें न केवल लाखों पाठकों ने सराहा, बल्कि उन्होंने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी छाप छोड़ी। आज 'द मूकनायक' अपनी स्थापना का एक और वर्ष पूरा कर रहा है।
The Mooknayak की शुरुआत 2021 में मीना कोटवाल द्वारा की गई, जो एक ऐसे वर्ग से आती हैं जो आज भी हाशिये पर है. 31 जनवरी, 2021 एक ऐतिहासिक दिन बना क्योंकि आज के ही दिन डॉ भीमराव आम्बेडकर ने मूकनायक नाम की पाक्षिक समाचार पत्र की शुरुआत की. यह पत्र हाशिये पर खड़े समाज की आवाज़ बना. मुख्यधारा से नदारद उनके मुद्दों को मूकनायक के ज़रिये सामने लाया गया. लेकिन कुछ कारणों की वजह से बहुत कम समय में ही इसे बंद करना पड़ा. इसी दिन मीना कोटवाल ने भी द मूकनायक की शुरुआत की, ये पूरी तरह डिजिटल है और ये भी डॉ आम्बेडकर के उसी कारवां को आगे बढ़ा रहा है जो उन्हें बीच में ही छोड़ना पड़ा था.
द मूकनायक को आज पाँच साल (2021-2026) हो गए हैं. हिंदी में शुरू किया गया ये प्लेटफ़ॉर्म आज कई भाषाओं (हिंदी, इंग्लिश, मराठी) में हैं. इसके काम को कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया जैसे न्यू यॉर्क टाइम्स, ल फिगारो, वॉइस ऑफ अमेरीका, DW, अलजज़ीरा, अरब न्यूज़, ख़लीज़ टाइम्स आदि में जगह मिली. इसके काम और टीम की डायवर्सिटी के कारण ऑक्सफैम-न्यूज़लॉन्ड्री जैसे रिसर्च रिपोर्ट में पहली बार पाया कि देश की मीडिया में डायवर्सिटी द मूकनायक जैसे मीडिया संस्थान में देखी गई है.
कम संसाधनों और एक छोटी सी टीम के साथ द मूकनायक ने वो काम कर दिखाया जो आजतक की मुख्यधारा की संपन्न मीडिया भी नहीं कर पाई. इनकी रिपोर्ट्स की वजह से कई लोगों को न्याय मिला. द मूकनायक दलित, आदिवासी, महिला, पसमांदा मुस्लिम, क्वीर आदि हाशिये पर खड़े समाज की ख़बरों को प्रमुखता से न केवल जगह देता है बल्कि सामाजिक न्याय के लिए लड़ता भी है.
बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के बहादुरपुर गांव में सरभंग जाति (दलितों की उपजाति) से आने वाली प्रभा देवी अपने नौ बच्चों के साथ एक किराए की जमीन पर प्लास्टिक के टेंट में रहती हैं, जो बारिश में भीग जाता है और टूट-फूट रहा है। उनके पास आधार कार्ड, वोटर आईडी, राशन कार्ड या बैंक खाता जैसा कोई आधिकारिक दस्तावेज नहीं है, जिसके कारण बच्चे स्कूल में दाखिला नहीं ले पाते, सरकारी योजनाओं से वंचित रहते हैं और कोविड-19 के दौरान टीकाकरण भी नहीं हो सका क्योंकि टीम ने आधार मांगा था। पति नेपाल से आता है, शराब पीकर मारपीट करता है और चला जाता है, इसलिए प्रभा देवी और पूरा परिवार जीविका के लिए भीख मांगने पर मजबूर है; बच्चे भूखे रहते हैं, इलाज के पैसे नहीं होते और दैनिक जीवन बेहद दयनीय है। मार्च 2022 में The Mooknayak की रिपोर्ट के बाद जिला प्रशासन, बीडीओ और स्थानीय अधिकारी सक्रिय हुए: दस्तावेज बनाने, राशन कार्ड जारी करने, एमएनआरईजीए में रोजगार, स्कूल में भोजनमाता की नौकरी और बच्चों के आंगनवाड़ी पंजीकरण का आश्वासन दिया गया, जिससे परिवार को मुख्यधारा में शामिल करने की उम्मीद जगी।
