जब एक टांग पर हाथ जोड़े खड़े रहे दलित सरपंच: वो 11 स्तब्ध करने वाली घटनाएं जिन्होंने राजस्थान हाई कोर्ट को खाप पंचायतों के विरुद्ध सख्ती के लिए कर दिया मजबूर |TM Mega Report

राजस्थान हाई कोर्ट ने कहा 90 दिन में देनी होगी जांच रिपोर्ट, हर जिले में होंगे नोडल अधिकारी
न्यायालय ने स्वयं को अमूर्त कानूनी सिद्धांतों तक सीमित नहीं रखा। उसने सचमुच खेतों और गांवों तक जाने का रास्ता अपनाया, एक आयोग नियुक्त किया जिसने पश्चिमी राजस्थान के गांवों का दौरा किया, पीड़ितों से बात की, पुलिस अधिकारियों और स्थानीय प्रशासन से मिला, और एक जमीनी रिपोर्ट तैयार की जो इस फैसले की आत्मा बनी।
जस्टिस फरजंद अली ने राज्य सरकार से सामाजिक बहिष्कार खत्म करने के लिए महाराष्ट्र मॉडल की तर्ज पर कानून बनाने की सलाह दी ।ग्राफिक- आसिफ़ निसार/ द मूकनायक
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जोधपुर- 10 अप्रैल को राजस्थान हाई कोर्ट की जोधपुर पीठ ने एक ऐसा ऐतिहासिक और दूरगामी महत्व का आदेश सुनाया जो आने वाले वर्षों तक इस राज्य की सामाजिक और कानूनी चेतना में गूंजता रहेगा। जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने यह आदेश ग्यारह अलग-अलग याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए पारित किया, क्योंकि सभी में एक समान कानूनी प्रश्न निहित था। ये याचिकाएं सिरोही, बाड़मेर, जोधपुर, जालोर, नागौर और बाड़मेर जिलों के उन साधारण स्त्री-पुरुषों की थीं जिनका एकमात्र अपराध यह था कि उन्होंने अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करने का साहस किया।

उच्च न्यायालय ने स्वयंभू जाति पंचायतों द्वारा थोपे जाने वाले सामाजिक बहिष्कार को स्पष्ट रूप से अवैध, असंवैधानिक और मानवीय गरिमा के सर्वथा विरुद्ध घोषित करते हुए एक व्यापक निर्देश-शृंखला जारी की जो गांव के थाने से लेकर जयपुर के सचिवालय तक फैली हुई है।

जस्टिस फरजंद अली ने ऐतिहासिक सन्दर्भ देते हुए कहा कि जिस तरह सती प्रथा को बंगाल सती विनियमन और बाद में आयोग ऑफ सती (निवारण) अधिनियम, 1987 के जरिए समाप्त किया गया, उसी तरह खाप पंचायतों के फरमानों पर भी विधायी हस्तक्षेप आवश्यक है।

इस फैसले को असाधारण बनाने वाली बात केवल उसके निर्देश नहीं हैं, बल्कि वह गहरी समझ है जो न्यायालय ने पश्चिमी राजस्थान के सामाजिक बहिष्कार के पीड़ितों की जीवन-वास्तविकता के प्रति प्रदर्शित की।

न्यायालय ने स्वयं को अमूर्त कानूनी सिद्धांतों तक सीमित नहीं रखा। उसने सचमुच खेतों और गांवों तक जाने का रास्ता अपनाया, एक आयोग नियुक्त किया जिसने पश्चिमी राजस्थान के गांवों का दौरा किया, पीड़ितों से बात की, पुलिस अधिकारियों और स्थानीय प्रशासन से मिला, और एक जमीनी रिपोर्ट तैयार की जो इस फैसले की आत्मा बनी। परिणामस्वरूप यह निर्णय उतना ही एक सामाजिक दस्तावेज है जितना कि एक कानूनी आदेश।

क्या हैं वो ग्यारह चौंकाने वाले मामले जिसने खोली खाप पंचायतों की तानाशाही

न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत ग्यारह याचिकाओं में अलग-अलग विवरण थे, लेकिन क्रूरता एक जैसी थी।

मामला नंबर 1: शादी में घोड़ा चढ़ाया, एक लाख का जुर्माना, गांव छोड़ने की नौबत

बात 23 नवंबर 2019 की है जब सिरोही जिले के अनादरा थाना क्षेत्र में एक परिवार के बेटे की शादी हुई। शादी में बैंड बजा, घोड़ा चला जैसा हर घर में होता है, जैसा हर बारात में होता है। लेकिन इस परिवार का दुर्भाग्य यह था कि उन्होंने यह सब करने से पहले जाति पंचायत से "अनुमति" नहीं ली थी। बस, यही उनका "अपराध" था। और इस "अपराध" की सजा तय करने के लिए पंचायत ने बैठक बुलाई, बिना उस परिवार को सुने, बिना कोई सफाई का मौका दिए। फैसला सुना दिया गया: एक लाख रुपये का जुर्माना और "हुक्का-पानी बंद।"

हुक्का-पानी बंद का मतलब केवल पानी बंद करना नहीं होता। इसका मतलब होता है उस परिवार का पूरे समाज से नाता तोड़ना, कोई उनसे बात नहीं करेगा, कोई उनके घर नहीं आएगा, कोई उनके सुख-दुख में शामिल नहीं होगा, कोई उनसे लेनदेन नहीं करेगा। यह जीते जी सामाजिक मौत होती है। परिवार ने ₹31,000 जमा किए और बाकी के लिए समय मांगा। लेकिन पंचायत का दिल नहीं पिघला। बहिष्कार जारी रहा। अंततः परिवार इतना टूट गया कि उन्हें अपना गांव, अपनी जमीन, अपना घर छोड़कर कहीं और पलायन करना पड़ा। पुलिस के पास गए तो FIR दर्ज नहीं हुई। तब मजबूर होकर धारा 156(3) CrPC के तहत कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

