
नई दिल्ली- NEET पेपर लीक मामले में जुलाई में छात्रों के लिए 23 दिन तक अनशन करने वाली JNU की पीएचडी छात्रा नेहा बोरा के नाम चेन्नई निवासी के. शरद हक्सर का एक भावुक संदेश चर्चा में है। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण की पोस्ट के जरिए सामने आए इस संदेश में एक पिता ने अपनी सोच, अपनी बेटी और नेहा के संघर्ष को लेकर दिल की बात कही है।
शरद हक्सर लिखते हैं कि शादी के समय ही उन्होंने तय कर लिया था कि उन्हें सिर्फ एक संतान चाहिए, और मन में उम्मीद थी कि बेटी हो। उन्हें बेटी का आशीर्वाद मिला। बेटी को पहली बार गोद में लेते समय उन्होंने मन ही मन वादा किया था कि उसे कभी अपने माता-पिता का समय बांटना नहीं पड़ेगा और उसे कभी ध्यान के लिए इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि उन्होंने ऐसे परिवार देखे थे जहां चार-पांच बच्चे थे और माता-पिता सुबह से रात तक भागदौड़ करते थे, फिर भी कोई न कोई बच्चा उपेक्षित रह जाता था। साथ ही उनका मानना था कि देश की आबादी बहुत ज्यादा है और प्रकृति इसकी कीमत चुका रही है। इसलिए एक बच्चा उन्हें जिम्मेदाराना फैसला लगा। वर्षों तक उन्होंने इस पर कभी सवाल नहीं किया।
हक्सर के अनुसार इस साल उन्होंने नेहा बोरा के बारे में पढ़ा, जो 29 वर्ष की हैं, JNU में पीएचडी कर रही हैं और उत्तराखंड के पहाड़ी कस्बे खतीमा की रंगमंच कलाकार हैं। NEET पेपर लीक के बाद वे जंतर-मंतर पर उन छात्रों के लिए बैठ गईं जिन्हें वे जानती तक नहीं थीं। वे वे बच्चे थे जिन्होंने वर्षों पढ़ाई की और वे माता-पिता जिन्होंने कोचिंग पर जमा-पूंजी लगा दी, फिर भी हार गए।
नेहा 23 दिन तक बिना भोजन के रहीं। शुरुआत में उनका वजन 66 किलो था और उन्होंने 7 किलो से ज्यादा वजन खो दिया। अनशन के अंतिम दिनों में डॉक्टर दिन में तीन-चार बार उनका खून लेते थे। हक्सर लिखते हैं कि यह पढ़कर वे रात भर सो नहीं सके। उन्हें अपनी बेटी उसी जगह दिखाई देने लगी, दिल्ली की गर्म सड़क पर, कमजोर और थकी हुई, और डॉक्टर उसकी कलाई थामे हुए। उनके मुताबिक वे यह सब खड़े होकर नहीं देख पाते और बेटी से अनशन तोड़ने की गुहार लगाते। लेकिन नेहा तब तक नहीं रुकीं जब तक काम पूरा नहीं हुआ।
अनशन खत्म होने के बाद नेहा ने कहा कि उनका शरीर खाना खाना भूल चुका है और उसे बच्चे की तरह फिर से सीखना होगा। इसके बावजूद, कमजोर हालत में वे घर जाकर आराम करने के बजाय बिहार पहुंचीं, जहां उन्होंने 600 से ज्यादा गिरफ्तार छात्रों से मुलाकात की, उन्हीं से जो उनके साथ खड़े रहे थे।
खुद को ऊर्जा के साथ काम करने वाला बताने वाले हक्सर लिखते हैं कि गुस्सा भारी होता है और जल्दी जल जाता है। कोई भी इंसान सिर्फ गुस्से के सहारे 23 दिन बिना खाए नहीं रह सकता, इतनी दूर तक सिर्फ प्रेम ही इंसान को ले जा सकता है।