2022 में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा राज्य अनुसूचित जाति वित्त विकास निगम को 38 करोड़ का फंड दिया गया है। इस मामले को लेकर लगातार द मूकनायक ने अनुसूचित जाति वित्त विकास निगम में स्वीकृत राशि का आवंटन नहीं किए जाने की खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। जिसके बाद सरकार ने इस मामले में संज्ञान लिया और स्वीकृत राशि का आवंटन कर दिया गया। SC-ST वर्ग के लिए एमपी सरकार की योजनाएं जिनमें लोन देने का प्रावधान था, जिसका बजट अटका था, द मूकनायक की लगातार सीरीज के बाद वह फंड रिलीज हो गया।
मणिपुर हिंसा 2023 : वो सच जो दुनिया ने देखा. जब मुख्यधारा का मीडिया खामोश था, तब 'द मूकनायक' ने मणिपुर के ज्वलंत हालातों की ग्राउंड जीरो से रिपोर्टिंग की। ऐसे समय जब हिंसा पूरी तरह थमी नहीं थी, पग पग पर जान का खतरा जानते हुए भी द मूकनायक के दो युवा पत्रकार राजन चौधरी और सत्यप्रकाश भारती ने ग्राउंड पर जाकर ऐसी ऐसी रिपोर्ट्स दुनिया के सामने रखी जिसपर में मेनस्ट्रीम में कोई चर्चा नहीं थी। रिलीफ कैम्पों में रह रहे कुकी जो समुदाय का दर्द इस तरह दुनिया के सामने रखा कि पाठकों के दिल पिघल गये.
कुकी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित राहत शिविरों में कैंसर, लिवर और चिकनपॉक्स जैसी बीमारियों से आईडीपी (आंतरिक रूप से विस्थापित लोग) जूझ रहे थे, प्राइवेट हॉस्पिटल में दवा कराने के लिए पैसे नहीं थे और हिंसा के बाद लोगों के पास काम नहीं था- इन सब पहलुओं को समेटकर द मूकनायक की रिपोर्ट्स ने मणिपुर की हिंसा के व्यापक प्रभाव पर एक मार्मिक तस्वीर दुनिया के सामने पेश की.
द मूकनायक के पत्रकार राजन चौधरी द्वारा लिखित पुस्तक 'Manipur On Fire' और हमारी विशेष रिपोर्ट्स ने हिंसा की उन परतों को खोला जो छिपी हुई थीं। हमारी इस रिपोर्टिंग को न केवल देश में पढ़ा गया, बल्कि International Journal of Research Publication and Reviews और Journal of Contemporary Asia जैसे प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर साक्ष्य (Evidence) के रूप में उद्धृत किया गया। यह द मूकनायक की निष्पक्ष पत्रकारिता की सबसे बड़ी जीत है।
IIM बैंगलोर में दलित प्रोफेसर गोपाल दास के साथ जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न पर 2024 में मूकनायक की ख़बरों की series पब्लिश होने के बाद FIR हुई . एसोसिएट प्रोफेसर का व्यवस्थागत अपमान, प्रमोशन रोकने और अवसरों से वंचित करने की सीरीज मूकनायक में प्रकाशित हुई। DCRE जांच रिपोर्ट के आधार पर खबर ने दबाव बनाया, दिसंबर 2024 में बेंगलुरु पुलिस ने IIM डायरेक्टर और 7 फैकल्टी सदस्यों (एक महिला प्रोफेसर सहित) के खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत FIR दर्ज की जो IIMs के इतिहास में sitting director पर ऐसा पहला FIR का केस है।
लिव इन रिलेशनशिप में दलित महिला से जन्मी बेटी को जबलपुर के जैन समाज द्वारा संचालित विद्यालय में एडमिशन देने से मना किया जा रहा है. अप्रैल 2024 में द मूकनायक में यह खबर सामने आने के बाद राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग एवं राज्य बाल संरक्षण आयोग ने कार्रवाई शुरू की है। राज्य अनुसूचित जाति आयोग ने जबलपुर कलेक्टर को पत्र भेजकर कहा कि सुनीता आर्या की बेटी का एडमिशन स्कूल में करवाकर उनके साथ किये गए जातिगत भेदभाव और मानसिक प्रताड़ना पर स्कूल के जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही कर जांच प्रतिवेदन भेजें।
