दिल्ली: 6 साल की बच्ची के साथ गैंगरेप के दोषी 10 से 16 के बच्चे, मां ने कहा 'विक्टिम बनकर नहीं रहेगी बेटी'

द मूकनायक ग्राउंड रिपोर्ट: दिल्ली के भजनपुरा में एक 6 साल की बच्ची के साथ हुई दरिंदगी के बाद उसके घर का आंखों देखा हाल। पढ़िए, उस एक कमरे में सिमटे परिवार के दर्द, सिस्टम से उनकी लड़ाई और 2023 के डराने वाले आंकड़ों की कहानी।
Mother of the survivor
पीड़िता की माँ फोटो साभार- आकृति धवन
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चेतावनी (Trigger Warning): इस रिपोर्ट में यौन हिंसा और अपराध का विवरण है, जो कुछ पाठकों को विचलित कर सकता है।

पीड़ित बच्ची के पिता कुछ कदम आगे चलते हुए मुझे मुख्य सड़क से हटाकर उत्तर-पूर्वी दिल्ली के भजनपुरा इलाके की एक संकरी गली में ले जाते हैं। गली इतनी संकरी है कि दो लोग मुश्किल से गुजर सकें। यहां चार एक-कमरे वाले मकान कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं। जीवन इतने तंग जगहों में सिमटा हुआ है कि गोपनीयता (Privacy) ही यहां के लिए एक लग्जरी है और पड़ोसी हर चीज के गवाह।

वह एक कमरे के सामने रुकते हैं। अंदर, ज्यादातर जगह पर एक बड़े बिस्तर ने कब्जा जमा रखा है। एक छोर पर सिलाई मशीन, दूसरे पर छोटा चूल्हा। कोने में, एक चटाई के पास पिल्ला सोया हुआ है।

1 month old puppy at the survivor's residence
पीड़िता घर में 1 महीने के पिल्लै के साथ खेलती हुई.फोटो साभार- आकृति धवन

यहीं 6 साल की मासूम बच्ची अपने परिवार के साथ रहती है। यहीं मैं उससे मिलती हूं।

वह मुस्कुरा रही है, बेखबर...

सबसे पहले मुझे उसकी मुस्कान दिखती है। वह अपनी मां की गोद में लिपटी हुई है, चेहरा खुला, आंखें चमकदार। वह मुझे हाथ हिलाती है—ऐसी गर्मजोशी से जो मुझे निरुत्तर कर देती है। डर का कोई निशान नहीं। बस एक बच्ची अजनबी को अभिवादन कर रही है, यह जाने बिना कि इतने सारे लोग अचानक 'उसके होने' में क्यों दिलचस्पी लेने लगे हैं।

लेकिन कमरे का माहौल अलग है। दरवाजे पर महिलाओं का झुंड है। "वही है?", "वो बच्ची?", "कहां हैं लड़के?"—चिंता, गुस्सा और जल्दबाजी एक साथ कमरे में भर जाती है।

परिवार में छह सदस्य हैं, लेकिन खामोशी भारी है। बड़ी बहन चुपचाप दूध उबाल रही है, कोई उसकी ओर नहीं देखता। 6 साल की बच्ची अभी भी अपने छोटे भाई के साथ फोन पर खेल रही है, उसे नहीं पता कि वह ही वजह है कि कमरा अजनबियों से भरा है।

Survivor playing with her puppy, Birju
पीड़िता के घर का कमराफोटो साभार- आकृति धवन

"पैरों तक खून था... मेरी बेटी बेहोश थी"

जब महिलाएं चली जाती हैं, मां अपनी शाल सीधी करती है। उसकी आंखों में डर और संकल्प दोनों हैं। जैसे ही मैं सवाल पूछती हूं, वह उस 'काली शाम' को दोहराने लगती है। वह कहती है:

लगभग 7 बजे की बात है..., मेरी बेटी घर लौटी... गीली, गंदी... और फिर बेहोश हो गई। जब हमने चेक किया, तो खून था। पैरों तक खून था।

