
मुंबई- आईआईटी बॉम्बे में साहिल वाकोड़े की संदिग्ध मौत को लेकर न्याय की मांग कर रहे छात्रों, कार्यकर्ताओं और अभिभावकों पर मुंबई पुलिस तथा संस्थान प्रशासन की कार्रवाई लगातार बढ़ती जा रही है। संस्थान से जुड़े स्टूडेंट्स कलेक्टिव अम्बेडकर पेरियार फुले स्टडी सर्किल ने इस संवेदनशील मामले में पुलिस के दमनकारी रवैये की कड़ी निंदा की है।
18 सितंबर से मुख्य द्वार के बाहर हो रहे प्रदर्शनों को अवैध हिरासत और बल प्रयोग के जरिए दबाने की कोशिश की गई। प्रगतिशील संगठनों का आरोप है कि राज्य तंत्र और संस्थान प्रशासन मिलकर आंदोलन को कुचलने में जुटे हैं।
14 अक्टूबर को इंडिया अगेन्स्ट कास्टिज्म के बैनर तले कई प्रगतिशील संगठनों ने ‘चलो आईआईटी बॉम्बे’ का आह्वान किया। छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने निदेशक से मुलाकात की अनुमति मांगी और मामले की निष्पक्ष जांच, झूठे आख्यान फैलाने तथा मीडिया ट्रायल को बढ़ावा देने की जवाबदेही तय करने की मांग की। प्रतिनिधिमंडल पर पुलिस ने अत्यधिक बल प्रयोग किया। कई छात्र कार्यकर्ता गंभीर रूप से घायल हुए। बाद में प्रतिनिधिमंडल निदेशक से मिला और पत्र सौंपा, जिसमें निष्पक्ष जांच और जवाबदेही की मांग दोहराई गई।
18 अक्टूबर को साहिल की मौत के ठीक एक महीने पूरे होने पर संस्थान ने छात्रों पर पुलिस कार्रवाई की। यह घटना संस्थान की रवैये को साफ दर्शाती है। संस्थान ने किसी स्वतंत्र जांच से पहले ही मौत की परिस्थितियों को लेकर अपना रुख साफ कर दिया था। न्याय की मांग करने वालों पर त्वरित और कड़ी कार्रवाई होती दिख रही है, जबकि संस्थान के अंदर जवाबदेही तय करने में देरी बनी हुई है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि संस्थान प्रशासन मौत की जांच में जितनी सुस्ती दिखा रहा है, उतनी तेजी से असहमति को दबाने में जुटा हुआ है।
25 अक्टूबर को कई प्रगतिशील संगठनों ने चैत्यभूमि पर शांतिपूर्ण कैंडललाइट विजिल का आह्वान किया। मुंबई पुलिस ने मार्च शुरू होने से पहले ही कुछ लोगों को हिरासत में ले लिया। चैत्यभूमि से करीब 50 लोगों को हिरासत में लेकर वर्ली, बांद्रा और टारडियो पुलिस स्टेशनों में ले जाया गया। शाम 6 बजे के बाद महिला प्रदर्शनकारियों को भी बर्बर तरीके से हिरासत में लिया गया। आम नागरिकों को भी बिना कोई स्पष्ट कारण बताए हिरासत में रखा गया। पुलिस की इस कार्रवाई के बावजूद लोग साहिल की याद में मार्च निकालने में सफल रहे और न्याय की लड़ाई जारी रखने का संकल्प दोहराया।
साहिल के माता-पिता रविंद्र और सोनाली वाकोड़े 28 सितंबर से आज़ाद मैदान पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं। उन्हें भी बार-बार परेशान किया गया और कई बार हिरासत में लिया गया। 19 अक्टूबर को मुंबई पहुंचने पर उन्होंने प्रोफेसर सूर्यनारायण डोल्ला की गिरफ्तारी तक बेटे का शव लेने से इनकार कर दिया था। इसके बाद मुंबई पुलिस के उच्च अधिकारियों ने उन्हें मन बदलने के लिए दबाव डाला। अंतिम संस्कार यवतमाळ में पूरा होने के बाद जब वे मुंबई लौटे, तो पुलिस ने उन्हें दो दिनों तक अलग-थलग रखा। इस दौरान उनके परिवार के सदस्य भी उन तक नहीं पहुंच सके।