द मूकनायक द्वारा 5 फरवरी 2025 को प्रकाशित एक रिपोर्ट "SC-ST के लिए नौकरियों में नया अड़ंगा! BHEL के बाद अब RITES पर उठे सवाल: कैसे हो रही बहुजन अधिकारों की अनदेखी?" प्रकाशित होने के बाद, कंपनी ने घोषणा की है कि SC/ST और Persons with Benchmark Disabilities (PwBD) उम्मीदवारों से लिया गया आवेदन शुल्क उन लोगों को वापस कर दिया जाएगा जो लिखित परीक्षा या साक्षात्कार में उपस्थित होंगे। Rites ने यह भी आश्वासन दिया कि इस संबंध में शीघ्र ही एक शुद्धि पत्र (corrigendum) जारी किया जाएगा।
तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर में ईरुला (Irula) आदिवासी परिवारों केआवास संकट की कहानी The Mooknayak ने कई रिपोर्ट्स के माध्यम से उजागर की, जहां PVTG (Particularly Vulnerable Tribal Group) की इस जनजाति के 85 से अधिक परिवार 1000 दिनों से अधिक समय तक अधूरे वादों और टूटी झोपड़ियों में बिना बिजली, पानी और बुनियादी सुविधाओं के रहने को मजबूर थे। The Mooknayak की लगातार कवरेज के बाद जिला ग्रामीण विकास एजेंसी के प्रोजेक्ट डायरेक्टर ने हस्तक्षेप किया, निर्माण कार्य शुरू हुआ; TAHDCO ने साल के अंत तक घर देने का आश्वासन दिया, और Neelam Cultural Centre जैसी संस्थाओं ने सहायता प्रदान की। जिला कलेक्टर की यात्रा और प्रशासनिक कार्रवाई से परिवारों में उम्मीद जगी, उनकी लंबित मांगें पूरी होने की दिशा में ठोस कदम उठे।
नवंबर 2024 में इडुक्की के St. Benedicts L.P. School में 6 साल के दलित बच्चे प्रणव सिजॉय को शिक्षिका द्वारा क्लासमेट की उल्टी साफ करने के लिए जबरदस्ती करने की घटना उजागर। मां प्रियंका सोमन की शिकायत पर The Mooknayak की रिपोर्ट्स ने राष्ट्रीय ध्यान खींचा, NCPCR ने संज्ञान लिया और इडुक्की कलेक्टर से 7 दिनों में एक्शन टेकन रिपोर्ट मांगी। बच्चा ट्रॉमा के कारण स्कूल छोड़कर सरकारी स्कूल में ट्रांसफर हो गया, मामले में जांच और न्याय की प्रक्रिया चली।
द मूकनायक की कई खबरें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय लेवल पर पाठकों का ध्यान खींचने में सफल हुई. भारत में एससी/एसटी अत्याचार अधिनियम में बौद्धिक संपदा (intellectual property) की क्षति के लिए मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं था। लेकिन 2025 में एक दलित दंपति डॉ. क्षिप्रा कमलेश उके और डॉ. शिव शंकर दास की थी जिन्होंने न्यायपालिका को बौद्धिक संपदा को किसी भी चल संपत्ति की तरह मूल्यवान संपत्ति के रूप में मान्यता देते हुए इसे अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मुआवजे योग्य मानने के लिए मजबूर करके इतिहास रच दिया है।
इस खबर को द मूकनायक ने पहली बार ब्रेक की जिसके बाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में यह रिपोर्ट छा गई और सभी बड़े मीडिया हाउसेस ने इसका फॉलो अप लगाया।
मध्य प्रदेश पावर जेनरेटिंग कंपनी लिमिटेड के अंतर्गत उमरिया के बिरसिंहपुर में स्थित संजय गांधी थर्मल पावर स्टेशन के प्रशासनिक भवन के वीडियो कॉन्फ्रेंस रूम से बाबासाहेब की सम्मानित तस्वीर अचानक हटा दिए जाने से एससी-एसटी समुदाय के कर्मचारियों में गहरा आक्रोश फैला हुआ था। द मूकनायक द्वारा इस बारे में 16 नवम्बर 2025 को समाचार प्रकाशित किया गया था और जिम्मेदार अधिकारी से संविधान के शिल्पकार बाबा साहब अम्बेडकर के चित्र को हटाए जाने की वजह पूछी गई थी, हालाँकि अधिकारी की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया लेकिन 19 नवम्बर को कार्यालय गए कर्मचारियों ने बाबा साहब की तस्वीर को वापस वापस उसी जगह पर लगे हुए पाया।
