नाबालिग को बेचने और बाल विवाह के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने पोक्सो कोर्ट की 20 साल की सजा पर लगाई रोक

पोक्सो कोर्ट ने सुनाई थी 20 साल की कठोर कैद, हाईकोर्ट ने कहा, "अभियोजन के साक्ष्य में गंभीर कमियां, बेचने के आरोप में पैसे के लेन-देन का पक्का सबूत नहीं"
नाबालिग को बेचने के आरोप में दो दोषियों को राजस्थान हाईकोर्ट से राहत, सजा निलंबित
नाबालिग को बेचने के आरोप में दो दोषियों को राजस्थान हाईकोर्ट से राहत, सजा निलंबितफोटो इन्टरनेट
Published on: 

जोधपुर/उदयपुर- राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने नाबालिग लड़की को बेचने और उससे विवाह करने के मामले में पोक्सो कोर्ट से सजा पाए दो दोषियों को बड़ी राहत दी है। जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने दोनों की 20 साल की सजा अपील के अंतिम निपटारे तक निलंबित कर दी और उन्हें जमानत पर रिहा करने के आदेश दिए। आदेश 14 अक्टूबर आया।

यह बरी करने का फैसला नहीं है। हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि उसने अपीलों के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय नहीं दी है। दोषसिद्धि फिलहाल कायम है और अपीलें लंबित हैं। केवल सजा का क्रियान्वयन अपील तय होने तक रोका गया है।

उदयपुर की विशेष न्यायाधीश, पोक्सो अधिनियम प्रकरण संख्या-1 की अदालत ने 25 मार्च 2026 को सेशन्स केस संख्या 51/2025 में दो आरोपियों को दोषी ठहराया था। दोनों को अधिकतम 20 वर्ष का सश्रम कारावास और 1,00,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। यह सजा पोक्सो अधिनियम की धारा 6/17 और 5/6 में दी गई। भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 143(4) और 144 के तहत कम सजाएं भी दी गईं।

इस फैसले के खिलाफ दोनों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की और सजा निलंबन के लिए अलग-अलग प्रार्थना पत्र लगाए। प्रतिवादी के रूप में राज्य सरकार (लोक अभियोजक के माध्यम से) और उदयपुर के कच्ची बस्ती सज्जन नगर, थाना अम्बामाता निवासी अमरपाल यादव पक्षकार थे। दोनों प्रार्थना पत्रों की सुनवाई साथ-साथ हुई।

अपीलकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता जे.वी.एस. देवड़ा और आर.एस. रावल पेश हुए। उन्होंने तर्क दिया कि:

  • निचली अदालत ने मामले के कानूनी और तथ्यात्मक पहलुओं को ठीक से नहीं परखा, जिससे दोषसिद्धि की गलत निष्कर्ष निकला।

  • प्रथम अपीलीय अदालत के रूप में हाईकोर्ट साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन कर सकता है।

  • अपीलकर्ता ट्रायल के दौरान जमानत पर रहे और स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं किया।

  • अपील के निपटारे में समय लगेगा, इसलिए सजा निलंबित की जानी चाहिए।

  • अभियोजन का मामला पूरा सही मान लिया जाए, तब भी वह बाल विवाह निषेध अधिनियम के उल्लंघन से आगे नहीं जाता।

राज्य की ओर से उप शासकीय अधिवक्ता नरेंद्र गहलोत और राजेंद्र चरण पेश हुए। लोक अभियोजक ने सजा निलंबन की प्रार्थना का विरोध किया।

नाबालिग को बेचने के आरोप में दो दोषियों को राजस्थान हाईकोर्ट से राहत, सजा निलंबित
TM Special |'सामाजिक बहिष्कार' को राजस्थान हाईकोर्ट ने बताया असंवैधानिक, अब कानून की मांग को लेकर चल रही बड़ी मुहिम

हाईकोर्ट ने कानूनी सिद्धांतों पर क्या कहा?