बच्ची को शाल में लपेटकर परिवार पुलिस स्टेशन और फिर अस्पताल भागा। मेडिकल जांच, पुलिस सत्यापन—वो सारी प्रक्रियाएं जो कोई माता-पिता कभी सुनना नहीं चाहते। जैसे वह बोलती है, उसके गाल पर आंसू लुढ़कते हैं, लेकिन वह उन्हें पोंछती नहीं।

आंकड़े जो डराते हैं: हर दिन 2 बच्चियां शिकार

मां का यह दर्द सिर्फ इस एक कमरे तक सीमित नहीं है। 2023 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में कम से कम 849 लड़कियों (18 साल से कम) के साथ बलात्कार के मामले दर्ज हुए। यानी हर दिन दो से ज्यादा बच्चियां शिकार हुईं।

कुल मिलाकर, 2023 में महिलाओं के खिलाफ 4,48,211 अपराध दर्ज हुए। 29,670 बलात्कार के मामले थे। ये सिर्फ आंकड़े नहीं, ये वो जिंदगियां हैं जो हमेशा के लिए बदल गईं।

Dr. Gouri Kumra, Gynac
कोलकाता की गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. गौरी कुमराफोटो साभार- आकृति धवन

शरीर और मन पर गहरे घाव

इस उम्र में यौन उत्पीड़न के असर को समझने के लिए हमने कोलकाता की गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. गौरी कुमरा से बात की। उनकी चिंता गंभीर है। वह बताती हैं:

सर्वाइकल कैंसर की वैक्सीन जल्द से जल्द लगवानी चाहिए। एचआईवी और एसटीडी की जांच जरूरी है। समय से पहले यौन और हार्मोनल गड़बड़ी की संभावना बनी रहती है।

डॉ. कुमरा कहती हैं, "बार-बार पूछताछ और मीडिया की चकाचौंध ट्रॉमा को बढ़ाती है। ऐसी बच्चियों की मेंटल हेल्थ को प्राथमिकता देनी होगी।"

"भाई के दोस्त ही निकले दरिंदे"

इंटरव्यू के दौरान मां का गुस्सा तब फूट पड़ता है जब वह आरोपियों के बारे में बताती है। आरोपी कोई अजनबी नहीं, बल्कि परिवार के जानने वाले थे—उसके बड़े बेटे के दोस्त, जिसकी कुछ महीने पहले मौत हो चुकी है।

दो आरोपी (नाबालिग) गिरफ्तार हो चुके हैं, तीसरा फरार है। पुलिस के अनुसार आरोपी 10 से 16 साल के बीच हैं। मां कहती हैं, "अगर न्याय नहीं मिला तो मैं खुद उन्हें मार डालूंगी।"

Pallavi Garg, Criminal Lawyer at Delhi High Court
दिल्ली हाई कोर्ट की क्रिमिनल लॉयर पल्लवी गर्ग फोटो साभार- आकृति धवन

दिल्ली हाई कोर्ट की क्रिमिनल लॉयर पल्लवी गर्ग चेतावनी देती हैं कि ऐसे मामलों में मीडिया और समाज को संवेदनशीलता बरतनी चाहिए। उन्होंने कहा, "बच्ची की पहचान उजागर करना गैरकानूनी है। जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत फोकस सुधार (rehabilitation) पर होता है, लेकिन पीड़ित परिवार के लिए यह समझना मुश्किल है।"

"वह पीड़ित बनकर नहीं रहेगी"

जैसे ही इंटरव्यू खत्म होता है, मां फिर रो पड़ती है—लेकिन उसका इरादा पक्का है।

वह कहती है:

यह मेरी बेटी को नहीं रोकेगा। वह स्कूल जाएगी। खेलेगी। सामान्य जिंदगी जिएगी। वह 'विक्टिम' बनकर नहीं रहेगी।

पीछे, 6 साल की बच्ची अब भी हंस रही है। पिल्ला जाग चुका है। एक कमरे के उस घर में, जहां अभाव हर कोने में है, वहां एक मां अपनी बेटी का बचपन वापस लाने की जंग लड़ रही है।

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