TM Exclusive | राजस्थान में जाति पंचायतों के सामाजिक बहिष्कार पर हाईकोर्ट के आदेश के 6 महीने बाद भी कोई एक्शन नहीं; अब कानून मंत्री को देना होगा जवाब!

सामाजिक बहिष्कार पर राजस्थान हाईकोर्ट के 10 अप्रैल के ऐतिहासिक फैसले के बाद राज्य सरकार द्वारा अभी तक न नोडल अधिकारी, न राज्य-स्तरीय दफ्तर, न नीति, न SOP ही बनाए जाने की कोई जानकारी है। राजस्थान सामाजिक बहिष्कार रोकथाम अभियान ने संसदीय कार्य एवं विधि मंत्री जोगाराम पटेल को भेजे पत्र में हाईकोर्ट के निर्देशों पर अब तक हुई कार्रवाई का 15 दिनों में ब्योरा मांगा है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने 10 अप्रैल 2026 को एक महत्वपूर्ण आदेश में खाप पंचायतों की बहिष्कार व्यवस्था को असंवैधानिक करार देते हुए राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन के लिए कई स्तरों पर कार्रवाई निर्धारित की थी।
राजस्थान हाईकोर्ट ने 10 अप्रैल 2026 को एक महत्वपूर्ण आदेश में खाप पंचायतों की बहिष्कार व्यवस्था को असंवैधानिक करार देते हुए राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन के लिए कई स्तरों पर कार्रवाई निर्धारित की थी।
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जोधपुर। राजस्थान के गांवों में किसी व्यक्ति या परिवार को जाति अथवा समुदाय के फरमान के आधार पर सामाजिक जीवन से काट देना, उनकी रोजी-रोटी के रास्ते बंद कर देना, पानी और दूसरी जरूरी सुविधाओं से वंचित करना या समुदाय में दोबारा शामिल होने के लिए लाखों रुपये का दंड वसूलना महज सामाजिक परंपरा का मामला नहीं है। यह उस समानता, स्वतंत्रता और गरिमा पर सीधा हमला है जिसकी गारंटी भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को देता है। इसके बावजूद कई इलाकों में स्वयंभू जाति पंचायतें और सामुदायिक समूह अपने फैसलों को इस तरह लागू करते रहे हैं, मानो उन्हें किसी व्यक्ति या परिवार के सामाजिक जीवन पर नियंत्रण रखने का अधिकार प्राप्त हो।

राजस्थान हाईकोर्ट ने 10 अप्रैल 2026 को एक महत्वपूर्ण आदेश में इस व्यवस्था को असंवैधानिक करार देते हुए स्पष्ट किया था कि कोई भी गैर-संवैधानिक संस्था नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकती। अदालत ने राज्य सरकार को इस समस्या से निपटने के लिए व्यापक नीति बनाने, मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने और सामाजिक बहिष्कार को स्पष्ट रूप से अपराध घोषित करने वाले एक समग्र कानून की दिशा में कदम उठाने की आवश्यकता भी बताई थी।

अब इस आदेश के लगभग साढ़े छह महीने बाद राजस्थान सामाजिक बहिष्कार रोकथाम अभियान (Rajasthan Social Boycott Prevention Campaign) ने सरकार से उसके क्रियान्वयन की रिपोर्ट मांगी है। राजस्थान सामाजिक बहिष्कार रोकथाम अभियान की अगुवा अधिवक्ता शोभा प्रभाकर ने 30 अक्टूबर को राजस्थान सरकार के संसदीय कार्य एवं विधि मंत्री जोगाराम पटेल को विस्तृत पत्र भेजकर हाईकोर्ट के निर्देशों पर अब तक हुई कार्रवाई का ब्योरा मांगा है। अगर 15 दिन में जवाब नहीं मिला, तो अभियान इस चुप्पी को हाईकोर्ट के निर्देशों की अवहेलना मानेगा। यह अदालत की अवमानना के दायरे में आएगा और अभियान को अदालत तथा अन्य कानूनी उपायों का सहारा लेने की स्वतंत्रता होगी।

द मूकनायक के पास उपलब्ध इस पत्र में शोभा ने सात महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सरकार से जानकारी और संबंधित सरकारी आदेशों, परिपत्रों तथा अधिसूचनाओं की प्रतियां उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है। उनका सवाल है कि जब हाईकोर्ट ने सामाजिक बहिष्कार रोकने के लिए स्पष्ट संस्थागत व्यवस्था और समयबद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए हैं, तो उन निर्देशों को लागू करने के लिए सरकार ने अब तक क्या कदम उठाए हैं?