जनवरी 2026 में द मूकनायक की एक खबर का इतना दमदार असर हुआ कि एक कलेक्टर का तबादला ही हो गया. आनंदपुर धाम ट्रस्ट से जुड़े कथित सेक्स स्कैंडल और मनी लॉन्ड्रिंग के गंभीर खुलासों के बाद महज 48 घंटे के भीतर मध्यप्रदेश सरकार ने अशोकनगर कलेक्टर आदित्य सिंह को उनके पद से हटा दिया। यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई जब प्रदेश में निर्वाचन की प्रक्रिया चल रही है और सामान्य परिस्थितियों में स्थानांतरण पर रोक रहती है। इसी कारण सरकार को कलेक्टर को हटाने से पहले निर्वाचन आयोग से विशेष अनुमति लेनी पड़ी। आदित्य सिंह को को भोपाल गैस राहत विभाग का संचालक बनाया गया है।
यह पूरा घटनाक्रम तब तेज़ हुआ जब द मूकनायक ने आनंदपुर धाम को लेकर एक विस्तृत इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट प्रकाशित की। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि आश्रम परिसर के भीतर कर्मचारियों और सेवक-सेविकाओं के साथ लंबे समय से दैहिक शोषण किया जा रहा है। रिपोर्ट सामने आते ही कांग्रेस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की, प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हड़कंप मच गया और आनन-फानन में कलेक्टर पर कार्रवाई की गई।
The Mooknayak की इन 5 वर्षों की यात्रा में सैकड़ों ऐसी खबरें प्रकाशित हुई हैं, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लाखों पाठकों तक पहुंचीं और कई लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाईं। जहां बड़े मीडिया हाउस इन कहानियों को 'न्यूज़ वैल्यू' न मानकर अनदेखा कर देते हैं, वहीं The Mooknayak ने उन छोटी-छोटी लेकिन गहरी पीड़ा वाली घटनाओं को उजागर किया। ऐसी कई रिपोर्ट्स ने सोए हुए प्रशासन को जगाया, पीड़ितों को तत्काल राहत दिलाई, नीतियां बदलीं और न्याय की प्रक्रिया शुरू की, साबित करते हुए कि सच्ची पत्रकारिता से एक छोटा माध्यम भी बड़े बदलाव ला सकता है।
द मूकनायक टीम के साथी अंकित पचौरी ने अपनी पुस्तक ‘आदिवासी रिपोर्टिंग’ में आदिवासी समाज के जीवन, संघर्ष, संस्कृति और समस्याओं को जमीनी स्तर से सामने रखा है। किताब में शिक्षा, स्वास्थ्य, जंगल-जमीन, विस्थापन, रोजगार और पहचान जैसे मुद्दों पर आधारित रिपोर्टिंग शामिल है। यह किताब उन आवाज़ों का दस्तावेज़ है जो अक्सर मुख्यधारा की मीडिया में जगह नहीं पा पातीं।
वंचित तबके, दलित, आदिवासी, महिला, ट्रांसजेंडर , माइनोरिटी राइट्स आदि के मुद्दे पर लगातार रिपोर्ट्स का यह सिलसिला कायम रहेगा, बाबा साहब डॉ. बी.आर. आंबेडकर का यह कारवां जारी रहेगा जिन्होंने 1920 में 'मूकनायक' शुरू कर मूक को मुखर बनाया था, आज The Mooknayak उसी विरासत को आगे बढ़ा रहा है। वंचितों की आवाज दब नहीं सकती, अन्याय के खिलाफ लड़ाई थम नहीं सकती।
The Mooknayak : मूक से मुखर की यात्रा, न्याय की लड़ाई जारी! जय भीम! जय संविधान!
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