मामला नंबर 2: पैतृक जमीन में हिस्सा मांगा, जिंदगी दांव पर लग गई

बाड़मेर के इस मामले में शिकायतकर्ता का "अपराध" यह था कि उसने अपने पैतृक संपत्ति में अपना वैध हिस्सा मांगने की हिम्मत की। साझा कुएं पर बिजली कनेक्शन के लिए फर्जी दस्तावेज बनाए गए और उसके हक को हड़पने की कोशिश हुई। जब उसने आपत्ति जताई, स्टे ऑर्डर लिया और अपने अधिकार के लिए लड़ा तो रिश्तेदारों, प्रभावशाली ग्रामीणों और यहां तक कि सरकारी अधिकारियों ने मिलकर उसके खिलाफ साजिश रच ली। पुलिस ने भी आरोपियों से मिलीभगत की और शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की।

इसके बाद जाति पंचायत की बारी आई। पंचायत ने जबरन आर्थिक मांगें कीं, सामाजिक बहिष्कार का फरमान जारी किया और जान से मारने की धमकियां दीं। यहां तक कि एक वाहन से उस पर हमला करने की कोशिश भी की गई। यह मामला केवल संपत्ति विवाद नहीं था, यह इस बात की गवाही था कि जो व्यक्ति अपना हक मांगे, उसे जाति पंचायत और भ्रष्ट प्रशासन मिलकर कैसे कुचलते हैं। अंततः धारा 156(3) CrPC के तहत कोर्ट का दरवाजा खटखटाने पर FIR दर्ज हुई और जांच शुरू हुई।

न्यायालय ने स्वयं को अमूर्त कानूनी सिद्धांतों तक सीमित नहीं रखा। उसने सचमुच खेतों और गांवों तक जाने का रास्ता अपनाया, एक आयोग नियुक्त किया जिसने पश्चिमी राजस्थान के गांवों का दौरा किया, पीड़ितों से बात की, पुलिस अधिकारियों और स्थानीय प्रशासन से मिला, और एक जमीनी रिपोर्ट तैयार की जो इस फैसले की आत्मा बनी।
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मामला नंबर 3: हाई कोर्ट की सुरक्षा के बावजूद ₹11 लाख का जुर्माना और जान की धमकी

यह मामला इसलिए भी विशेष रूप से चौंकाने वाला है क्योंकि इसमें खाप पंचायत ने खुद राजस्थान हाई कोर्ट के आदेश की भी परवाह नहीं की। एक दंपती ने 6 दिसंबर 2024 को अपने समुदाय की इच्छा के विरुद्ध आर्य समाज मंदिर में विवाह किया था। उन्हें पता था कि खतरा है, इसलिए वे पहले ही हाई कोर्ट की शरण में गए थे और न्यायालय ने उनकी सुरक्षा के लिए राज्य को आवश्यक निर्देश दे दिए थे।

लेकिन हाई कोर्ट के आदेश के बावजूद निजी प्रतिवादियों ने एक गैरकानूनी सामुदायिक बैठक बुलाई और इस दंपती पर ग्यारह लाख रुपये का भारी-भरकम जुर्माना लगा दिया। साथ में यह भी साफ कह दिया गया कि अगर जुर्माना नहीं भरा तो जान से हाथ धोना पड़ेगा। पुलिस के पास बार-बार गुहार लगाई, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई , उल्टे उन्हें और परेशान किया गया। यह मामला इस बात का सबसे बड़ा सबूत था कि जब तक विशेष कानून नहीं बनता, तब तक हाई कोर्ट के आदेश भी पीड़ितों की पूरी तरह रक्षा करने में असमर्थ हैं।

मामला नंबर 4: बहिष्कृत किया, झूठा साबित किया, महिला की लड़ाई अकेली रही

जोधपुर के डांगियावास थाना क्षेत्र में 15 सितंबर 2023 को एक गैरकानूनी जाति पंचायत बुलाई गई। इसमें एक महिला और उसके पूरे परिवार को बिना किसी कानूनी अधिकार के "समाज से बाहर" घोषित कर दिया गया। समुदाय के सभी सदस्यों को निर्देश दिया गया कि वे इस परिवार से किसी भी प्रकार का सामाजिक या रीति-रिवाजी संबंध न रखें। इसके साथ ही आर्थिक जुर्माना भी लगाया गया और धमकी दी गई कि जुर्माना नहीं भरा तो सार्वजनिक अपमान और बहिष्कार जारी रहेगा। महिला ने बताया कि इन सब से उसे गहरा मानसिक उत्पीड़न हुआ, सामाजिक प्रतिष्ठा नष्ट हुई और भय का माहौल बन गया।

पुलिस के पास पहले गई तो कोई कार्रवाई नहीं हुई। मजिस्ट्रेट के आदेश पर धारा 156(3) CrPC के तहत FIR दर्ज हुई। लेकिन जांच के बाद पुलिस ने रिपोर्ट दी कि आरोप विश्वसनीय साक्ष्यों से समर्थित नहीं हैं और पक्षों के बीच पहले से समझौता था, इसलिए मामला "झूठा" बताते हुए फाइनल रिपोर्ट दे दी गई। यह मामला इस बात की भी मिसाल था कि कैसे पीड़ित महिलाएं दोहरी मार झेलती हैं, पहले पंचायत की, फिर उदासीन प्रशासन की।