राजस्थान हाईकोर्ट ने 10 अप्रैल 2026 को एक महत्वपूर्ण आदेश में खाप पंचायतों की बहिष्कार व्यवस्था को असंवैधानिक करार देते हुए राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन के लिए कई स्तरों पर कार्रवाई निर्धारित की थी।
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शोभा प्रभाकर ने अपने पत्र में राजस्थान हाईकोर्ट के 10 अप्रैल के आदेश का हवाला देते हुए लिखा है कि अदालत ने सामाजिक बहिष्कार, जबरन आर्थिक वसूली और स्वयंभू पंचायतों के गैरकानूनी फरमानों के खिलाफ केवल कानूनी टिप्पणी नहीं की थी, बल्कि राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन के लिए ठोस संस्थागत तथा समयबद्ध निर्देश भी दिए थे।

पत्र के मुताबिक, अदालत ने जिला स्तर पर नोडल अधिकारियों की नियुक्ति, राज्य स्तर पर केंद्रीकृत निगरानी व्यवस्था, लंबित एफआईआर की स्वतंत्र जांच, व्यापक नीति और एसओपी बनाने जैसे निर्देश दिए थे। लेकिन शोभा का कहना है कि छह महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी इन व्यवस्थाओं को लागू करने संबंधी कोई आदेश, परिपत्र, सलाह या अधिसूचना सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है।

उन्होंने स्पष्ट किया है कि यदि सरकार ने ये कदम उठाए हैं, लेकिन उनकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है, तो अभियान संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराए जाने का स्वागत करेगा।

पत्र में सबसे पहले जिला स्तर पर नियुक्त किए जाने वाले नोडल अधिकारियों के आदेश मांगे गए हैं। हाईकोर्ट के निर्देश के अनुसार इन अधिकारियों को जिला कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, स्थानीय पुलिस और पंचायती राज संस्थाओं तथा नगर निकायों के प्रतिनिधियों के साथ समन्वय बनाकर काम करना है। शोभा ने इन अधिकारियों के नाम, नियुक्ति आदेश, संबंधित विशेष प्रकोष्ठों की स्थापना, उनके कार्यालयों के पते और संपर्क विवरण मांगे हैं।

दूसरा सवाल राज्य स्तर पर स्थापित किए जाने वाले केंद्रीकृत कार्यालय या निगरानी तंत्र को लेकर है। अदालत ने निर्देश दिया था कि राज्य में सामाजिक बहिष्कार से संबंधित मामलों का एकीकृत रिकॉर्ड तैयार किया जाए, ताकि अलग-अलग जिलों में सामने आने वाली घटनाओं की संख्या, प्रकृति और कार्रवाई का आकलन हो सके। शोभा ने इस व्यवस्था की स्थापना का आदेश और अब तक संकलित आंकड़े उपलब्ध कराने की मांग की है।

तीसरा सवाल लंबित एफआईआर की जांच से संबंधित है। पत्र में पूछा गया है कि क्या पुलिस महानिदेशक ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अथवा उससे ऊपर के स्तर के किसी वरिष्ठ अधिकारी को इन मामलों की जांच सौंपने का आदेश जारी किया है? यदि ऐसा किया गया है तो संबंधित अधिकारी का नाम क्या है और लंबित मामलों की वर्तमान स्थिति क्या है? क्या अदालत द्वारा निर्धारित 90 दिनों की अवधि में जांच पूरी की गई?

चौथे बिंदु में शोभा ने उस व्यापक रिपोर्ट की जानकारी मांगी है जिसे जांच अधिकारी को विभिन्न मामलों में सामने आने वाले पैटर्न, समस्याओं और चिंताओं के संबंध में तैयार करना था। हाईकोर्ट ने ऐसी रिपोर्ट पुलिस महानिदेशक को सौंपने और उनके माध्यम से गृह सचिव के समन्वय में मुख्य सचिव के समक्ष रखने का निर्देश दिया था। शोभा जानना चाहती हैं कि क्या यह रिपोर्ट तैयार हुई और उस पर सरकार ने क्या कार्रवाई की।

पांचवें सवाल में गृह विभाग द्वारा बनाई जाने वाली व्यापक नीति और एसओपी की स्थिति पूछी गई है। छठे बिंदु में सुप्रीम कोर्ट के शक्ति वाहिनी फैसले के दिशा-निर्देशों के क्रियान्वयन, संवेदनशील जिलों और गांवों की पहचान, पुलिस अधिकारियों को जारी परामर्श, जिला विशेष प्रकोष्ठों, हेल्पलाइन और सुरक्षित आश्रय गृहों जैसी व्यवस्थाओं के बारे में जानकारी मांगी गई है।

