
जोधपुर- जोधपुर उच्च न्यायालय ने अंतरजातीय विवाह के बाद समुदाय द्वारा सामाजिक बहिष्कार और गवाहों को धमकाने के मामले में महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने राजाराम पालीवाल की याचिका का निपटारा करते हुए जांच अधिकारी को निर्देश दिया कि अगर गवाह डराने-धमकाने या सामाजिक बहिष्कार की शिकायत करें तो तुरंत प्रभावी कार्रवाई की जाए।
याचिकाकर्ता राजाराम पालीवाल ने बताया कि उन्होंने 3 दिसंबर 2022 को रजनी से प्रथागत रीति-रिवाज के अनुसार विवाह किया था। इसके बाद पालीवाल समुदाय के कुछ सदस्यों ने यह आरोप लगाकर उन्हें और उनके परिवार को सामाजिक बहिष्कार का शिकार बना दिया कि उनकी पत्नी किसी अन्य जाति की हैं। समुदाय की कई पंचायतें बुलाई गईं, जिनमें याचिकाकर्ता और उनके परिवार को बंद करके अपमानित किया गया, धमकियां दी गईं और एक लाख रुपये जुर्माने के रूप में वसूल किए गए। इसके अलावा 21 लाख रुपये और मांग की गई। आरोप है कि आरोपी पक्ष ने याचिकाकर्ता के रिश्तेदारों को भी उनके परिवार से सामाजिक संबंध रखने से रोका और न मानने पर इसी तरह के बहिष्कार की धमकी दी। लगातार धमकियों, उत्पीड़न और सामाजिक अलगाव के कारण परिवार को मानसिक व शारीरिक कष्ट झेलना पड़ा और जान का खतरा महसूस हुआ। इन्हीं आरोपों पर लूनी थाने में एफआईआर संख्या 161/2025 दर्ज हुई, जिसमें भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में यह कहा गया कि हालांकि जांच अब पहले के निर्देशों के अनुसार नियुक्त जांच अधिकारी द्वारा की जा रही है और याचिकाकर्ता को जांच की प्रक्रिया से कोई शिकायत नहीं है, फिर भी आरोपी पक्ष स्वतंत्र गवाहों को धमकियां देकर न्याय की प्रक्रिया में बाधा डालने की कोशिश कर रहे हैं। तीन स्वतंत्र गवाहों लाडूराम पुत्र चुनीलाल, अशोक पालीवाल पुत्र देवाराम (दोनों लोलावस गांव) और अनिल पुत्र तुलसीराम (काकेलाव गांव) के साथ-साथ उनके परिवारों को भी गवाह बनने की इच्छा के कारण समुदाय से बहिष्कृत कर दिया गया है।
FIR में कहा गया है कि कई सामुदायिक पंचायतें बुलाई गईं, जिनमें शिकायतकर्ता और उनके परिवार को कथित तौर पर कैद किया गया, अपमानित किया गया, सामाजिक बहिष्कार की धमकी दी गई और 1,00,000 रुपये जुर्माना देने के लिए मजबूर किया गया, साथ ही 21,00,000 रुपये की अतिरिक्त मांग की गई। यह भी आरोप लगाया गया कि आरोपी व्यक्तियों ने शिकायतकर्ता के रिश्तेदारों को उनके परिवार के साथ कोई सामाजिक संबंध बनाए रखने से रोका और अनुपालन न करने पर इसी तरह के बहिष्कार की धमकी दी।
अदालत ने मामले पर गंभीरता से विचार करते हुए कहा कि “दीपा राम मेघवाल मामले में जारी निर्देश केवल व्यक्तिगत मामलों में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए नहीं थे, बल्कि जबरदस्ती, धमकी और सामाजिक बहिष्कार जैसी अवैध सामाजिक प्रथाओं को समाप्त करने के लिए भी थे, जो कानून के शासन की नींव पर ही प्रहार करती हैं।” अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि “जांच के दौरान किसी भी व्यक्ति द्वारा गवाहों को धमकाने, प्रभावित करने, जबरदस्ती करने या सामाजिक बहिष्कार करने का कोई भी प्रयास आपराधिक न्याय प्रशासन में गंभीर हस्तक्षेप माना जाएगा और न्यायालय इसे बर्दाश्त नहीं करेगा।”
अदालत ने निर्देश दिया कि “यदि उक्त गवाह या इसी तरह की स्थिति में कोई अन्य व्यक्ति जांच अधिकारी के समक्ष धमकी, जबरदस्ती, सामाजिक बहिष्कार या धमकियों से संबंधित अभ्यावेदन पेश करता है, तो जांच अधिकारी ऐसे अभ्यावेदनों की वस्तुनिष्ठ और शीघ्र जांच करेगा तथा कानून के तहत आवश्यक निवारक, सुरक्षात्मक और दंडात्मक उपाय करेगा। अगर आरोपों में सार पाया जाता है तो जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ तत्काल और प्रभावी कार्रवाई की जाएगी, ताकि कोई भी गवाह सच्चाई बोलने से न रुके और जांच बाहरी दबावों से प्रभावित न हो।” अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि “जांच की प्रक्रिया में बाधा डालने, गवाहों को आतंकित करने या अवैध सामाजिक प्रतिबंधों को जारी रखने का कोई भी प्रयास गंभीरता से लिया जाएगा और सक्षम अधिकारी कानून के अनुसार तथा दीपा राम मेघवाल और शक्ति वाहिनी मामलों की भावना के अनुरूप ऐसी कार्रवाई से निपटने के लिए बाध्य होंगे।”
इन टिप्पणियों और निर्देशों के साथ अदालत ने याचिका का निपटारा कर दिया।
द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.
‘द मूकनायक’ जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है. अगर आप भी चाहते हैं कि ‘द मूकनायक’ हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज़ बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहे तो सपोर्ट करें.
यहां सपोर्ट करें