
नई दिल्ली: एक समय ऐसा भी था जब डॉ. कोय्याला रूथ जॉन पॉल को दो वक्त की रोटी के लिए भी कड़ा संघर्ष करना पड़ता था। अपनी पहचान एक ट्रांसजेंडर महिला के रूप में उजागर करने के बाद उन्हें परिवार ने बेदखल कर दिया। कई सालों तक अपना खर्च चलाने के लिए उन्होंने नौकरियां ढूंढीं और दर-दर भटकीं, लेकिन डॉक्टर बनने का सपना कभी नहीं छोड़ा।
जब पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन के रास्ते में ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों के लिए स्पष्ट नियमों की कमी सबसे बड़ी बाधा बनी, तो उन्होंने हार मानने के बजाय न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।
शनिवार 10 अक्टूबर को उनका यह लंबा संघर्ष एक ऐतिहासिक मुकाम पर पहुंच गया। डॉ. रूथ ने हाल ही में घोषित एमडी/एमएस परीक्षा के सभी विषयों को पास कर लिया है। उन्होंने हैदराबाद के सनतनगर स्थित ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल से इमरजेंसी मेडिसिन में अपनी पोस्टग्रेजुएट डिग्री सफलतापूर्वक पूरी कर ली है, जहां वह 2023-26 शैक्षणिक सत्र की छात्रा थीं।
इसके साथ ही वह भारत में पोस्टग्रेजुएट मेडिकल कोर्स पूरा करने वाली देश की पहली ट्रांसजेंडर व्यक्ति बन गई हैं। अपनी इस सफलता पर खुशी जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि यह उनके और उनके पूरे समुदाय के लिए गर्व की बात होने के साथ-साथ जीवन की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।
खम्मम जिले से ताल्लुक रखने वाली डॉ. रूथ तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी हैं। उनकी परवरिश एक आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में हुई। जब वह महज आठ साल की थीं, तब उनके पिता का निधन हो गया, जिसके बाद उनकी मां ने ही उनका पालन-पोषण किया। अपने गृह जिले से स्कूली और इंटरमीडिएट की शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा (NEET) पास की और अंडरग्रेजुएट मेडिकल की पढ़ाई शुरू की।
इसी पढ़ाई के दौरान उन्होंने समाज के सामने अपनी पहचान एक ट्रांसजेंडर के रूप में स्वीकार की। इस सच को जानने के बाद परिवार ने उनसे मुंह मोड़ लिया, जिसके कारण उन्हें लगभग छह साल तक अपनों से दूर रहना पड़ा।
घर से अलग होने के बाद का दौर बेहद चुनौतीपूर्ण और असुरक्षा से भरा रहा। उन्हें भारी आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा और स्वतंत्र रूप से जीवन यापन के लिए उन्हें हर दिन लड़ना पड़ा। डॉ. रूथ बताती हैं कि कई बार ऐसा भी हुआ जब उनके पास खाने तक के लिए पैसे नहीं होते थे।
इसी जद्दोजहद के बीच, साल 2021 में उन्हें भारत के पहले ट्रांसजेंडर क्लिनिक, मित्र क्लिनिक (जिसका नाम अब सबरंग क्लिनिक है) में पार्ट-टाइम काम मिल गया। यहां उन्होंने करीब दो साल तक सेवाएं दीं और साथ ही अपनी पीजी मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी भी पूरी लगन से जारी रखी।
प्रवेश परीक्षा पास कर लेना ही उनके संघर्ष का अंत नहीं था। डॉ. रूथ ने बताया कि पीजी मेडिकल काउंसलिंग के दौरान उन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा क्योंकि वहां ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को शामिल करने के लिए कोई स्पष्ट प्रोटोकॉल मौजूद नहीं था। इसके बाद, ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ता वैजयंती वसंता मोगली की मदद से उन्होंने तेलंगाना उच्च न्यायालय का रुख किया।
यह कानूनी लड़ाई लगभग दो साल तक चली। अंततः, हाईकोर्ट के एक अंतरिम आदेश ने उनके दाखिले का रास्ता साफ कर दिया और साल 2023 में उन्हें ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज में इमरजेंसी मेडिसिन में सीट मिल गई।
मेडिकल कॉलेज में दाखिला उनके जीवन का एक बड़ा मोड़ जरूर था, लेकिन जमीनी स्तर पर मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई थीं। इमरजेंसी मेडिसिन ट्रेनी के तौर पर काम करते हुए उन्हें मरीजों के सबसे नाजुक पलों में उनका इलाज करना होता था। इस दौरान उन्हें उस सामाजिक नजरिए और पूर्वाग्रह का भी सामना करना पड़ा, जो अक्सर लोगों के मन में ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रति होता है।
उन्होंने याद करते हुए बताया कि शुरुआत में कुछ लोग उन्हें लेकर असहज थे और यह नहीं समझ पा रहे थे कि कैसी प्रतिक्रिया दें। लेकिन जब उन्होंने मरीजों से सहजता से बातचीत शुरू की और पूरी लगन से उनकी देखभाल की, तो लोगों का नजरिया बदल गया और उनके प्रति झिझक पूरी तरह खत्म हो गई।
अब अपनी पोस्टग्रेजुएट की पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉ. रूथ एक बड़े उद्देश्य के साथ आगे बढ़ना चाहती हैं। उनका लक्ष्य अब अपने इस मेडिकल ज्ञान का उपयोग जरूरतमंदों की मदद के लिए करना है। वह खास तौर पर उन ट्रांसजेंडर लोगों की मदद करना चाहती हैं, जिन्हें आपातकालीन और क्रिटिकल केयर की सख्त आवश्यकता होती है। उनका दृढ़ संकल्प है कि वह लिंग पहचान या कामुकता के आधार पर बिना किसी भेदभाव के हर मरीज की पूरे समर्पण के साथ सेवा करेंगी।
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