सातवें और सबसे महत्वपूर्ण सवाल में सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ एक समर्पित कानून बनाने की दिशा में सरकार द्वारा उठाए गए अथवा प्रस्तावित कदमों का ब्योरा मांगा गया है।

शोभा ने मंत्री से इन सभी बिंदुओं पर 15 दिनों के भीतर जवाब देने और संबंधित सरकारी दस्तावेज उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है।

हाईकोर्ट का ऐतिहासिक आदेश: सामाजिक बहिष्कार संविधान के मौलिक अधिकारों के खिलाफ

राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने 10 अप्रैल 2026 को जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ के माध्यम से सामाजिक बहिष्कार और स्वयंभू जाति पंचायतों के फरमानों से जुड़े कई मामलों पर साझा आदेश पारित किया था। इस फैसले का प्रमुख मामला दीपा राम मेघवाल बनाम राजस्थान राज्य, एस.बी. क्रिमिनल रिट पिटीशन नंबर 1344/2025 था। इसके साथ अन्य याचिकाओं और आपराधिक विविध प्रार्थना-पत्रों को भी सुना गया था।

अदालत ने सामाजिक बहिष्कार की प्रथा पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह संविधान द्वारा प्रदत्त समानता, गैर-भेदभाव और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकारों के सीधे खिलाफ है। अदालत के अनुसार, कोई भी गैर-संवैधानिक संस्था या अनौपचारिक समूह किसी व्यक्ति पर सामूहिक दंड थोपने का अधिकार नहीं रखता।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि खाप पंचायतों या जाति पंचायतों की गतिविधियां संविधान के मूल्यों के विपरीत हैं। किसी व्यक्ति को सामाजिक रूप से अछूत बना देना, उसके परिवार को समुदाय से बाहर कर देना या उसे नागरिक जीवन के सामान्य अवसरों से वंचित करना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

फैसले में अदालत ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि राजस्थान में सामाजिक बहिष्कार की घटनाओं से निपटने के लिए महाराष्ट्र की तरह कोई समर्पित कानून मौजूद नहीं है। फिलहाल ऐसे मामलों में भारतीय न्याय संहिता अथवा अन्य सामान्य आपराधिक कानूनों की अलग-अलग धाराओं का सहारा लिया जाता है। लेकिन अदालत के अनुसार, ये प्रावधान सामाजिक बहिष्कार के सामूहिक, संगठित और दबाव आधारित स्वरूप को पूरी तरह संबोधित करने में सक्षम नहीं हैं।

अदालत ने माना कि जब किसी जाति पंचायत या समुदाय के प्रभावशाली लोग मिलकर किसी परिवार के खिलाफ सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार का फरमान जारी करते हैं, तो उसके परिणाम सामान्य आपराधिक घटनाओं से कहीं अधिक व्यापक होते हैं। इसमें व्यक्ति को व्यापार, रोजगार, खरीद-बिक्री, आवास, सेवाओं, सामाजिक संबंधों और सामुदायिक जीवन से अलग किया जा सकता है।

न्यायालय ने इस समस्या के एक और गंभीर पहलू की ओर ध्यान दिलाया। अदालत के अनुसार, सामाजिक बहिष्कार का शिकार लोग अक्सर इस डर से पुलिस या प्रशासन तक नहीं पहुंचते कि शिकायत करने पर उनका और उनके परिवार का उत्पीड़न और बढ़ जाएगा। आर्थिक नुकसान, सामाजिक प्रतिशोध और समुदाय से पूरी तरह अलग कर दिए जाने का भय उन्हें शिकायत दर्ज कराने से रोकता है। इसके कारण सरकारी आंकड़ों में ऐसी घटनाओं की वास्तविक संख्या सामने नहीं आ पाती और समस्या कानूनी रूप से अदृश्य बनी रहती है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने 10 अप्रैल 2026 को एक महत्वपूर्ण आदेश में खाप पंचायतों की बहिष्कार व्यवस्था को असंवैधानिक करार देते हुए राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन के लिए कई स्तरों पर कार्रवाई निर्धारित की थी।
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अदालत ने क्या-क्या निर्देश दिए थे?

