
क्या पुरुष भी उन्हीं दोषों से ग्रस्त नहीं होते, जिनका आरोप स्त्रियों पर लगाया जाता है?
ताराबाई शिंदे
युवाओं के आंदोलन में एक ओर अभिजीत दीपके और उनकी टीम का नेतृत्व रहा, तो दूसरी ओर नेहा बोरा सहित लेफ्ट संगठनों की लड़कियों का।
किसी भी स्तर पर लड़कियाँ अपने पुरुष साथियों से अलग नहीं थीं। रील के लिए पोज़ देतीं, डायलॉग बोलतीं या दूसरी गतिविधियाँ करती लड़कियाँ भी जानती थीं कि कौन-सी भाषा हुक्मरानों को चुभेगी और कौन-सा दृश्य वायरल होगा। रील बनाती लड़कियाँ उसके आर्थिक पक्ष को भी जानती हैं, उसे हासिल करती हैं। वे जानती हैं कि वायरल होने के साथ उनके बटुए में डॉलर का अर्थशास्त्र भी जुड़ा है।
उन पर कई खेमों से हमले हो रहे हैं। दक्षिणपंथी समूह अपने कुंद दिमाग और एजेंडे के साथ तो हमलावर हैं ही, कुछ उदार सोच वाले लोग भी कम-से-कम लड़कियों की भाषा, उनके कपड़ों और उनके दृश्यों के लिए एक सीमा तय करना चाहते हैं। कुछ लड़कियाँ समाज द्वारा तय मानक की कपड़ो में नहीं थीं और 'च' सीरीज़ की गालियाँ भी धड़ल्ले से दे रही थीं। उन्हें 'बुरी लड़कियाँ' कहा जा रहा है।
इन लड़कियों ने अभी भी और इसके पहले भी अपने लिए ऐसे संबोधनों को ठेंगा दिखाया है और खुद को baddie कहकर बताया है कि बुरी होना मतलब cool, confident, intelligent और charming होना है।
जो लोग उनके लिए मानक तय कर रहे हैं या उन्हें गालियाँ दे रहे हैं, उन्हें न तो 'च' वर्ड सीरीज़ की गालियों में अपना उद्गार व्यक्त करती लड़कियाँ अच्छी लगती हैं, न प्रतिरोध के लिए सामने आईं डंडे खाती लड़कियाँ। उन्हें तो पढ़ती और बढ़ती लड़कियाँ भी पसंद नहीं हैं। उन्हें पसंद हैं लड़कियों को पीछे से डंडा मारते या डंडा डालते हुए राज्य और परिवार-संरक्षित मर्द। लड़कियों ने कंधे से कंधा मिलाकर डंडे भी खाए और जेल भी गईं।
ऐसा नहीं है कि खुद को गर्व से baddie कहने वाली लड़कियों से पहले की पीढ़ी ने ऐसा नहीं कहा या अपने ऐक्शन और शब्दों से 'बुरी लड़की' की छवि को प्यार नहीं किया। जेन ज़ेड से पहले की मिलेनियल पीढ़ी की भाजपा की बददिमाग सांसदों में से एक कंगना रनौत ने भी तो कभी 'बुरी लड़की' की छवि से प्यार किया। उस छवि का व्यावसायिक दोहन भी किया और अब उसका विरोध उन्हें सत्ता दिला रहा है। विरोध के नाम पर सीमा लांघकर वह सत्ता के साथ अपना स्पेस विस्तार कर रही है।
इन लड़कियों के अलावा भी लड़कियाँ थीं, हैं, उस आंदोलन में। नेहा के बारे में मैं लिख चुका हूँ। एसएफआई की आइशे घोष की गिरफ्तारी के लिए पुलिस उनके पार्टी दफ्तर तक पहुँच गई। 2019 में वे जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष बनीं। इस प्रदर्शन में उन्होंने तीन दिन का प्रतीकात्मक अनशन भी किया था। ये लड़कियाँ हर स्तर पर नेतृत्व के लिए तैयार हैं, राजनीतिक सोच और राजनीतिक शब्दावली से लैस। ये जेन Z हैं या थोड़ा पहले पैदा हुई जेन Y।
