
जोधपुर/जयपुर। राजस्थान उच्च न्यायालय के इतिहास में 31 अगस्त का दिन बेहद असाधारण घटनाक्रम के लिए दर्ज हुआ। उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा के खिलाफ वकील खुलकर विरोध में उतर आए। न्यायालय परिसर में उनके खिलाफ नारे लगाए गए और राजस्थान उच्च न्यायालय जोधपुर की दोनों प्रमुख बार संस्थाओं ने आपात बैठक कर न्यायिक कार्य से विरत रहने का निर्णय लिया। यह विरोध ऐसे समय हुआ, जब उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति संदीप मेहता कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के कामकाज को लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश को तीन पत्र लिख चुके थे और राजस्थान उच्च न्यायालय में किसी दूसरे उच्च न्यायालय से स्थायी मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की मांग कर चुके थे।
वकीलों के विरोध के बीच कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा ने भी न्यायिक कार्य से स्वयं को अलग कर लिया है और तीन दिनों के अवकाश पर चले गये। देर शाम को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस संजय अग्रवाल को राजस्थान हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश की। साथ ही राजस्थान के वरिष्ठतम जज जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी को जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट का सीजे बनाने की सिफारिश की। कॉलेजियम की सिफारिशों के बाद जल्द ही नए सीजे की हाईकोर्ट में नियुक्ति हो सकेगी।
सोमवार को जयपुर स्थित राजस्थान उच्च न्यायालय परिसर में वकीलों के विरोध प्रदर्शन के दौरान कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ नारे लगाए गए। वकीलों ने “गली-गली में शोर है, हमारा मुखिया चोर है” जैसे नारे लगाए।
यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सामान्यतः न्यायालय परिसर में वकीलों का विरोध न्यायिक संस्थाओं की गरिमा और मर्यादा को ध्यान में रखते हुए किया जाता है। इस मामले में विरोध इतना तीखा रहा कि वकीलों ने न केवल नारेबाजी की, बल्कि दोनों प्रमुख बार संस्थाओं की संयुक्त आपात बैठक में न्यायिक कार्य से विरत रहने का निर्णय भी लिया।
हालांकि राजस्थान उच्च न्यायालय लॉयर्स एसोसिएशन और राजस्थान उच्च न्यायालय एडवोकेट्स एसोसिएशन की 31 अगस्त की आधिकारिक विज्ञप्ति में यह स्पष्ट किया गया कि उनका आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ अभियान नहीं है। दोनों संस्थाओं ने कहा कि उनका उद्देश्य न्यायिक संस्था की गरिमा, निष्पक्षता, स्वतंत्रता और आम जनता के न्यायपालिका में विश्वास की रक्षा करना है।
31 अगस्त को राजस्थान उच्च न्यायालय जोधपुर में दोनों बार संस्थाओं की आपात बैठक बुलाई गई। इसमें वरिष्ठ अधिवक्ताओं, बार संस्थाओं के पदाधिकारियों, पूर्व पदाधिकारियों और बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं तथा युवा वकीलों ने हिस्सा लिया। बैठक में वर्तमान परिस्थितियों पर विस्तृत चर्चा के बाद तीन प्रमुख मांगों पर सर्वसम्मति बनी।
पहली मांग थी कि कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा को तत्काल न्यायिक और प्रशासनिक कार्यों से अलग रखा जाए। बार का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों और लगाए गए आरोपों को देखते हुए संस्थागत विश्वास बनाए रखने के लिए कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश को इन दोनों जिम्मेदारियों से विरत किया जाना चाहिए, ताकि संबंधित विषयों पर निष्पक्ष प्रक्रिया आगे बढ़ सके।
दूसरी मांग राजस्थान उच्च न्यायालय में स्थायी और पूर्णकालिक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की है। वकीलों ने कहा कि उच्च न्यायालय को शीघ्र स्थायी नेतृत्व दिया जाना चाहिए, ताकि न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था में स्थिरता, निरंतरता और प्रभावी नेतृत्व सुनिश्चित हो सके।
तीसरी मांग पूरे राजस्थान में चल रही "लक्षित प्रकरण निपटारा व्यवस्था" को तत्काल बंद करने की है। बार के अनुसार, लंबे समय से लंबित मामलों को लक्ष्य बनाकर निपटाने की इस व्यवस्था से न्यायिक कार्यप्रणाली के साथ-साथ अधिवक्ताओं के सामान्य पेशेवर जीवन पर भी अत्यधिक दबाव पड़ रहा है। वकीलों ने कहा कि इससे प्रदेशभर में अधिवक्ता समुदाय में असंतोष और कठिनाइयां पैदा हो रही हैं।
