
मुंबई/नांदेड़- कुछ लोग अपनी परिस्थितियों से लड़कर सिर्फ़ अपनी तक़दीर बदलते हैं। कुछ लोग पूरे समाज की तक़दीर बदलने निकल पड़ते हैं। चेंबूर की आनंद नगर बस्ती से निकली दीपाली साल्वे दूसरी श्रेणी में आती हैं।
एक ऑटो-रिक्शा चालक की यह बेटी आज मुंबई विश्वविद्यालय में पीएचडी कर रही हैं। वे ऑल इंडिया इंडिपेंडेंट शेड्यूल्ड कास्ट्स एसोसिएशन (AIISCA) की महाराष्ट्र महासचिव हैं और सावित्रीबाई फुले रिसोर्स सेंटर (SRC) की डायरेक्टर भी। साहिल वाकोडे मामले में हुए विरोध-प्रदर्शन में दीपाली ही अगुवाई कर रही हैं। उन्हें साहिल के माता पिता के साथ घंटों अनशन स्थल पर बैठे देखा जा रहा है और अपनी उपस्थिति और ऊर्जा से वे किस तरह अपने जवां बेटे को खो चुके हताश माता-पिता के दिलों में न्याय की उम्मीद जगा रही हैं, यह काबिले तारीफ है।
दीपाली के बारे में बता रहे हैं AIISCA फाउंडर और राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल सोनपिंपले, जो इस संघर्ष में उनके साथी हैं।
सोनपिंपले याद करते हैं, "मैं दीपाली से पहली बार 2022 में नांदेड़ में मिला था, वे मुंबई से अकेले सफ़र करके आई थीं, सिर्फ़ इसलिए कि हमारे आंबेडकरवादी वक्ताओं को सुन सकें। मैंने पूछा कि इतनी दूर कैसे आईं, तो उन्होंने बहुत सहजता से कहा, 'हाँ दादा, मैं यहाँ अपने सभी आंबेडकरवादी वक्ताओं को सुनने आई हूँ।'"
सोनपिंपले के मुताबिक़ तब उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि यह मुलाक़ात आगे चलकर साझा संघर्ष, संगठन और सामाजिक बदलाव की शुरुआत बनेगी।
बातचीत में दलितों की हालत और उन पर होने वाले अत्याचारों का ज़िक्र आया। दीपाली की पीड़ा सिर्फ़ निजी अनुभवों तक सीमित नहीं थी। उन्होंने कहा, "दादा, जब मैं अपने लोगों की हालत और उन पर होते अत्याचार देखती हूँ, तो लगता है कि हम आज भी पेशवाई के राज में जी रहे हैं।"
सोनपिंपले कहते हैं कि ये शब्द उन्हें भीतर तक छू गए। "यह एक युवा दलित महिला की वेदना थी, जिसने असमानता को क़रीब से देखा था और समझ लिया था कि चुप्पी कभी अन्याय का जवाब नहीं हो सकती।"
उसी दिन दोनों के बीच एक संकल्प बना: संगठित होने का, प्रतिरोध करने का और समाज को मज़बूत सामूहिक आवाज़ देने का। इसी सोच से AIISCA का जन्म हुआ। इसका मक़सद समुदायों को संगठित करना, उनके अधिकारों की बात उठाना और बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के अधूरे मिशन को आगे बढ़ाना है।
लेकिन साथियों को जल्द समझ आ गया कि सिर्फ़ राजनीतिक चेतना और सामाजिक लामबंदी काफ़ी नहीं है। बच्चों को पढ़ाई चाहिए थी, लड़कियों को मौक़े चाहिए थे, और सबसे वंचित छात्रों को मार्गदर्शन, संसाधन और कोई ऐसा व्यक्ति चाहिए था जो उनसे कहे कि उनके सपने पूरे हो सकते हैं। इसी ज़रूरत से सावित्रीबाई फुले रिसोर्स सेंटर (SRC) की शुरुआत हुई।