मामला नंबर 5: मृत्युभोज का विरोध किया, मां को खो दिया

इस मामले की पीड़ा बाकी सभी से अलग और गहरी है। याचिकाकर्ता एक ऐसा व्यक्ति था जो समाज में सुधार लाना चाहता था। वह अपने समुदाय में मृत्युभोज की प्रथा यानी किसी की मृत्यु के बाद शोकाकुल परिवार को बड़ा और खर्चीला सामुदायिक भोज देने की कुप्रथा के विरुद्ध जागरूकता अभियान चला रहा था। वह प्रशासन को भी इस बारे में सूचित कर रहा था। यह काम नेक था, यह काम संविधानसम्मत था।

लेकिन जाति पंचायत के स्वयंभू ठेकेदारों को यह पसंद नहीं आया। उन्होंने उस पर ₹5,00,000 की मांग थोप दी। जब नहीं माना तो गैरकानूनी बैठकें बुलाई गईं, परिवार को बहिष्कृत किया गया और समाज में वापसी के लिए अपमानजनक और आर्थिक शर्तें रखी गईं। याचिकाकर्ता बार-बार पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के पास गया, कोर्ट में इस्तगासा दाखिल किया, लेकिन कहीं से कोई प्रभावी राहत नहीं मिली। और इस पूरे दौरान जो सबसे त्रासद हुआ वह यह था कि याचिकाकर्ता की मां इस अवैध उत्पीड़न से उत्पन्न मानसिक आघात को सहन नहीं कर सकीं और उनकी मृत्यु हो गई। एक बेटे ने अपनी मां को इसलिए खो दिया क्योंकि उसने एक कुप्रथा के विरुद्ध आवाज उठाई थी।

मामला नंबर 6: पत्नी की मृत्यु का गम, ऊपर से साढ़े तीन लाख खर्च, फिर भी ₹5 लाख और मांगे

जालोर जिले के भाकाराम की कहानी पढ़कर आंखें भर आती हैं। उनकी पत्नी शांता देवी का निधन हो गया। शोक का वह समय था जब परिवार को सहारे और सहानुभूति की जरूरत होती है। लेकिन पंच-पटेलों ने इसे भी अपनी कमाई का जरिया बना लिया। उन्होंने भाकाराम को मजबूर किया कि वे हरिद्वार जाकर अस्थि विसर्जन करें और कई गांवों के लोगों के लिए तीन दिन का "गंगा प्रसादी" भोज दें। भाकाराम ने यह सब किया कर्ज लेकर। करीब साढ़े तीन लाख रुपये खर्च हो गए।

लेकिन यह सब करने के बाद भी उनकी मुक्ति नहीं हुई। 16 सितंबर 2024 को पंच-पटेलों ने घोषणा कर दी कि भाकाराम और उनका परिवार एक दिन पहले यानी 15 सितंबर को ही पंचायत के निर्णय से बहिष्कृत हो चुके हैं। और अब समाज में वापसी के लिए पांच लाख रुपये और चाहिए नहीं तो उनके रिश्तेदारों को भी जुर्माने की धमकी दी जाएगी। उस सभा में भाकाराम और उनके बेटों को अपमानित किया गया और बिना आतिथ्य के बाहर निकाल दिया गया। स्थानीय थाने में शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। तब जिले के पुलिस अधीक्षक तक पहुंचे, तब जाकर जसवंतपुरा थाने में भारतीय न्याय संहिता 2023 की धाराओं के तहत FIR दर्ज हुई।

न्यायालय ने स्वयं को अमूर्त कानूनी सिद्धांतों तक सीमित नहीं रखा। उसने सचमुच खेतों और गांवों तक जाने का रास्ता अपनाया, एक आयोग नियुक्त किया जिसने पश्चिमी राजस्थान के गांवों का दौरा किया, पीड़ितों से बात की, पुलिस अधिकारियों और स्थानीय प्रशासन से मिला, और एक जमीनी रिपोर्ट तैयार की जो इस फैसले की आत्मा बनी।
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मामला नंबर 7: मंदिर के शिलालेख में नाम तक नहीं लिखने दिया

21 अप्रैल 2025 को जोधपुर के मथानिया थाना क्षेत्र में स्वयंभू पंचों ने एक बैठक बुलाई और एक लिखित प्रस्ताव पारित किया। इस प्रस्ताव पर पंचों के हस्ताक्षर थे और इसमें शिकायतकर्ता और उसके पूरे परिवार को सामाजिक रूप से बहिष्कृत घोषित किया गया था। समुदाय के सभी सदस्यों को फरमान दिया गया कि वे इस परिवार से किसी भी प्रकार का सामाजिक संबंध न रखें और अगर कोई रखा तो उसे भी इसी "हुक्का-पानी बंद" का सामना करना पड़ेगा।

बहिष्कार की यह पीड़ा केवल सामाजिक नहीं थी। जब उस परिवार ने एक मंदिर के निर्माण में भागीदारी की और चाहा कि उनका नाम शिलालेख में दर्ज हो , जैसा हर दानदाता का होता है तो उन्हें वह भी नहीं मिला। उनका नाम दर्ज करने से इनकार कर दिया गया। पुलिस के पास शिकायत की, प्रतिनिधित्व भेजे , कोई सुनवाई नहीं हुई। अंततः कोर्ट में इस्तगासा दाखिल हुआ, जहां प्रथम दृष्टया मामला बनता देख भारतीय न्याय संहिता 2023 के तहत FIR दर्ज हुई।