अभिभावकों ने कई बार आईआईटी बॉम्बे परिसर में जाने की अनुमति मांगी, लेकिन हर बार इनकार कर दिया गया। 18 अक्टूबर को उन्हें कैंपस के अंदर से ही हिरासत में लिया गया। आज़ाद मैदान पर शांतिपूर्ण धरने की अनुमति लेने के लिए भी उन्हें कई दौर की हिरासत और लगातार उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। शाम 6 बजे के बाद पुलिस उन्हें ले जाती है, कभी-कभी घर की जगह सड़क किनारे छोड़ देती है।
एपीपीएससी सहित कई प्रगतिशील संगठनों ने इन घटनाओं की कड़ी निंदा की है। उनका कहना है कि यह राज्य और संस्थानों में जातिगत वर्चस्व का उदाहरण है। पुलिस की निवारक कार्रवाइयां किसी भी जमावड़े को विरोध प्रदर्शन बना देती हैं। चैत्यभूमि जैसे स्थानों पर कौन इकट्ठा हो सकता है, इसका फैसला पुलिस खुद करती दिख रही है। संगठनों का आरोप है कि उच्च शिक्षण संस्थान हाशिए के छात्रों के लिए ‘डेथ मशीन’ की तरह काम कर रहे हैं। जब इस सच्चाई को सार्वजनिक रूप से उठाया जाता है, तो राज्य पुलिस और संस्थान प्रशासन दोनों मिलकर दमन पर उतर आते हैं।
एपीपीएससी ने स्पष्ट रूप से निदेशक शिरीष केदारे के इस्तीफे और प्रो. सूर्यनारायण डुला के तत्काल निलंबन की मांग की है। संगठन ने कहा है कि किसी भी तरह की राज्य हिंसा, जो न्याय की लड़ाई को कुचलने की कोशिश करे, उसकी कड़ी निंदा की जानी चाहिए।
प्रदर्शनकारी साहिल वाकोड़े के लिए न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहरा रहे हैं। वे कहते हैं कि ऐतिहासिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना और वर्तमान सामाजिक बहिष्करण का विरोध करना लोकतंत्र की मूल भावना का हिस्सा है।
साहिल के पिता की शिकायत के बाद पवई पुलिस ने आरोपी प्रो. सूर्यनारायण डुला के खिलाफ उत्पीड़न और जातिगत भेदभाव (SC/ST Act और आत्महत्या के लिए उकसाने) के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज की थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए बाद में इसकी जांच मुंबई पुलिस क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई। क्राइम ब्रांच अब तक इस मामले में संस्थान के निदेशक (Director), संबंधित प्रोफेसरों, सहपाठियों और शिक्षकों समेत 40 से अधिक लोगों के बयान दर्ज कर चुकी है।मुख्य आरोपी प्रोफेसर सूर्यनारायण दुल्ला से पुलिस ने करीब 8 घंटे तक कड़ी पूछताछ की है। प्रोफेसर ने अपने बयान में खुद पर लगे सभी आरोपों से इनकार किया है। पुलिस परीक्षा हॉल की सीसीटीवी फुटेज और संस्थान के एससी/एसटी सेल (SC/ST Cell) के रिकॉर्ड खंगाल रही है। इसके अलावा, पुलिस साहिल के लॉक हो चुके आईफोन के डेटा को रिकवर करने की कोशिश कर रही है ताकि डिजिटल सबूत जुटाए जा सकें।
पुलिस जांच के समानांतर, आईआईटी बॉम्बे प्रशासन ने आरोपी प्रोफेसर सूर्यनारायण दुल्ला को उनके प्रशासनिक डीन पद से हटा दिया है और उन्हें छुट्टी पर भेज दिया है। इसके अलावा संस्थान ने मामले की आंतरिक जांच के लिए एक कमेटी का भी गठन किया है। साहिल के माता-पिता वर्तमान में पुलिस की अब तक की जांच से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं क्योंकि आरोपी प्रोफेसर की गिरफ्तारी नहीं हुई है, और वे इस मामले की निष्पक्ष जांच के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख करने की तैयारी कर रहे हैं।
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