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन के लिए कई स्तरों पर कार्रवाई निर्धारित की थी।

जिला स्तर पर नोडल अधिकारी और विशेष प्रकोष्ठ: अदालत ने राज्य सरकार को प्रत्येक जिले में एक नोडल अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश दिया था। यह अधिकारी जिला कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, स्थानीय पुलिस और पंचायती राज संस्थाओं तथा नगर निकायों के प्रतिनिधियों के साथ समन्वय बनाकर काम करेगा। पीड़ितों के लिए शिकायत दर्ज कराना आसान हो, इसके लिए संस्थागत तंत्र अथवा विशेष प्रकोष्ठ को सुलभ बनाने की बात कही गई थी। प्रत्येक शिकायत पर प्रारंभिक जांच और प्राप्त शिकायतों तथा की गई कार्रवाई का व्यवस्थित रिकॉर्ड रखना भी इस व्यवस्था का हिस्सा था।

राज्य स्तर पर केंद्रीकृत निगरानी: अदालत ने राज्य स्तर पर एक केंद्रीकृत कार्यालय या तंत्र स्थापित करने को कहा था, जो अलग-अलग जिलों से सामाजिक बहिष्कार और उससे जुड़े मामलों का एकीकृत डेटा संकलित, विश्लेषित और सुरक्षित रखे।

लंबित एफआईआर की 90 दिनों में जांच: अदालत ने पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया था कि वे अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक से कम रैंक के न होने वाले किसी वरिष्ठ और जिम्मेदार अधिकारी को संबंधित एफआईआर की जांच सौंपें। जांच निष्पक्ष और व्यापक होनी चाहिए तथा प्रत्येक मामले में 90 दिनों के भीतर पूरी की जानी चाहिए। जांच के बाद तथ्यों के अनुसार आरोपपत्र, अंतिम रिपोर्ट अथवा क्लोजर रिपोर्ट संबंधित न्यायालय में प्रस्तुत की जानी थी।

अदालत ने यह भी कहा था कि जांच अधिकारी अलग से एक व्यापक रिपोर्ट तैयार करें, जिसमें विभिन्न मामलों से सामने आने वाली समस्याओं और घटनाओं के पैटर्न का विश्लेषण हो। इसे पुलिस महानिदेशक के माध्यम से गृह सचिव के समन्वय में मुख्य सचिव के सामने रखा जाना था, ताकि नीतिगत स्तर पर कार्रवाई की जा सके।

व्यापक नीति और एसओपी: अदालत ने गृह विभाग को गैरकानूनी सभाओं, जबरन थोपी जाने वाली सामाजिक प्रथाओं और संबंधित अपराधों की रोकथाम, निषेध तथा पीड़ितों के निवारण के लिए एक व्यापक नीति तैयार करने का निर्देश दिया था। इसके साथ ही एसओपी बनाने को कहा गया था, जिसमें शिकायत मिलने के बाद प्रशासन और पुलिस के जमीनी स्तर के अधिकारियों को उठाए जाने वाले कदमों की स्पष्ट प्रक्रिया बताई जाए। नीति और एसओपी का व्यापक प्रचार-प्रसार भी सुनिश्चित किया जाना था।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि सुप्रीम कोर्ट के शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ (2018) के फैसले में दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन किया जाए।

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि सामाजिक बहिष्कार और गैरकानूनी फरमानों पर प्रभावी नियंत्रण के लिए स्पष्ट अपराध और उसके अनुरूप सजा का प्रावधान करने वाला व्यापक कानून बनाया जाना जरूरी है। अदालत ने कहा था कि इस कानून में दोषियों के लिए दंड के साथ-साथ पीड़ितों के मुआवजे और पुनर्वास की पर्याप्त व्यवस्था भी होनी चाहिए।

आखिर क्या है राजस्थान में ‘हुक्का-पानी बंद’ और ‘हाथ बंद’ की व्यवस्था?

राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में सामाजिक बहिष्कार को कई जगह स्थानीय भाषा में ‘हुक्का-पानी बंद’ या ‘हाथ बंद’ कहा जाता है। इसके तहत स्वयंभू जाति पंचायतें या समुदाय के प्रभावशाली लोग किसी व्यक्ति अथवा परिवार को समुदाय से अलग करने का निर्णय सुना देते हैं। कई बार यह निर्णय केवल संबंधित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके माता-पिता, बच्चों, भाई-बहनों और अन्य रिश्तेदारों को भी इसकी सजा भुगतनी पड़ती है।

ऐसे फरमानों के पीछे अलग-अलग कारण हो सकते हैं। किसी युवक या युवती का अपनी पसंद से अंतरजातीय विवाह करना, परिवार का जाति पंचायत के फैसले को चुनौती देना, मृत्युभोज जैसी प्रथा का विरोध करना, जमीन या संपत्ति से जुड़ा विवाद अथवा समुदाय के प्रभावशाली लोगों के अधिकारों पर सवाल उठाना भी बहिष्कार का कारण बन सकता है।

द मूकनायक से बातचीत में शोभा प्रभाकर ने बताया कि इन फैसलों का असर केवल सामाजिक संबंधों तक सीमित नहीं रहता। पीड़ित परिवारों को शादी-विवाह, अंतिम संस्कार और त्योहारों में शामिल होने से रोका जा सकता है। उनके साथ व्यापार और लेन-देन बंद किया जा सकता है। सामुदायिक संसाधनों और जरूरी सुविधाओं तक पहुंच बाधित की जा सकती है। कई मामलों में समुदाय में दोबारा शामिल होने के नाम पर एक लाख रुपये से लेकर कई लाख रुपये तक का कथित दंड वसूला जाता है।

शोभा ने इसे एक तरह की ‘सामाजिक मृत्यु’ बताया। उनका कहना है कि जब किसी परिवार के साथ कोई व्यक्ति संबंध नहीं रख सकता, दुकानदार सामान देने से इनकार कर देते हैं और समुदाय के लोग उसके घर आना-जाना बंद कर देते हैं, तो यह केवल सामाजिक दूरी नहीं रह जाती, बल्कि व्यक्ति के सम्मान, आजीविका और सामान्य नागरिक जीवन पर हमला बन जाती है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने 10 अप्रैल 2026 को एक महत्वपूर्ण आदेश में खाप पंचायतों की बहिष्कार व्यवस्था को असंवैधानिक करार देते हुए राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन के लिए कई स्तरों पर कार्रवाई निर्धारित की थी।
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राजस्थान सामाजिक बहिष्कार रोकथाम अभियान की शुरुआत हाईकोर्ट के कोर्ट कमिश्नरों की रिपोर्ट से हुई

राजस्थान में सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ मौजूदा अभियान की पृष्ठभूमि हाईकोर्ट के 7 मार्च 2025 के आदेश से जुड़ी है। एसबी क्रिमिनल मिसलेनियस पिटीशन नंबर 1306/2025, भाका राम बनाम राजस्थान राज्य मामले में अदालत ने राजस्थान में खाप पंचायतों और स्वयंभू सामुदायिक निकायों द्वारा सामाजिक बहिष्कार की घटनाओं की पड़ताल के लिए पांच सदस्यीय आयोग गठित किया था।

आयोग को प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने, पुलिस अधिकारियों और थाना प्रभारियों से बातचीत करने तथा स्थानीय प्रशासन से जानकारी जुटाकर सामाजिक बहिष्कार की प्रकृति और उसके तरीकों पर रिपोर्ट तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी।

आयोग ने पाली, नागौर, जैसलमेर, जालौर, बांसवाड़ा, जोधपुर ग्रामीण और जोधपुर महानगर के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा किया था। इस दौरान प्रभावित लोगों, पुलिस अधिकारियों, थाना प्रभारियों और स्थानीय प्रशासन से बातचीत की गई। आयोग की रिपोर्ट में सामाजिक बहिष्कार को एक ऐसी न्यायेतर व्यवस्था के रूप में सामने रखा गया, जिसके जरिए सामुदायिक दबाव और आर्थिक दंड के माध्यम से लोगों के व्यक्तिगत अधिकारों को नियंत्रित किया जाता है।

शोभा प्रभाकर इस आयोग की सदस्य थीं। आयोग की रिपोर्ट और संबंधित मामलों के आधार पर हाईकोर्ट ने 10 अप्रैल 2026 को विस्तृत आदेश पारित किया। इसमें अदालत ने सामाजिक बहिष्कार की समस्या को संवैधानिक अधिकारों और कानून के शासन से जुड़ा गंभीर मुद्दा माना। इसके बाद राजस्थान सोशल बॉयकॉट प्रिवेंशन कैंपेन के जरिए अदालत के निर्देशों को लागू कराने और राज्य में अलग कानून बनाने की मांग को आगे बढ़ाया गया।

महाराष्ट्र में 2016 से लागू है सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ विशेष कानून