SRC, AIISCA द्वारा स्थापित एक स्वायत्त सामाजिक-शैक्षिक केंद्र है। यह वंचित और हाशिये पर रहने वाले एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों के छात्रों और युवाओं के उत्थान के लिए काम करता है। केंद्र छात्रों को उच्च शिक्षा, CUET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं और करियर काउंसलिंग के लिए मार्गदर्शन और सहायता देते हैं। डॉ. बी. आर. आंबेडकर और सावित्रीबाई फुले के विचारों से प्रेरित यह पहल शिक्षा को विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर किसी का अधिकार बनाने के मिशन पर चलती है।
शिक्षा के साथ-साथ ये केंद्र ज़मीनी स्तर पर नेतृत्व तैयार करने, रीडिंग सर्कल चलाने और जाति-विरोधी चेतना व समानता के विचार को आगे बढ़ाने का काम भी करते हैं। नागपुर, मुंबई, पुणे और बिहार सहित कई इलाक़ों में इसके केंद्र और अध्ययन समूह सक्रिय हैं। आज SRC के 15 से अधिक केंद्र हैं, और हर साल 100 से ज़्यादा छात्र इनकी मदद से देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में उच्च शिक्षा की ओर बढ़ते हैं।
सोनपिंपले कहते हैं, "हर सफल छात्र के पीछे एक ऐसा परिवार है जो सपने देखने की हिम्मत करता है, एक ऐसा युवा है जो हार मानने से इनकार करता है, और एक ऐसा आंदोलन है जो मानता है कि किसी बच्चे को जाति, वर्ग या हालात की वजह से शिक्षा से वंचित नहीं रहना चाहिए।"
दीपाली का अपना जीवन भी ऐसी हिम्मत और त्याग की कहानी है। वे चेंबूर, मुंबई की आनंद नगर बस्ती से आती हैं, जो दलित-बहुल झुग्गी इलाक़ा है। ऐसी बस्तियों में ग़रीबी अवसरों को सीमित कर देती है, लड़कियों के लिए पढ़ाई जारी रखना अक्सर मुश्किल होता है, और कम उम्र में शादी कई बार सपनों के उड़ान भरने से पहले ही उन्हें रोक देती है।
उनके पिता ऑटो-रिक्शा चलाते हैं। माँ सफ़ाई कर्मचारी हैं और स्त्री मुक्ति संघटना से जुड़ी हैं। परिवार के पास बड़ी आर्थिक पूँजी नहीं थी, लेकिन बच्चों को पढ़ाने का पक्का इरादा था। उसी त्याग ने बच्चों को एक अलग भविष्य की कल्पना करने का मौक़ा दिया।
दीपाली की पढ़ाई जालना के एक सरकारी स्कूल से शुरू हुई। फिर वे चेंबूर के डॉ. बी. आर. आंबेडकर हाई स्कूल और आचार्य कॉलेज तक पहुँचीं। ग़रीबी रास्ता रोक सकती थी, सामाजिक कलंक आत्मविश्वास तोड़ सकता था, और जाति व लिंग की बाधाएँ उन्हें अपने सपने छोड़ने पर मजबूर कर सकती थीं। पर उन्होंने हालात को अपनी क़िस्मत तय नहीं करने दिया।
साहिल वाकोडे मामले में हुए विरोध-प्रदर्शन में दीपाली ने अगुवाई की। जिस अन्याय को वे बरसों से अपने आसपास देखती आई थीं, उसके ख़िलाफ़ वे इस बार भी सबसे आगे खड़ी दिखीं।
आज दीपाली मुंबई विश्वविद्यालय में पीएचडी की शोधार्थी हैं, AIISCA की महाराष्ट्र महासचिव हैं और सावित्रीबाई फुले रिसोर्स सेंटर की डायरेक्टर हैं। अपनी बस्ती की उन गिनी-चुनी महिलाओं में वे शामिल हैं जिन्होंने डॉक्टरेट तक का सफ़र तय किया है।
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