
भीलवाड़ा- राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के मांडल तहसील की अमरगढ़ ग्राम पंचायत के भाखलिया गांव में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान कथित जातिगत भेदभाव को लेकर विवाद सामने आया। आरोप है कि सरकारी मिडिल स्कूल में 15 अगस्त के कार्यक्रम के दौरान दलित समुदाय के दो सदस्यों को पहली बार अतिथि के तौर पर मंच पर बैठाया गया तो सामान्य और ओबीसी समुदाय के लोगों ने इसका विरोध किया। विवाद इतना बढ़ गया कि विरोध करने वाले लोग अपने बच्चों को लेकर कार्यक्रम से चले गए और समारोह का बहिष्कार कर दिया।
घटना को लेकर फिलहाल पुलिस में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है। दलित समुदाय के लोगों का कहना है कि रविवार शाम को समुदाय की बैठक में आगे की कार्रवाई पर फैसला लिया जाएगा।
भाखलिया गांव के सरकारी मिडिल स्कूल में 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस समारोह आयोजित किया गया था। इस बार कार्यक्रम में दलित समुदाय के दो सदस्यों गोपी लाल और रमेश बैरवा को अतिथियों के तौर पर मंच पर आमंत्रित किया गया था। बताया जा रहा है कि गांव में पहली बार दलित समुदाय के लोगों को इस तरह मंच पर अतिथि के रूप में शामिल किया गया। पहले आयोजनों में दलित और आदिवासी समुदाय के लोगो को अलग स्थान पर बिठाया जाता था।
दलित समुदाय के युवा बद्रीलाल बैरवा ने द मूकनायक से बातचीत में आरोप लगाया कि गोपी लाल और रमेश बैरवा को कुर्सी पर बैठाए जाने पर कुछ लोगों ने आपत्ति जताई। बद्रीलाल के मुताबिक, विरोध करने वालों की ओर से कथित तौर पर कहा गया, “अब ये लोग कुर्सी पर बैठेंगे और हम जमीन पर बैठेंगे क्या?” इसके बाद दोनों पक्षों के बीच बहस बढ़ गई।
बद्रीलाल के अनुसार, विवाद बढ़ने पर स्कूल के प्रिंसिपल और शिक्षकों ने लोगों को समझाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि सरकारी स्कूल में जाति या धर्म के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता और सभी को समान अधिकार है।
हालांकि, विरोध करने वाले लोग मानने को तैयार नहीं हुए। इसके बाद कुछ लोगों ने अपने बच्चों को भी वहां से उठाया और कार्यक्रम छोड़कर चले गए। इसके बावजूद एससी-एसटी समुदाय के सदस्यों की मौजूदगी में स्वतंत्रता दिवस समारोह पूरा किया गया। बद्रीलाल ने यह भी आरोप लगाया कि उन्होंने पूरे घटनाक्रम का वीडियो बनाने की कोशिश की थी। उनका कहना है कि बाद में समुदाय की बैठक में उन्हें कथित तौर पर धमकाया गया और कहा गया कि बाहर निकलने पर “देख लेंगे। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।
बद्रीलाल बैरवा के मुताबिक, भाखलिया गांव में करीब 30 एससी परिवार और लगभग 10 आदिवासी परिवार रहते हैं। इसके अलावा करीब 100 जाट समुदायों के परिवार और लगभग 50 परिवार ठाकुर, ओबीसी तथा ब्राह्मण बताए जाते हैं।
बद्रीलाल खुद एक बायोगैस प्लांट में सुपरवाइजर हैं। उनका कहना है कि वह अपने परिवार में पहली पीढ़ी के ग्रेजुएट हैं। उनके मुताबिक, गांव में अब बहुजन समाज के बच्चे भी पढ़ाई कर रहे हैं और शिक्षा के कारण धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ रही है।
बद्रीलाल का आरोप है कि गांव में सामाजिक स्तर पर जातिगत भेदभाव अभी भी मौजूद है। उनका दावा है कि एससी-एसटी समुदाय के लोगों को कई जगहों पर बराबरी का व्यवहार नहीं मिलता।
उनके अनुसार, “गांव में आज भी ऊंच-नीच का भेदभाव बहुत ज्यादा है। एससी-एसटी समाज का कोई व्यक्ति अगर ऊंची जाति के घर जाता है तो उसे अलग बैठाया जाता है। ग्लास और कप भी अलग होते हैं और हमें अपने कप खुद धोकर रखने पड़ते हैं।”
बद्रीलाल का कहना है कि इसके उलट जब किसी दूसरे समुदाय का व्यक्ति दलित परिवार के घर आता है तो परिवार के बुजुर्ग सम्मान में खड़े होते हैं।
उनके मुताबिक, “हमारे बुजुर्ग आज भी दूसरे समुदाय के व्यक्ति के सम्मान में खड़े हो जाते हैं, लेकिन ऊंच-नीच की मानसिकता से अभी पूरी तरह मुक्ति नहीं मिली है।”
मामले में अभी तक पुलिस को लिखित शिकायत नहीं दी गई है। बद्रीलाल ने बताया कि समुदाय में एक व्यक्ति की मृत्यु होने के कारण शनिवार को बैठक नहीं हो सकी। अब रविवार शाम को समुदाय की बैठक प्रस्तावित है।
उनके अनुसार, बैठक में यदि सभी लोग सहमति से पुलिस और जिला प्रशासन को शिकायत देने का फैसला करते हैं तो घटना की शिकायत संबंधित अधिकारियों को दी जाएगी और उसके बाद कानूनी कार्रवाई की मांग की जाएगी। भाखलिया की घटना ऐसे समय सामने आई है जब सरकारी शिक्षण संस्थानों में समानता और भेदभाव-मुक्त वातावरण को लेकर संवैधानिक प्रावधान स्पष्ट हैं। हालांकि, इस मामले में वास्तविक घटनाक्रम, कथित आपत्तियों और धमकी के आरोपों की पुष्टि पुलिस शिकायत और प्रशासनिक जांच के बाद ही हो सकेगी।
दलित अधिकार कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी ने घटना की वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा- "यह आजादी झूठी है! सरकारी स्कूल में स्वतंत्रता दिवस मनाने पहुंचे दलितों को कुर्सी पर बैठने से रोका गया और विरोध करने पर गाली-गलौज की गई।जब तक जब तक छुआछूत,जातिगत भेदभाव और गैर-बराबरी जिंदा है,आजादी अधूरी है.दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो।" फिलहाल गांव में समुदाय की बैठक के बाद ही तय होगा कि मामला पुलिस और जिला प्रशासन तक औपचारिक रूप से पहुंचता है या नहीं।
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