राजस्थान में अलग कानून बनाने की मांग के पीछे महाराष्ट्र का उदाहरण भी महत्वपूर्ण है। महाराष्ट्र में 2016 में Maharashtra Protection of People from Social Boycott (Prevention, Prohibition and Redressal) Act बनाया गया था। यह सामाजिक बहिष्कार को रोकने, प्रतिबंधित करने और पीड़ितों को राहत देने के लिए देश का पहला विशेष कानून है।

इस कानून में सामाजिक बहिष्कार के अलग-अलग स्वरूपों को परिभाषित किया गया है। किसी व्यक्ति को सामाजिक, धार्मिक, व्यावसायिक या सामुदायिक गतिविधियों से बाहर करने, संबंध रखने से रोकने और सामुदायिक पंचायत के जरिए दंडित करने जैसी गतिविधियां इसके दायरे में आती हैं।

कानून के तहत दोषी पाए जाने पर तीन साल तक की कैद और एक लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। अदालत ने भी अपने फैसले में महाराष्ट्र के कानून का उल्लेख करते हुए राजस्थान में इसी तरह के समर्पित कानूनी ढांचे की आवश्यकता बताई थी।

राजस्थान सामाजिक बहिष्कार रोकथाम अभियान की अगुवा अधिवक्ता शोभा प्रभाकर ने राज्य के संसदीय कार्य, विधि एवं विधिक कार्य मंत्री जोगाराम पटेल को औपचारिक पत्र लिखा है। अगर 15 दिन में जवाब नहीं मिला, तो अभियान इस चुप्पी को हाईकोर्ट के निर्देशों की अवहेलना मानेगा।
राजस्थान सामाजिक बहिष्कार रोकथाम अभियान की अगुवा अधिवक्ता शोभा प्रभाकर ने राज्य के संसदीय कार्य, विधि एवं विधिक कार्य मंत्री जोगाराम पटेल को औपचारिक पत्र लिखा है। अगर 15 दिन में जवाब नहीं मिला, तो अभियान इस चुप्पी को हाईकोर्ट के निर्देशों की अवहेलना मानेगा।

मंत्री से जवाब का इंतजार, 15 दिन बाद न्यायालय जाने का विकल्प

शोभा प्रभाकर ने अपने पत्र में मंत्री जोगाराम पटेल से अनुरोध किया है कि सातों बिंदुओं पर 15 दिनों के भीतर जवाब दिया जाए और संबंधित आदेशों, परिपत्रों तथा अधिसूचनाओं की प्रतियां उपलब्ध कराई जाएं।

प्रभाकर ने कहा कि यदि सरकार ने संबंधित कदम उठा लिए हैं, लेकिन उनकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है, तो अभियान उन दस्तावेजों को प्राप्त करने और स्थिति स्पष्ट करने का स्वागत करेगा। अभियान ने अपने स्तर से जमीनी निष्कर्षों, दस्तावेजों और मामलों की जानकारी साझा करने तथा नीति और एसओपी तैयार करने में सहयोग की पेशकश भी की है।

पत्र की प्रतियां मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास, गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव भास्कर ए. सावंत और राजस्थान के पुलिस महानिदेशक राजीव कुमार शर्मा को भी भेजी गई हैं। पत्र में कहा गया है कि 15 दिनों में जवाब नहीं मिलने पर अभियान हाईकोर्ट का रुख करने और कानून के तहत उपलब्ध अन्य उपाय अपनाने के लिए स्वतंत्र होगा।

अब इस मामले में राज्य सरकार का जवाब महत्वपूर्ण है। सवाल यह है कि राजस्थान में सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ हाईकोर्ट के आदेश को जमीन पर उतारने के लिए सरकार ने क्या किया है? क्या सभी जिलों में नोडल अधिकारी नियुक्त किए गए हैं? क्या राज्य स्तरीय निगरानी तंत्र और विशेष प्रकोष्ठ काम कर रहे हैं? क्या लंबित एफआईआर की जांच पूरी कर अदालतों में रिपोर्ट दाखिल की गई है? क्या गृह विभाग ने नीति और एसओपी तैयार की है? और क्या सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ अलग कानून बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई है? अभियान का 15 दिनों में जवाब देने का आग्रह इसी सवाल पर सरकार की जवाबदेही तय करने की कोशिश है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने 10 अप्रैल 2026 को एक महत्वपूर्ण आदेश में खाप पंचायतों की बहिष्कार व्यवस्था को असंवैधानिक करार देते हुए राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन के लिए कई स्तरों पर कार्रवाई निर्धारित की थी।
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