लड़कियाँ जिस वक्त दहलीज़ पार करती हैं, परम्परा द्वारा तय सीमाओं को चुनौती देती हैं, उसी वक्त वे देहमुक्ति, देह के बिंब और उस पर आरोपित टैबुओं से मुक्ति की ओर भी कदम बढ़ा देती हैं। अच्छी-बुरी के दायरे को 19वीं सदी से ही पारंपरिक और लिबरल—दोनों तरह का पितृसत्ताक तय करने की कोशिश करता रहा है, और वे हर दौर में इस फासले को संकुचित करती रही हैं। बल्कि वे बताती हैं कि तुम्हारी निर्धारित 'बुरी' ही वास्तव में अच्छी है—baddie है। भाजपा समर्थकों के ट्रोल को ठेंगा दिखाते हुए थोड़ी ही देर पहले राजनीतिक बाइट देती लड़कियों ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जमकर नाचा, खूब नाचा, बिना किसी भेद के लड़कियों और लड़कों के साथ।
अभिजीत घोषित तौर पर अभी किसी संगठित राजनीतिक दल से नहीं जुड़े हैं। नेहा बोरा और आइशे घोष जुड़ी हैं। वे संसदीय राजनीति के फ्रेम के भीतर हैं और सीजेपी अभी इस दायरे में नहीं आया है। सीजेपी के मंच पर भी लड़कियाँ थीं, लेकिन वे कोरम पूरा करती दिखीं। वे कम-से-कम मुझे बोलती नहीं दिखीं। जब-जब अभिजीत या दूसरे पुरुष नेता बोल रहे थे, वे उनके बगल में हर बार खड़ी दिखीं। इसका अर्थ यह नहीं कि वे नेतृत्व नहीं कर सकतीं।
अब सवाल है कि आगे क्या? यह उन्हें तय करना है। राजनीति से अपने ढंग से संवाद करने और उसमें भागीदारी करने में आज की युवा पीढ़ी पीछे नहीं है और आगे भी नहीं रहेगी। इस पीढ़ी को जेन अल्फा या उससे आगे के युवाओं से भी संवाद करना है। उनकी उम्मीदों को आकार देना है या उनकी उम्मीदें उनसे टकराएँगी।
जो जंतर-मंतर पर हुआ, संघर्ष उससे बड़ा है और जाहिर है, उसके नेता और उसके भागीदार इसे समझते भी हैं। राजनीतिक, सांस्कृतिक और आकस्मिक स्पेस पर बैठे बेबी बूमर्स या जेन एक्स के तिकड़मों को वे भी देख रहे हैं। लेकिन उन पर उम्मीदों का ऐसा बोझ क्यों डाला जाए कि जो आप नहीं कर सके, 'वैसा जेन ज़ेड अभियान ' आपके पोस्ट-ट्रुथ का सच बन जाए? वे उसका टूल क्यों बनें? अपनी राह वे खुद तय कर रहे हैं। उन्होंने आपको किसान आंदोलन और शाहीन बाग आंदोलन के बाद एक उम्मीद दी है। अब आप उन पर अपने संदेहों का पोस्ट-ट्रुथ रचें, उनके स्पेस को सबोटाज करने की राजनीति करें या उनके राजनीतिकरण की प्रक्रिया में वास्तव में शामिल हों—यह आपको तय करना है। हर युवा पीढ़ी का आंदोलन अपनी पिछली पीढ़ी से पुष्ट और संवर्धित होता है। और हाँ, कोई भी युवा पीढ़ी मोनोलिथ नहीं होती, होमोजीनियस नहीं होती। जंतर-मंतर के पहले एससी-एसटी आंदोलन भी एक सच था। उस वक्त भी देश भर के युवाओं ने गोलियाँ तक खाई थीं, महज़ आठ साल पहले।
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