मामला नंबर 8: पत्नी की अस्मत बचाई , पंचायत ने उल्टा उन्हें ही सजा दी

बाड़मेर के इस मामले की विडंबना इतनी गहरी है कि पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। शिकायतकर्ता के घर में रात को एक आरोपी ने अवैध रूप से घुसकर उसकी पत्नी की मर्यादा भंग करने का प्रयास किया। उसने FIR दर्ज कराई। यह उसका कानूनी अधिकार था, यह उसका कर्तव्य था।

लेकिन इसके बाद जो हुआ वह न्याय-व्यवस्था के मुंह पर तमाचा था। जाति पंचायत के स्वयंभू सदस्यों ने बैठकें कर उस परिवार पर FIR वापस लेने का दबाव बनाना शुरू किया। कानूनी अधिकार का इस्तेमाल करना उनका "अपराध" बन गया। पंचायत ने भारी-भरकम आर्थिक मांगें कीं और जब नहीं मानी गईं तो "हुक्का-पानी बंद" का फरमान सुना दिया। इतना ही नहीं, परिवार पर शारीरिक हमले किए गए, डराया-धमकाया गया और "सामुदायिक समझौते" के नाम पर जबरन मोटी रकम भी वसूली गई। और इस सबके बाद बदले की भावना से उस परिवार के खिलाफ एक झूठी प्रतिकारी FIR भी दर्ज करा दी गई। पुलिस के पास गए तो वहां भी सुनवाई नहीं हुई। कोर्ट में इस्तगासा देने के बाद FIR दर्ज हुई।

मामला नंबर 9: डर से देर हुई, FIR हुई लेकिन लड़ाई अभी बाकी है

यह मामला उसी बाड़मेर के बार थाना क्षेत्र से है और यह पिछले मामले से जुड़ा हुआ है। पीड़िता अकेली थी जब आरोपी ने उसके घर में घुसकर उसके साथ जबरन यौन दुराचार किया और अश्लील सामग्री के जरिए बदनाम करने की धमकी देकर उसे चुप रहने पर मजबूर किया। भय और धमकी के चलते वह तुरंत सामने नहीं आ सकी। देरी से घटना का खुलासा हुआ और तब FIR भारतीय न्याय संहिता के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत दर्ज हुई।

यह मामला इस बात की गवाही था कि कैसे खाप पंचायत की मानसिकता और सामाजिक दबाव का वातावरण महिलाओं को न्याय मांगने से भी रोकता है। आरोपी का वही वातावरण जो पीड़िता को डराता है, वही वातावरण पंचायत को पीड़ित परिवार पर दबाव बनाने का साहस देता है। यह दोनों मामले मिलकर उस पूरी व्यवस्था की तस्वीर खींचते हैं जहां अपराधी संरक्षित है और पीड़ित असहाय।

मामला नंबर 10: जुर्माना भरा, फिर भी बहिष्कार, SC परिवार की अंतहीन पीड़ा

जोधपुर के इस मामले के याचिकाकर्ता अनुसूचित जाति से संबंधित हैं। उनके बच्चों ने अपनी मर्जी से, अपने अधिकार से अंतरजातीय विवाह किए। लेकिन जाति पंचायत को यह मंजूर नहीं था। पंचायत ने गैरकानूनी बैठक बुलाई और पूरे परिवार को बहिष्कृत कर भारी जुर्माना लगाया। परिवार ने जुर्माना भरा लेकिन बहिष्कार नहीं हटा। यह अपने आप में उस व्यवस्था का सबसे बड़ा झूठ था जो यह दावा करती है कि जुर्माना भरने पर समाज में वापसी होगी।

इसके बाद उस पंचायत ने समुदाय के अन्य सदस्यों से भी बहिष्कार की धमकी देकर मोटी रकम वसूलना शुरू किया। जब याचिकाकर्ता ने इस लूट पर सवाल उठाए तो उन्हें धमकियां और डराना-धमकाना शुरू हो गया। उन्होंने मानवाधिकार आयोग और जिला प्रशासन को शिकायतें कीं लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। याचिकाकर्ता का आरोप था कि आरोपियों से मिलीभगत के कारण प्रशासन ने आंखें मूंद लीं। अंततः वे हाई कोर्ट पहुंचे और न्याय की गुहार लगाई।

नागौर ज़िले के दांतिना ग्राम पंचायत क्षेत्र में एक दलित सरपंच को अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ा, जब उन्हें एक पैर पर खड़े होने के लिए मजबूर किया गया। इस अपमान को और बढ़ाते हुए, एक खाप पंचायत जिसका नेतृत्व कथित तौर पर उच्च जाति के सदस्यों द्वारा किया जा रहा था, ने सरपंच के परिवार पर 'हुक्का-पानी' का बहिष्कार (बंद) लगा दिया है।
नागौर ज़िले के दांतिना ग्राम पंचायत क्षेत्र में एक दलित सरपंच को अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ा, जब उन्हें एक पैर पर खड़े होने के लिए मजबूर किया गया। इस अपमान को और बढ़ाते हुए, एक खाप पंचायत जिसका नेतृत्व कथित तौर पर उच्च जाति के सदस्यों द्वारा किया जा रहा था, ने सरपंच के परिवार पर 'हुक्का-पानी' का बहिष्कार (बंद) लगा दिया है।

मामला नंबर 11: निर्वाचित सरपंच को एक पैर पर खड़ा किया, ₹5 लाख दो या बहिष्कार झेलो

