
जोधपुर- राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में जाति और समुदाय आधारित सामाजिक बहिष्कार की प्रथा के खिलाफ एक नई मुहिम शुरू हुई है। राजस्थान सामाजिक बहिष्कार रोकथाम अभियान (Rajasthan Social Boycott Prevention Campaign) सामाजिक बहिष्कार को खत्म करने के लिए राजस्थान में एक अलग और व्यापक कानून बनाने की मांग कर रही है। अभियान का नेतृत्व राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा गठित उस आयोग की सदस्य शोभा प्रभाकर कर रही हैं, जिसने राज्य के कई जिलों में सामाजिक बहिष्कार और खाप पंचायतों से जुड़ी प्रथाओं की पड़ताल की थी।
राजस्थान हाईकोर्ट ने 10 अप्रैल 2026 को सामाजिक बहिष्कार की प्रथा को असंवैधानिक घोषित करते हुए राज्य में इस समस्या से निपटने के लिए एक राज्य-विशिष्ट समर्पित कानून बनाने की आवश्यकता बताई जिसके बाद इस अभियान की शुरुआत हुई। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे कानून में केवल दोषियों के खिलाफ दंडात्मक प्रावधान ही नहीं होने चाहिए, बल्कि पीड़ितों के लिए मुआवजा और पुनर्वास की पर्याप्त व्यवस्था भी होनी चाहिए।
अभियान का कहना है कि सामाजिक बहिष्कार केवल किसी व्यक्ति को सामाजिक कार्यक्रमों से दूर करने तक सीमित नहीं है। इसके तहत व्यक्ति और उसके पूरे परिवार को सामाजिक और आर्थिक अलगाव, सामुदायिक संसाधनों से वंचित करने, आर्थिक बहिष्कार, भारी जुर्माने, सार्वजनिक अपमान और लंबे समय तक मानसिक आघात जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
द मूकनायक से बातचीत में अभियान का नेतृत्व कर रहीं शोभा प्रभाकर ने इस पहल की उत्पत्ति, निष्कर्षों और मांगों को विस्तार से बताया।
सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ मौजूदा अभियान की पृष्ठभूमि राजस्थान हाईकोर्ट के 7 मार्च 2025 के आदेश से जुड़ी है।
S.B. Criminal Miscellaneous Petition No. 1306/2025, Bhaka Ram vs. State of Rajasthan में हाईकोर्ट ने एक आयोग का गठन किया था। आयोग को राजस्थान में खाप पंचायतों द्वारा किए जाने वाले सामाजिक बहिष्कार और सामाजिक रूप से अलग-थलग करने की प्रथा से जुड़े मामलों की गहन जांच करने की जिम्मेदारी दी गई थी।
आयोग को प्रभावित जिलों के संबंधित जिला पुलिस अधीक्षकों के साथ समन्वय करने, संबंधित थानों के थाना अधिकारियों से बातचीत करने और स्थानीय अधिकारियों से जानकारी लेने का दायित्व दिया गया था।
इसका उद्देश्य उन गतिविधियों और प्रथाओं की व्यापक रिपोर्ट तैयार करना था, जिन्हें कथित तौर पर रीति-रिवाज और परंपराओं के नाम पर लागू किया जाता है।
आयोग ने पाली, नागौर, जैसलमेर, जालौर, बांसवाड़ा, जोधपुर ग्रामीण और जोधपुर महानगर के प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया। इन क्षेत्रों में अपने निरीक्षण और बातचीत के आधार पर आयोग ने अपनी सिफारिशें और टिप्पणियां तैयार कीं। आयोग की सिफारिशों और जमीनी अवलोकनों के आधार पर और ऐसे अत्याचारों को मान्यता देने में एक स्पष्ट कानूनी शून्यता को चिन्हित करते हुए, आयोग ने अपनी रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत की।
प्रभाकर स्वयं इस आयोग की सदस्यों में से एक थीं, जिससे उन्हें सार्वजनिक अभियान शुरू करने से पहले ही इस प्रथा की गंभीरता और व्यापकता को नजदीक से देखने का अवसर मिला।
आयोग की रिपोर्ट एक महत्वपूर्ण न्यायिक फैसले का आधार बनी। 10.04.2026 को, राजस्थान हाईकोर्ट ने, जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने याचिकाओं के एक समूह जिसमें प्रमुख याचिका एस.बी. क्रिमिनल मिसलेनियस पिटीशन नंबर 1344/2025 दीपा राम मेघवाल बनाम राजस्थान राज्य, में सामाजिक तिरस्कार की प्रथा को असंवैधानिक घोषित किया।
महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत केवल यह घोषणा करने तक सीमित नहीं रही। अदालत ने निर्देश दिया कि इस मुद्दे को समग्रता में संबोधित करने के लिए राज्य-विशिष्ट, समर्पित कानून बनाया जाना चाहिए, एक ऐसा कानून जो न केवल अपराधियों के लिए दंडात्मक प्रावधान तय करे, बल्कि पीड़ितों के लिए पर्याप्त प्रतिकर (मुआवजा) और पुनर्वास तंत्र भी शामिल करे, ताकि संविधान द्वारा प्रदत्त गरिमा, स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों की वास्तव में रक्षा हो सके।
प्रभाकर ने बताया कि इसी आदेश के अनुपालन में उन्होंने राजस्थान सामाजिक बहिष्कार अभियान का नेतृत्व शुरू किया, एक ऐसी पहल जो अदालत के निर्देशों को जमीन पर एक ठोस विधायी और संस्थागत प्रतिक्रिया में बदलने पर पूरी तरह केंद्रित है।
राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में सामाजिक बहिष्कार वास्तव में कैसे काम करता है, यह समझाते हुए प्रभाकर ने इसे एक व्यापक न्यायेतर (extrajudicial) प्रथा बताया जिसे स्थानीय भाषा में आमतौर पर "हुक्का-पानी बंद" या "हाथ बंद" कहा जाता है, जिसके जरिए स्वयंभू सामुदायिक निकाय व्यक्तियों और पूरे परिवारों पर सामूहिक दंड थोपते हैं।
अभियान के निष्कर्षों के अनुसार, ऐसे बहिष्कार के कारण व्यापक रूप से भिन्न होते हैं, जिनमें शामिल हैं:
अंतर-जातीय या प्रेम विवाह
समुदाय के सदस्यों द्वारा व्यक्तिगत अधिकारों का दावा करना
हानिकारक रीति-रिवाजों, जैसे मृत्युभोज, का विरोध करना
भूमि विवाद
अपने ही जाति/समुदाय के पंच या बुजुर्गों के अधिकार पर सवाल उठाना
प्रभाकर ने बताया कि इसके परिणाम विनाशकारी और असंगत होते हैं। पीड़ित और उनके पूरे परिवार को पूर्ण सामाजिक और आर्थिक अलगाव का सामना करना पड़ता है: सामुदायिक संसाधनों तक पहुंच से इनकार, सामाजिक संबंधों से इनकार जिसमें शादी, अंतिम संस्कार और त्योहारों से बहिष्कार शामिल है, आर्थिक बहिष्कार, और भारी मौद्रिक "जुर्माना" जो अक्सर ₹1 लाख से लेकर कई लाख रुपयों तक होता है। इसके साथ ही सार्वजनिक अपमान और लगातार मानसिक आघात भी शामिल है।
द मूकनायक से बात करते हुए प्रभाकर ने कहा, "यह एक तरह की सामाजिक मृत्यु है"। उन्होंने बताया कि यह सीधे तौर पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
महाराष्ट्र में 'महाराष्ट्र प्रोटेक्शन ऑफ़ पीपल फ़्रॉम सोशल बॉयकॉट (प्रिवेंशन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल) एक्ट, 2016' के ज़रिए भारत का पहला खास एंटी-बॉयकॉट कानून बना। इस कानून के तहत, सामाजिक बहिष्कार करने वालों को तीन साल तक की जेल (और गंभीर मामलों या खास कम्युनिटी पंचायत के आदेशों के लिए सात साल तक की जेल) और ₹1 लाख तक का जुर्माना हो सकता है।
अभियान के लक्ष्यों को रेखांकित करते हुए, प्रभाकर ने पांच प्रमुख उद्देश्य गिनाए:
राजस्थान सरकार को सामाजिक बहिष्कार को अपराध घोषित करने वाला एक व्यापक, पीड़ित-केंद्रित कानून बनाने के लिए बाध्य करना।
यह सुनिश्चित करना कि कानून में अपराधियों के लिए दंडात्मक प्रावधान हों, साथ ही मुआवजा, पुनर्वास, पीड़ित सुरक्षा और समयबद्ध न्याय के प्रावधान भी शामिल हों।
पीड़ितों के लिए मजबूत संस्थागत सहायता तंत्र स्थापित करना।
व्यापक जनजागरूकता पैदा करना और हाईकोर्ट के निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए दबाव बनाना।
"जातीय न्याय" की समानांतर व्यवस्था को समाप्त करना, जो कानून के शासन और संवैधानिक मूल्यों को कमजोर करती है।
अभियान के केंद्र में राजस्थान सामाजिक बहिष्कार (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम बनाने की मांग है। प्रभाकर ने इस कानून में क्या शामिल होना चाहिए, इस बारे में विस्तार से बताया:
कानून के बारे में: उन्होंने कहा कि इसमें सामाजिक बहिष्कार और संबंधित बलपूर्वक प्रथाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए, कड़ी सजा जिसमें आजीवन कारावास तक की सजा शामिल हो सकती है, तय की जानी चाहिए, पीड़ितों के लिए मुआवजा और पुनर्वास का प्रावधान होना चाहिए, और यह सामुदायिक, जातीय या धार्मिक पंचायतों द्वारा थोपे गए बहिष्कार के सभी रूपों को कवर करना चाहिए।