हक्सर कहते हैं, उन्होंने पढ़ा कि नेहा के पिता सेना में थे और परिवार एक पोस्टिंग से दूसरी पोस्टिंग पर घूमता रहा। उनकी पत्नी के पिता भी सेना में थे, जिन्हें वे ससुर नहीं, सिर्फ "पापा" कहते हैं। उनकी पत्नी 13 स्कूलों में पढ़ीं। यानी 13 बार स्कूल का पहला दिन, 13 बार ऐसी कक्षा में कदम रखना जहां कोई नाम नहीं जानता, और 13 बार उन दोस्तों को अलविदा कहना जिनसे दोबारा मुलाकात नहीं हुई। उनके अनुसार सेना के बच्चे मुस्कुराना, सामान बांधना और फिर से शुरुआत करना सीख जाते हैं, और कोई नहीं पूछता कि इसमें कितना दर्द होता है। यही ताकत वे अपनी पत्नी और नेहा, दोनों में देखते हैं।
हक्सर ने लिखा कि रांची में एक व्यक्ति ने नेहा के चेहरे पर स्याही फेंकी और उन्हें "राष्ट्र-विरोधी" कहा। नेहा ने जवाब दिया कि दिल्ली में वे पैलेट और लाठियों का सामना कर चुकी हैं, स्याही उन्हें नहीं डराएगी। हक्सर के शब्दों में, स्याही धुल जाती है, और ऊर्जा के काम में कहा जाता है कि लोग जो फेंकते हैं वह तभी टिकता है जब आप उसे भीतर ले लें। नेहा यह बिना पेंडुलम थामे ही जानती दिखती हैं।
नेहा के परिवार ने उनके रास्ते से सहमति नहीं जताई थी और घर में झगड़े हुए। लेकिन अनशन के दौरान उनकी मां जंतर-मंतर पहुंचीं। हक्सर कहते हैं कि वे नहीं जानते दोनों के बीच क्या बात हुई, पर एक माता-पिता होने के नाते समझते हैं कि सड़क पर कमजोर लेकिन डटी हुई संतान को देखकर हर बहस भुला दी जाती है, बस यही याद रहता है कि "यह मेरा बच्चा है।"
नेहा ने बताया है कि उन्होंने अभी तक अपने पिता से बात नहीं की है। हक्सर लिखते हैं कि वे उन्हें नहीं जानते, पर एक पिता होने के नाते समझते हैं कि हम जैसे पुरुषों के लिए कुछ बातें जुबां पर लाना कितना कठिन होता है। इसलिए उन्होंने चेन्नई से वह बात कह दी:
"बेटा, हमें तुम पर गर्व है। अब जाकर कुछ ढंग से खा लो। काश मेरी एक और बेटी होती"
हक्सर ने स्वीकार किया कि इस पूरी घटना के बीच उनके मन में एक ऐसा विचार आया जिसकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी: काश उनकी एक और बेटी होती, नेहा जैसी। उन्होंने साफ किया कि इससे उनकी अपनी बेटी का स्थान कम नहीं होता, वह उनकी दुनिया है और हमेशा रहेगी।
लेकिन नेहा ने उन्हें एक कठिन सवाल पूछने पर मजबूर किया: हम पूरी जिंदगी अपने बच्चों को सुरक्षित रखने और आगे बढ़ाने में लगा देते हैं, पर क्या उन्हें यह भी सिखाते हैं कि पीछे छूट गए लोगों की तरफ देखें? और अगर कल वे किसी और के लिए खड़े हों, तो क्या हम उनके साथ खड़े होंगे, जैसे नेहा की मां खड़ी हुईं, या उनसे कहेंगे कि घर लौट आओ और चुप रहो?
उनके शब्दों में, हमारा काम उस रोशनी को बचाना है, भले ही वह हमें डराती हो।
द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.
'द मूकनायक' जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है। अगर आप भी चाहते हैं कि 'द मूकनायक' हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहें तो सब्सक्राइब करें।
यहां सब्सक्राइब करें