ग्यारह मामलों में यह शायद सबसे प्रतीकात्मक और सबसे आक्रोशित करने वाला था। नागौर जिले के पंचोड़ी थाना क्षेत्र में शिकायतकर्ता कोई आम व्यक्ति नहीं थे, वे एक निर्वाचित सरपंच थे। वे अनुसूचित जाति से थे और संविधान के अंतर्गत उन्हें जनता ने चुना था। वे एक सांविधानिक पद पर बैठे जन-प्रतिनिधि थे।

लेकिन "महा पंचायत" के नाम पर बुलाई गई एक गैरकानूनी सभा में उन्हें ऐसे अपमानित किया गया जैसा किसी इंसान के साथ नहीं होना चाहिए। उन्हें एक पैर पर हाथ जोड़कर खड़े रहने पर मजबूर किया गया। गाली-गलौज की गई। जान से मारने की धमकी दी गई। और फिर मनमाना फरमान सुनाया गया कि गांव का कोई भी व्यक्ति उनसे सामाजिक या व्यावसायिक संबंध नहीं रखेगा। पांच लाख रुपये जुर्माना नहीं तो बहिष्कार। जो व्यक्ति लोगों का चुना हुआ प्रतिनिधि था, जिसे संविधान ने अधिकार और सम्मान दिया था, उसे एक अवैध सभा ने सार्वजनिक रूप से धूल में मिला दिया। इस मामले में SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम और भारतीय दंड संहिता के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता देख FIR दर्ज हुई।

कोर्ट ने 14 सामाजिक समस्याओं को चिन्हित किया

अदालत ने इन सभी मामलों के अध्ययन के बाद 14 प्रमुख सामाजिक समस्याएं रेखांकित कीं:

  1. सामुदायिक शक्ति का दुरुपयोग: बिना किसी कानूनी अधिकार के "न्यायालय" की तरह काम करना

  2. सामाजिक बहिष्कार और अलगाव: "हुक्का-पानी बंद" एक मनोवैज्ञानिक और आर्थिक हथियार

  3. जबरन आर्थिक वसूली: कानूनी आधार के बिना मोटे जुर्माने

  4. व्यक्तिगत स्वतंत्रता का दमन: जीवनसाथी चुनने का अधिकार छीनना

  5. मानसिक उत्पीड़न और आघात: गंभीर मनोवैज्ञानिक क्षति, कुछ मामलों में मौत तक

  6. भय-आधारित नियंत्रण: डर से अनुपालन

  7. महिलाओं पर अत्यधिक असर: पितृसत्तात्मक वर्चस्व

  8. निजी विवादों को सामाजिक दंड में बदलना: दबाव की रणनीति

  9. प्रशासन में विश्वास का क्षरण: पुलिस निष्क्रियता से पीड़ितों में निराशा

  10. हिंसा और धमकी का प्रयोग

  11. कमजोर वर्गों विशेषकर SC/ST समुदायों का का शोषण

  12. सार्वजनिक अपमान और गरिमाहनन

  13. सामाजिक सुधार का विरोध: मृत्युभोज विरोधी को ही दंडित करना

  14. बदले की झूठी FIR का चक्र

न्यायालय ने कहा: ये व्यक्तिगत मामले नहीं, यह एक सामाजिक महामारी है। इन ग्यारह मामलों को पढ़ने के बाद जस्टिस फरजंद अली ने जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही वह यह थी कि ये अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं- इनमें एक समान धागा है, एक समान प्रतिरूप है, एक समान क्रूरता है। शादी में घोड़ा चढ़ाने वाला सिरोही का परिवार और मृत्युभोज का विरोध करने वाला सुधारक, पत्नी की अस्मत बचाने वाला बेाड़मेर का पति और संपत्ति में हिस्सा मांगने वाला बाड़मेर का शख्स, प्रेम विवाह करने वाला दंपती और अनुसूचित जाति का वह सरपंच जिसे एक पैर पर खड़ा किया गया- ये सब अलग-अलग कहानियां नहीं हैं। ये एक ही कहानी के अलग-अलग अध्याय हैं।

वो आयोग जो गांवों में गया और सच लेकर लौटा

मार्च 2025 में ही यह महसूस करते हुए कि इस समस्या का समाधान केवल अदालत के कक्ष में नहीं हो सकता, जस्टिस फरजंद अली ने एक असाधारण और सराहनीय कदम उठाया। उन्होंने चार अधिवक्ताओं - रामावतार सिंह चौधरी, भागीरथ राय बिश्नोई, शोभा प्रभाकर और देवकीनंदन व्यास तथा एक समाजसेवी महावीर कंकरिया को मिलाकर एक पांच सदस्यीय न्यायालय आयोग गठित किया। इस आयोग को स्पष्ट जनादेश दिया गया: गांवों में जाओ, लोगों से बात करो, जमीनी हकीकत परखो और न्यायालय को रिपोर्ट दो।

आयोग के सदस्यों ने संबंधित जिलों के पुलिस अधीक्षकों द्वारा प्रदान की गई सशस्त्र सुरक्षा के साथ पाली, बांसवाड़ा, जालोर, जोधपुर ग्रामीण और शहरी दोनों तथा जैसलमेर जिलों का विस्तृत दौरा किया। उन्होंने पुलिस थानों का निरीक्षण किया, FIR के रिकॉर्ड देखे, SHO से बात की, सरपंचों और BDO से मिले और सबसे महत्वपूर्ण - पीड़ितों के साथ बैठकर उनकी दास्तानें सुनीं। जो रिपोर्ट वे लेकर लौटे, उसे न्यायालय ने उतनी ही गहरी पीड़ा और उतनी ही तीव्र चिंता के साथ पढ़ा।

