IIM Bangalore में जातिवाद: दलित प्रोफेसर का प्रमोशन 2022 से अटका, जातिगत भेदभाव के आरोपी सहकर्मी को पेंडिंग FIR के बावजूद प्रमोशन!

FIR में नामजद प्रोफेसर आशीष मिश्रा (मार्केटिंग क्षेत्र से ही) को हाल ही में फुल प्रोफेसर पद पर प्रमोट कर दिया गया है जबकि प्रोफेसर गोपाल दास की प्रमोशन जांच के बहाने 2022 से अटकी हुई है। यह दोहरा मापदंड स्पष्ट रूप से समानता के संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत है।
आरोपियों पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2014 और भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धाराओं के तहत गंभीर आरोप हैं।
आरोपियों पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2014 और भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धाराओं के तहत गंभीर आरोप हैं।
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बेंगलुरू- देश में उच्च शिक्षण संस्थान किस तरह से मनुवादी सोच से ग्रस्त है, इसका हालिया उदाहरण आईआईएम बेंगलुरू में सामने आया है। यहां जातिगत भेदभाव का शिकार हुए एक दलित प्रोफेसर की प्रोन्नति 2022 से अटकी हुई है, जबकि उनके साथ जातिगत भेदभाव करने के मामले में आरोपी 8 प्रोफेसरों में से एक की प्रोन्नति कर दी गई है। नियमों के अनुसार, लंबित जांच के दौरान प्रोन्नति नहीं दी जा सकती मगर ज़ाहिर है, ये नियम सिर्फ वंचित वर्ग के कमियों पर सख्ती से लागू होते हैं, सवर्ण और प्रभावशाली समूहों से जुड़े कर्मचारियों के मामलों में नियमों को दरकिनार कर दिया जाता है।

मामला एसोसिएट प्रोफेसर गोपाल दास का है, जो अनुसूचित जाति (SC) से हैं और मार्केटिंग क्षेत्र में पढ़ाते हैं। 2022 से उनकी प्रमोशन रोक दी गई है। प्रशासन का दावा है कि छात्रों की ओर से लगाए गए उत्पीड़न के आरोपों की जांच चल रही है, इसलिए प्रमोशन नहीं हो सकती। लेकिन प्रोफेसर दास का आरोप है कि यह सब जातिगत भेदभाव का नतीजा है। उन्होंने सार्वजनिक अपमान, कमेटियों से बाहर रखना, संसाधनों तक पहुंच में बाधा और समान अवसरों से वंचित करने जैसी घटनाओं का जिक्र किया।

ये आरोप जनवरी 2024 में तब सुर्खियों में आए, जब प्रोफेसर दास ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की IIMB यात्रा के दौरान उन्हें पत्र लिखा और व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की। राष्ट्रपति के निर्देश पर कर्नाटक के डायरेक्टोरेट ऑफ सिविल राइट्स एनफोर्समेंट (DCRE) ने जांच की। जांच रिपोर्ट में प्रथम दृष्टया जातिगत उत्पीड़न, अपमान और समान अवसरों से वंचित करने के सबूत मिले। DCRE ने SC/ST (एट्रोसिटीज़ प्रिवेंशन) एक्ट के तहत आपराधिक कार्रवाई की सिफारिश की।

आरोपियों पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2014 और भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धाराओं के तहत गंभीर आरोप हैं।
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इसके आधार पर दिसंबर 2024 में बेंगलुरु के माइको लेआउट पुलिस स्टेशन में FIR नंबर 0467/2024 दर्ज हुई। इसमें IIMB के डायरेक्टर डॉ. ऋषिकेश टी. कृष्णन, डीन (फैकल्टी) डॉ. दिनेश कुमार और अन्य प्रोफेसर डॉ. शैनेश जी, डॉ. श्रीनिवास प्रख्या, डॉ. चेतन सुब्रमण्यम, डॉ. आशीष मिश्रा, डॉ. श्रीलता जोन्नलगेड्डा और डॉ. राहुल दे को आरोपी बनाया गया। आरोप SC/ST एक्ट और भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत जातिगत अत्याचार और व्यवस्थित भेदभाव के हैं। मामला कोर्ट में लंबित है (क्रिमिनल केस नंबर 14410/2024), और कुछ आरोपियों के खिलाफ जांच को कर्नाटक हाई कोर्ट ने दिसंबर 2024 के अंत में स्टे दिया।

फिर भी सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इसी FIR में नामजद प्रोफेसर आशीष मिश्रा (मार्केटिंग क्षेत्र से ही) को हाल ही में फुल प्रोफेसर पद पर प्रमोट कर दिया गया है जबकि प्रोफेसर गोपाल दास की प्रमोशन जांच के बहाने 2022 से अटकी हुई है। यह दोहरा मापदंड स्पष्ट रूप से समानता के संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत है।

इस मामले को लेकर डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर नेशनल एसोसिएशन ऑफ इंजीनियर्स (BANAE) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नागसेन सोनारे ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक विस्तृत प्रतिनिधित्व भेजा है, जिसमें इस असमानता पर गंभीर ध्यान आकर्षित किया गया है। द मूकनायक से बातचीत में सोनारे ने कहा, "IIM बैंगलोर जैसे संस्थान IIM एक्ट (संशोधित), भारत सरकार की आरक्षण एवं प्रमोशन नीतियों तथा संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 17 से बंधे हैं।"

उन्होंने जोर देकर कहा कि यह प्रतिनिधित्व किसी व्यक्तिगत विवाद का फैसला नहीं मांगता और न ही अदालत में लंबित मामले पर टिप्पणी करता है। सोनारे ने आगे कहा, "यह केवल विनम्र अनुरोध है कि प्रमोशन नियमों में दिख रही यह स्पष्ट असमानता और जातिगत भेदभाव के खिलाफ संस्थागत सुरक्षा की पर्याप्तता की जांच सक्षम संवैधानिक या वैधानिक प्राधिकरण द्वारा मौजूदा रिकॉर्ड्स के आधार पर की जाए।" यह विवाद भारत की एक प्रमुख मैनेजमेंट संस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और वास्तविक समानता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

आरोपियों पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2014 और भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धाराओं के तहत गंभीर आरोप हैं।
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