पीड़ित सहायता तंत्र: अभियान 24×7 समर्पित हेल्पलाइन, ऐसे मामलों से निपटने के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतें या विशेष सेल, निःशुल्क मनोवैज्ञानिक परामर्श और कानूनी सहायता, वित्तीय सहायता और आजीविका सहायता, तथा सामुदायिक दबाव और प्रतिशोध के खिलाफ पीड़ितों और गवाहों की तत्काल सुरक्षा की मांग कर रहा है।
संस्थागत तंत्र: अभियान चाहता है कि सभी लंबित और नए मामलों की निगरानी के लिए अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक स्तर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को राज्य नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाए। इसका समर्थन जिला कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों की देखरेख में काम करने वाले जिला-स्तरीय नोडल अधिकारियों द्वारा किया जाना चाहिए। अभियान यह भी मांग कर रहा है कि जांच 90 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से पूरी हो, एक केंद्रीकृत राज्य-स्तरीय डेटा और निगरानी प्रणाली हो, और शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ (2018) मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन किया जाए।
जागरूकता और रोकथाम: मांगों में राज्यव्यापी जन अभियान, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों का प्रशिक्षण, और गैरकानूनी पंचायती फरमानों की कथित वैधता को खत्म करने के लिए निरंतर सामुदायिक पहुंच शामिल है।
अभियान का प्रस्ताव केवल कानून बनवाने तक सीमित नहीं है। इसके तहत सामाजिक बहिष्कार की घटनाओं का दस्तावेजीकरण और पीड़ितों की आवाज को सामने लाने की योजना रखी गई है।
इसके लिए सोशल मीडिया और जमीनी स्तर पर जन लामबंदी का इस्तेमाल करने की बात कही गई है। अभियान गृह विभाग, विधानसभा और उच्च न्यायपालिका के समक्ष इस मुद्दे को उठाने के साथ-साथ सिविल सोसायटी, वकीलों, मानवाधिकार संगठनों और मीडिया के साथ नेटवर्क बनाने की बात करता है।
स्थानीय कार्यकर्ताओं और पीड़ितों की क्षमता बढ़ाने की दिशा में भी काम करने का प्रस्ताव है।
साथ ही पूरे राजस्थान में जन-जागरूकता अभियान चलाने और पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारियों को सामाजिक बहिष्कार के मामलों से संबंधित प्रशिक्षण देने की मांग की गई है।
अभियान का उद्देश्य समुदायों के भीतर उन अवैध पंचायत फरमानों की स्वीकार्यता को चुनौती देना है, जिनके जरिए सामाजिक बहिष्कार लागू किया जाता है।
अभियान के अनुसार, आगे की रणनीति में सोशल मीडिया और जमीनी स्तर पर जन लामबंदी, सामाजिक बहिष्कार के मामलों का दस्तावेजीकरण, पीड़ितों की आवाज को सामने लाना और सार्वजनिक दबाव तैयार करना शामिल है।
इसके साथ ही सरकार के सामने प्रस्तावित कानून को लेकर प्रतिनिधित्व करने और हाईकोर्ट के निर्देशों के पूर्ण क्रियान्वयन की मांग करने की बात कही गई है। अभियान सिविल सोसायटी संगठनों, वकीलों, मानवाधिकार संगठनों और मीडिया को भी इस प्रयास से जोड़ना चाहता है।
अभियान के अनुसार, इसका अपेक्षित परिणाम राजस्थान में एक मजबूत एंटी सोशल बॉयकॉट कानून का निर्माण है। इसके साथ पीड़ितों को समय पर न्याय और सुरक्षा देने वाली प्रभावी संस्थागत व्यवस्था तैयार करना भी इसका उद्देश्य है।
अभियान सामाजिक और सामुदायिक बहिष्कार की घटनाओं तथा उनकी सामाजिक स्वीकार्यता में कमी लाना चाहता है। साथ ही प्रभावित लोगों और परिवारों की गरिमा, सुरक्षा और संवैधानिक अधिकारों को बहाल करने तथा समानांतर सामाजिक दंड व्यवस्था के बजाय कानून के शासन को मजबूत करने की दिशा में काम करने की बात करता है।
अभियान का स्पष्ट संदेश है कि “सामाजिक बहिष्कार परंपरा नहीं है; यह मानव गरिमा और संविधान का उल्लंघन है।” अब अभियान राजस्थान में इसी आधार पर एक मजबूत कानूनी और संस्थागत प्रतिक्रिया की मांग कर रहा है।
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