जमानत और सजा निलंबन का अंतर: कोर्ट ने कहा कि धारा 439 CrPC (अब धारा 483 BNSS) के तहत जमानत दोषसिद्धि से पहले के चरण में मिलती है। धारा 389 CrPC (अब धारा 430 BNSS) के तहत सजा निलंबन दोषसिद्धि के बाद का मामला है। इसमें अपीलीय अदालत को प्रथम दृष्टया यह परखना होता है कि दोषसिद्धि और सजा टिकाऊ है या नहीं।

निर्दोषता की धारणा: दोषसिद्धि के बाद निर्दोषता की धारणा समाप्त हो जाती है। फिर भी अपीलीय अदालत को देखना होता है कि अपील में उठाए गए आधार "सारभूत और तर्कयोग्य मामला" बनाते हैं या नहीं। निचली अदालत के निष्कर्ष बहस योग्य लगें तो सजा निलंबित की जा सकती है।

प्रथम दृष्टया संतुष्टि पर्याप्त: सजा निलंबन के चरण पर अदालत को गुण-दोष पर निर्णायक निष्कर्ष दर्ज करने की जरूरत नहीं होती, वरना अपील की अंतिम सुनवाई पर असर पड़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला:

  • मुना बिसोई बनाम उड़ीसा राज्य (16 फरवरी 2026): हाईकोर्ट ने कहा कि दोषी के कारण न हुई आपराधिक अपीलों की लंबी लंबितता सजा निलंबन का वैध आधार है।

  • कश्मीरा सिंह बनाम पंजाब राज्य (1977) 4 SCC 291: इसमें सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों के लंबित रहने के दौरान दोषियों को लंबे समय तक जेल में रखने की प्रथा को "न्याय का उपहास" बताया था।

अपीलों की भारी लंबितता: कोर्ट ने कहा कि वह बड़ी संख्या में लंबित आपराधिक अपीलों के बोझ तले है और उनके जल्द निपटारे की संभावना अनिश्चित है। ऐसे में, जब अपील में बहस योग्य आधार हों और देरी अपीलकर्ता के कारण न हो, तब लगातार जेल में रखना उचित नहीं होगा।

जस्टिस फरजंद अली ने कहा कि उन्होंने अभियोजन के साक्ष्यों की बारीकी से जांच की। उनके अनुसार प्रथम दृष्टया अभियोजन संदेह से परे दोष सिद्ध करने में विफल रहा है। कोर्ट ने एक गवाह की गवाही को "काफी महत्वपूर्ण" बताया। उसने स्वीकार किया कि उसे नहीं पता कि उसे किसी धनराशि के बदले बेचा गया था या नहीं। हाईकोर्ट ने इसे "मामूली चूक" नहीं माना, क्योंकि पैसे के लेन-देन का आरोप अभियोजन की कहानी की मुख्य कड़ी है।

कोर्ट के अनुसार अभियोजन "विश्वसनीय, ठोस और संतोषजनक साक्ष्य" पेश नहीं कर सका कि कोई आर्थिक प्रतिफल दिया या लिया गया। इसलिए लड़की को धन लेकर बेचे जाने का आरोप "अपर्याप्त रूप से प्रमाणित" रहा। कोर्ट ने कहा कि दोषसिद्धि अनुमान, कयास या अपर्याप्त परिस्थितियों पर नहीं टिक सकती।

कोर्ट ने कहा कि प्रदर्श P-12 के अनुसार अभियोजन का अधिकतम मामला यह है कि पीड़िता घटना के समय 18 वर्ष से कम उम्र की थी और उसका विवाह अपीलकर्ता श्रवणनाथ से हुआ। हाईकोर्ट ने माना कि नाबालिग होना कानूनी रूप से महत्वपूर्ण परिस्थिति है। लेकिन किसी नाबालिग से जुड़े विवाह का अस्तित्व ही बाकी आरोपित अपराधों के हर तत्व को साबित करने की अभियोजन की जिम्मेदारी को स्वतः समाप्त नहीं कर देता।

अपीलकर्ताओं की इस दलील पर "गंभीर विचार" की जरूरत बताई गई कि अभियोजन का पूरा मामला भी मान लें तो वह बाल विवाह निषेध अधिनियम के उल्लंघन तक सीमित रह सकता है। कोर्ट ने कहा कि नाबालिग से जुड़े विवाह के कानूनी परिणाम और उससे जुड़े किसी अलग आपराधिक कृत्य के बीच स्पष्ट अंतर करना होगा।

कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की सहमति, विवाह की उसकी समझ और विवाह की परिस्थितियों को "महज औपचारिकता" नहीं माना जा सकता। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि उम्र को देखते हुए पीड़िता की स्पष्ट इच्छा या आपत्ति का अभाव नाबालिग को मिली वैधानिक सुरक्षा को खत्म नहीं कर सकता। परिस्थितियां केवल इस हद तक प्रासंगिक हैं कि वे आरोपित लेन-देन की वास्तविक प्रकृति और हर आरोपी की व्यक्तिगत भूमिका समझने में मदद करें।

अभियोजन के अपने कथन में पीड़िता की जैविक मां और एक अपीलकर्ता के आपसी संबंध तथा पीड़िता के "कल्याण" के लिए व्यवस्थाओं पर उनकी सहमति का जिक्र है। कोर्ट ने कहा कि यह परिस्थिति सबूतों से सिद्ध हो तो उसका उचित परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन जरूरी है। लेकिन यह अकेले न दोष सिद्ध करती है न निर्दोषता।

कोर्ट ने कहा कि मूल प्रश्न केवल यह नहीं है कि पीड़िता नाबालिग थी या विवाह हुआ, बल्कि यह है कि अभियोजन ने कथित आपराधिक लेन-देन और हर अपीलकर्ता की दोषपूर्ण मानसिकता संदेह से परे सिद्ध की या नहीं। जिस परिस्थिति से कानूनी जांच का आधार बनता है, उससे हर आपराधिक आरोप अपने आप सिद्ध नहीं हो जाता।

हाईकोर्ट ने कहा कि साक्ष्य "सारभूत और तर्कयोग्य आधार" पैदा करते हैं, जिन पर अपील की अंतिम सुनवाई में गहन परीक्षण की जरूरत है। इसलिए धारा 389 CrPC (धारा 430 BNSS) के तहत दोनों प्रार्थना पत्र स्वीकार किए गए। सजा अपील के अंतिम निपटारे तक निलंबित रहेगी। यह राहत अंतरिम है। दोषसिद्धि रद्द नहीं हुई है, अपीलें अभी लंबित हैं और अंतिम फैसला बाद में होगा।

नाबालिग को बेचने के आरोप में दो दोषियों को राजस्थान हाईकोर्ट से राहत, सजा निलंबित
राजस्थान के मेडिकल कॉलेजों में रैगिंग: चित्तौड़गढ़ में प्रथम वर्ष की छात्राओं के उत्पीड़न की शिकायत, बढ़ते मामलों में राज्य की चुप्पी पर सवाल
नाबालिग को बेचने के आरोप में दो दोषियों को राजस्थान हाईकोर्ट से राहत, सजा निलंबित
आदिवासी दंपती और हिंदू विवाह अधिनियम: क्या मिलेगा तलाक? राजस्थान हाईकोर्ट बोला, "हां, अगर..."
नाबालिग को बेचने के आरोप में दो दोषियों को राजस्थान हाईकोर्ट से राहत, सजा निलंबित
राजस्थान हाईकोर्ट में एक्टिंग सीजे के लिए "हमारा मुखिया चोर है’ के नारे क्यों गूंजे? जानिए वकीलों की 3 मांगों और 6 सितंबर तक कार्य बहिष्कार की पूरी कहानी
नाबालिग को बेचने के आरोप में दो दोषियों को राजस्थान हाईकोर्ट से राहत, सजा निलंबित
राजस्थान यूनिवर्सिटी ने रीवैल्यूएशन फीस का हिसाब छुपाया, आशुतोष रांका बोले- पूरे बैच की बैक लगाकर लूट...

द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.

द मूकनायक को सब्सक्राइब करें

'द मूकनायक' जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है। अगर आप भी चाहते हैं कि 'द मूकनायक' हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहें तो सब्सक्राइब करें।

यहां सब्सक्राइब करें
The Mooknayak - आवाज़ आपकी
www.themooknayak.com