आयोग की सदस्य शोभा प्रभाकर ने द मूकनायक से अपने अनुभव बांटे। उन्होंने बताया कि "आयोग ने पाया कि अनेक जिलों में अनौपचारिक जाति और सामुदायिक संगठन समानांतर न्यायिक प्रणाली के रूप में कार्य कर रहे हैं और सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक बहिष्करण तथा भारी-भरकम जुर्मानों के रूप में मनमाने और गैरकानूनी दंड थोप रहे हैं। पीड़ितों को अंतरजातीय विवाह करने, समुदाय में वित्तीय अनियमितताओं पर सवाल उठाने, वैवाहिक विवाद में अपना पक्ष रखने या केवल अपने कानूनी अधिकार जताने के लिए पूरी तरह अलग-थलग कर दिया गया था। परिवारों को या तो भारी जुर्माना भरने और समुदाय के लिए रुइनस खर्चीले भोज आयोजित करने पर मजबूर किया गया, या फिर पानी और भोजन की आपूर्ति तथा सामुदायिक समारोहों में भागीदारी से वंचित करते हुए उन्हें स्थायी बहिष्कार का सामना करना पड़ा। बहिष्कार केवल संबंधित व्यक्ति तक सीमित नहीं था, उसके पूरे परिवार पर लागू होता था, और जो भी उनसे संपर्क रखने की हिम्मत करता, उसे भी इसी दंड की धमकी दी जाती थी।"

आयोग के सदस्यों ने संबंधित जिलों के पुलिस अधीक्षकों द्वारा प्रदान की गई सशस्त्र सुरक्षा के साथ पाली, बांसवाड़ा, जालोर, जोधपुर ग्रामीण और शहरी दोनों तथा जैसलमेर जिलों का विस्तृत दौरा किया।
आयोग के सदस्यों ने संबंधित जिलों के पुलिस अधीक्षकों द्वारा प्रदान की गई सशस्त्र सुरक्षा के साथ पाली, बांसवाड़ा, जालोर, जोधपुर ग्रामीण और शहरी दोनों तथा जैसलमेर जिलों का विस्तृत दौरा किया। चित्र साभार: शोभा प्रभाकर

आयोग ने एक ऐसी बात भी उजागर की जो इस पूरी समस्या के कानूनी पक्ष के केंद्र में थी। राजस्थान राज्य में ऐसा कोई विशिष्ट वैधानिक प्रावधान नहीं है जो सामाजिक बहिष्कार के कार्य को सीधे तौर पर अपराध घोषित करे या उसका निवारण करे। शोभा कहती हैं, " महाराष्ट्र देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जिसने 2016 में इस विषय पर एक विशेष कानून "महाराष्ट्र प्रोहिबिशन ऑफ पीपल फ्रॉम सोशल बॉयकॉट (प्रिवेंशन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल) एक्ट" — बनाया है। राजस्थान में सामाजिक बहिष्कार के मामलों में भारतीय दंड संहिता की धारा 384 यानी जबरन वसूली के तहत FIR दर्ज करने की कोशिश होती है, लेकिन यह प्रावधान उन मामलों को नहीं पकड़ पाता जिनमें कोई प्रत्यक्ष आर्थिक लेनदेन नहीं होता। राजस्थान गुंडा नियंत्रण अधिनियम तभी लागू होता है जब आरोपी की पहले से आपराधिक पृष्ठभूमि हो। और चूंकि पूरा समुदाय मिलकर बहिष्कार लागू करता है, इसलिए पीड़ित प्रायः बेआवाज़ हो जाते हैं, कोई स्वतंत्र गवाह सामने नहीं आता क्योंकि उसे भी बहिष्कृत होने का भय होता है। परिणामस्वरूप अधिकांश मामले साक्ष्य के अभाव में बंद हो जाते हैं और अपराधी बच निकलते हैं।"

आयोग ने पाया कि अनेक जिलों में अनौपचारिक जाति और सामुदायिक संगठन समानांतर न्यायिक प्रणाली के रूप में कार्य कर रहे हैं और सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक बहिष्करण तथा भारी-भरकम जुर्मानों के रूप में मनमाने और गैरकानूनी दंड थोप रहे हैं।
आयोग ने पाया कि अनेक जिलों में अनौपचारिक जाति और सामुदायिक संगठन समानांतर न्यायिक प्रणाली के रूप में कार्य कर रहे हैं और सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक बहिष्करण तथा भारी-भरकम जुर्मानों के रूप में मनमाने और गैरकानूनी दंड थोप रहे हैं। चित्र साभार: शोभा प्रभाकर

संविधान और खाप का टकराव: जब परंपरा कानून से लड़ती है

न्यायालय ने "पंचायत" और "खाप" के बीच के मूलभूत अंतर को स्पष्ट करने में विशेष सावधानी बरती। पंचायत, जो संविधान के भाग-9 के अंतर्गत मान्यता प्राप्त संस्था है, लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण और विधिसम्मत शासन का प्रतीक है। खाप, इसके विपरीत, एक पारंपरिक, जाति-आधारित, गैर-सांविधिक सामाजिक संगठन है जिसे न कानूनी मान्यता प्राप्त है और न ही कोई न्यायिक अधिकार। फिर भी दशकों के दौरान कुछ खाप पंचायतों ने परंपराओं के संरक्षण और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के आवरण में छिपकर समानांतर सत्ता-केंद्रों का रूप ले लिया है।

जस्टिस फरजंद अली ने स्पष्ट किया कि खाप पंचायतों की संपूर्ण संरचना संवैधानिक मूल्यों से सीधे टकराती है। उनके कार्य अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करते हैं जो कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, क्योंकि व्यक्तियों को चुनकर उन पर भेदभावपूर्ण सामाजिक दंड थोपे जाते हैं। वे अनुच्छेद 15 का उल्लंघन करते हैं जो जाति, धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव का प्रतिषेध करता है और यही वे आधार हैं जिन पर खाप के फरमान जारी होते हैं। वे अनुच्छेद 19 के अंतर्गत अभिव्यक्ति, संगठन और आवागमन की स्वतंत्रता का हनन करते हैं। और सबसे गंभीर रूप से, वे अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार पर आघात करते हैं, जिसकी सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार व्यापक व्याख्या करते हुए उसमें गरिमा, स्वायत्तता और अंतरंग व्यक्तिगत चुनावों की स्वतंत्रता जिसमें जीवनसाथी चुनने का अधिकार भी शामिल है, को सम्मिलित किया है।

न्यायालय ने कहा कि तथाकथित "ऑनर किलिंग" की प्रथा, जो ऐसे ही अतिरिक्त-न्यायिक निकायों की देन है, प्रतिगामी सामाजिक नियंत्रण की एक बर्बर अभिव्यक्ति के अलावा कुछ नहीं है। यह उन लोगों को समाप्त करने की प्रवृत्ति है जो ऐसे चुनाव करते हैं जिन्हें जाति या परिवार की प्रतिष्ठा के लिए कलंकित माना जाता है। ऐसे कृत्य न केवल न्यायालय की अंतरात्मा को झकझोरते हैं, बल्कि उस संवैधानिक नैतिकता का अपमान भी हैं जिसे सामाजिक नैतिकता पर सर्वोच्चता प्राप्त है। पीड़ित अपराधी नहीं हैं, वे वे लोग हैं जिन्होंने अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करने का साहस किया है।

न्यायालय ने शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ — (2018) 7 SCC 192 — के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले का विस्तृत उल्लेख करते हुए दोहराया कि शीर्ष न्यायालय ने अतिरिक्त-संवैधानिक सभाओं द्वारा जारी किसी भी प्रकार के फरमान को पूरी तरह अवैध घोषित किया था और अपराधियों के खिलाफ तत्काल FIR दर्ज करने के निर्देश दिए थे। उस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने निवारक, उपचारात्मक और दंडात्मक उपायों की एक त्रिस्तरीय व्यापक रूपरेखा प्रस्तुत की थी। निवारक उपायों में संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, अंतरजातीय या अंतर-धार्मिक विवाहों के मामलों में पुलिस सतर्कता और खाप सभाओं को रोकने के लिए तत्काल कदम जिसमें धारा 144 CrPC के तहत निषेधाज्ञा और धारा 151 CrPC के तहत निवारक गिरफ्तारी शामिल हैं, का प्रावधान था। उपचारात्मक उपायों में तत्काल FIR दर्ज करना, त्वरित जांच, पीड़ित दंपतियों को सुरक्षा देना और यदि आवश्यक हो तो उन्हें सुरक्षित घरों में स्थानांतरित करना शामिल था। दंडात्मक उपायों में कर्तव्य में लापरवाही बरतने वाले पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई, जिला स्तर पर विशेष सेल और चौबीस घंटे हेल्पलाइन की स्थापना तथा ऑनर क्राइम के मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में दिन-प्रतिदिन के आधार पर अधिमानतः छह महीने के भीतर करने का प्रावधान था।

हाई कोर्ट ने गहरी चिंता के साथ यह भी नोट किया कि इन स्पष्ट सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद, इन उपायों की व्यावहारिक प्रवर्तनीयता एक विशिष्ट वैधानिक अपराध की अनुपस्थिति के कारण बाधित हुई है। अधिकांश मामलों में शिकायत की गई घटनाएं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इंगित अपराधों आपराधिक धमकी, सदोष अवरोध, सदोष परिरोध या जबरन वसूली के आवश्यक तत्वों को पूरी तरह संतुष्ट नहीं करतीं, विशेषकर उन मामलों में जहां दबाव प्रत्यक्ष शारीरिक बल या स्पष्ट धमकियों के बजाय सामूहिक सामाजिक दबाव के माध्यम से डाला जाता है।

हाईकोर्ट ने निर्देशों की शृंखला: गांव के थाने से मुख्य सचिव के कार्यालय तक

इस पृष्ठभूमि में हाई कोर्ट ने बहुस्तरीय निर्देशों की एक ऐसी शृंखला जारी की जो प्रशासनिक पदानुक्रम के हर स्तर पर एक संस्थागत तंत्र खड़ा करने के उद्देश्य से तैयार की गई है।

जिला स्तर पर राज्य को एक नोडल अधिकारी नामित करने का निर्देश दिया गया है जो जिला कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, स्थानीय पुलिस तंत्र तथा पंचायती राज संस्थाओं और नगरीय निकायों के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर गैरकानूनी गतिविधियों पर निरंतर नज़र रखेगा। यह नोडल अधिकारी राज्य-स्तरीय प्राधिकरण को किसी भी घटना की त्वरित और समयबद्ध सूचना देगा, पीड़ितों के लिए शिकायत तंत्र को बिना किसी बाधा के सुलभ बनाएगा, शिकायत मिलने पर प्रारंभिक जांच करेगा और सभी शिकायतों, उनकी प्रकृति तथा उन पर की गई कार्रवाई का एक व्यवस्थित, समसामयिक और विधिवत दस्तावेज़ीकृत अभिलेख रखेगा।

राज्य स्तर पर एक केंद्रीकृत निगरानी तंत्र या कार्यालय स्थापित किया जाएगा जो सभी जिलों से संबंधित मामलों का समेकित डेटा संकलित, विश्लेषित और संरक्षित करेगा, जिससे प्रभावी निगरानी और सुविचारित नीति-निर्माण संभव हो सके।

लंबित मामलों के विषय में न्यायालय ने पुलिस महानिदेशक, राजस्थान को निर्देश दिया कि वे अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक या उससे ऊंचे रैंक का एक वरिष्ठ और जिम्मेदार अधिकारी नामित करें जो सभी संबंधित FIR अपने हाथ में लेकर एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और व्यापक जांच करे। जांच 90 दिनों के भीतर पूरी की जाए और उचित रिपोर्ट चाहे वो आरोप-पत्र हो, अंतिम रिपोर्ट हो या क्लोजर रिपोर्ट, संबंधित न्यायालयों के समक्ष विधि के अनुसार प्रस्तुत की जाए।

प्रत्येक मामले को उसके अपने गुण-दोष के आधार पर पीड़ितों की शिकायतों के प्रति समुचित संवेदनशीलता के साथ देखा जाए। जांच अधिकारी एक पृथक व्यापक रिपोर्ट भी तैयार करेगा जिसमें इन जांचों से उभरने वाले व्यापक प्रतिरूपों और चिंताओं का सारसंग्रह हो-- यह रिपोर्ट DGP के माध्यम से गृह सचिव के जरिए राजस्थान सरकार के मुख्य सचिव के समक्ष नीतिगत विचारार्थ रखी जाएगी।

राज्य सरकार को गृह विभाग के माध्यम से एक व्यापक नीति तैयार करने का निर्देश दिया गया है जो गैरकानूनी सभाओं और दबावकारी सामाजिक प्रथाओं से जुड़ी घटनाओं की रोकथाम, निषेध और निवारण से संबंधित हो और जो शक्ति वाहिनी में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों के अनुरूप हो। इस नीति में सभी संबंधित अधिकारियों की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों की स्पष्ट रूपरेखा हो और अंतर-विभागीय समन्वय के तंत्र का प्रावधान हो।

इसके अतिरिक्त एक मानक संचालन प्रक्रिया SOP तैयार की जाएगी जिसमें शिकायत मिलने पर तत्काल निवारक कदमों की प्रक्रिया, विधि के अनुसार समयबद्ध FIR दर्ज करने का तरीका, पीड़ित संरक्षण और सहायता के उपाय तथा जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने वाली रिपोर्टिंग और दस्तावेज़ीकरण की आवश्यकताएं शामिल होंगी।

न्यायालय ने ज्योतिराव फुले, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद और डॉ. भीमराव अम्बेडकर जिन्होंने जाति-आधारित भेदभाव से लड़ने में अपना जीवन लगा दिया आदि का स्मरण करते हुए गहरे दुख के साथ कहा कि उनके त्याग और संघर्ष के बावजूद ये बुराइयां आज भी जीवित हैं। और अब इन्हें संविधान की शक्ति से जड़ से उखाड़ना होगा।

न्यायालय ने सुझाव दिया कि राजस्थान राज्य महाराष्ट्र के 2016 के कानून की तर्ज पर एक व्यापक और संहिताबद्ध कानूनी ढांचा बनाए जो सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार के फरमानों को जारी करने, लागू करने या उनमें सहायता करने को स्पष्ट रूप से दंडनीय अपराध घोषित करे जिसमें बिक्री, खरीद, व्यापार, व्यवसाय, लेनदेन, आवास, सुविधाओं, सेवाओं, सामाजिक संपर्क और सभी प्रकार के संगठन पर थोपे गए प्रतिबंध शामिल हों। इस कानून में अपराधियों के लिए स्पष्ट दंड का प्रावधान हो, पीड़ितों के लिए पर्याप्त मुआवजे और पुनर्वास का तंत्र हो और एक समर्पित अभियोजन ढांचा हो जो कानून प्रवर्तन अधिकारियों को यह अनुमान लगाने पर मजबूर न करे कि किस धारा के तहत मामला दर्ज करें।

न्यायालय ने सावधानी से यह भी स्पष्ट किया कि वह न्यायिक कानून-निर्माण नहीं कर रहा। उसने स्वीकार किया कि दंड प्रावधान बनाना विधायिका के विशिष्ट अधिकार क्षेत्र में आता है और न्यायालय दिशा-निर्देशों के माध्यम से संसद या विधानसभा का स्थान नहीं ले सकते। लेकिन उसने विशाखा बनाम राजस्थान (1997) 6 SCC 241 में सर्वोच्च न्यायालय के उस दृष्टिकोण से शक्ति ली जिसमें उचित कानून बनने तक विधायी रिक्तता को भरने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए गए थे, और इसी आधार पर अपने अंतरिम निर्देशों को न्यायसंगत ठहराया। इन सब निर्देशों के साथ सभी ग्यारह रिट याचिकाओं और विविध याचिकाओं का निस्तारण किया गया।

न्यायालय ने स्वयं को अमूर्त कानूनी सिद्धांतों तक सीमित नहीं रखा। उसने सचमुच खेतों और गांवों तक जाने का रास्ता अपनाया, एक आयोग नियुक्त किया जिसने पश्चिमी राजस्थान के गांवों का दौरा किया, पीड़ितों से बात की, पुलिस अधिकारियों और स्थानीय प्रशासन से मिला, और एक जमीनी रिपोर्ट तैयार की जो इस फैसले की आत्मा बनी।
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