दोनों बार संस्थाओं ने 6 सितंबर तक राजस्थान के सभी न्यायालयों में न्यायिक कार्य से विरत रहने का निर्णय लिया है। आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, इस अवधि में अधिवक्ता प्रत्यक्ष या आभासी माध्यम से न्यायिक कार्य में उपस्थित नहीं होंगे। आंदोलन की आगे की रणनीति तय करने के लिए एक संघर्ष समिति गठित करने का निर्णय भी लिया गया है।
बार संस्थाओं ने राजस्थान के अन्य अधिवक्ता संगठनों से भी आंदोलन में शामिल होने का आह्वान किया है। सभी बार संस्थाओं को पत्र भेजकर व्यापक आंदोलन में भागीदारी का आग्रह करने का निर्णय लिया गया है।
बार ने अपने आंदोलन को किसी व्यक्ति के विरुद्ध लड़ाई के बजाय न्यायपालिका में जनता के विश्वास की रक्षा का प्रयास बताया है। बैठक में अधिवक्ताओं ने कहा कि बार और पीठ की गरिमा तभी सुरक्षित रह सकती है, जब न्यायिक संस्था निष्पक्षता, पारदर्शिता, स्वतंत्रता और विश्वास के सर्वोच्च मानकों पर काम करे।
बार संस्थाओं ने कहा कि न्यायपालिका केवल एक संस्था नहीं, बल्कि संविधान, कानून के शासन और आम नागरिक के अंतिम विश्वास का प्रतीक है। यदि न्यायिक संस्था से जुड़े गंभीर प्रश्नों का समयबद्ध, निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी समाधान नहीं होता है, तो उसका प्रभाव आम जनता के न्याय व्यवस्था में विश्वास पर पड़ सकता है।
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश संदीप मेहता की ओर से भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत को लिखे गए तीन पत्र हैं। ये पत्र 2 अगस्त, 10 अगस्त और 17 अगस्त को लिखे गए थे।
जस्टिस मेहता ने इन पत्रों में राजस्थान उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा के न्यायिक और प्रशासनिक कामकाज को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज की थीं। उन्होंने सीजेआई से आग्रह किया था कि जस्टिस शर्मा को राजस्थान से स्थानांतरित किया जाए और राजस्थान उच्च न्यायालय में किसी दूसरे उच्च न्यायालय से स्थायी मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जाए।
जस्टिस मेहता के पत्रों में न्यायालय के प्रशासनिक अधिकारों के कथित दुरुपयोग, मामलों की सूची बनाने की प्रक्रिया में कथित हस्तक्षेप, पक्षपात और प्रशासनिक कुप्रबंधन जैसे आरोपों का उल्लेख किया गया था।
2 अगस्त के पत्र में जस्टिस संदीप मेहता ने कथित तौर पर कहा कि कई न्यायाधीशों ने कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के आचरण को लेकर उनसे अपनी चिंता व्यक्त की थी। उनके पत्र में यह आरोप भी दर्ज था कि कुछ सहकर्मी न्यायाधीशों को कथित रूप से प्रतिशोधात्मक स्थानांतरण की चेतावनी दी जाती थी और इसके लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश के साथ कथित निकटता का हवाला दिया जाता था।
जस्टिस मेहता ने अपने पत्रों में प्रशासनिक अधिकारों के कथित इस्तेमाल और न्यायिक मामलों की सूची तैयार करने की प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए थे। दूसरे पत्र में मामलों की सूची तैयार करने और पीठों के आवंटन से संबंधित कई उदाहरणों का उल्लेख किया गया था। इनमें उदयपुर की मूल्यवान भूमि से संबंधित अपीलों का मामला भी शामिल था।
जस्टिस मेहता ने आरोप लगाया था कि ये मामले जयपुर की उस पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किए गए जिसकी अध्यक्षता कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश कर रहे थे, जबकि उनके अनुसार जस्टिस शर्मा पहले ही एक मामले में यह व्यवस्था दे चुके थे कि प्रधान पीठ से संबंधित मामलों को जोधपुर से जयपुर स्थानांतरित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस मेहता ने अपने पत्रों में राजस्थान उच्च न्यायालय के जस्टिस उमा शंकर व्यास से जुड़ी शिकायत का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, जस्टिस व्यास ने अपनी पत्नी, जो वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी हैं, के प्रति कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के कथित प्रतिशोधपूर्ण व्यवहार की शिकायत की थी। जस्टिस मेहता ने जोधपुर के नए जिला न्यायालय भवन के उद्घाटन में कथित देरी का भी उल्लेख किया था। उनके पत्र में इस देरी को लेकर गंभीर चिंता जताई गई और इसे संस्थागत नुकसान बताया गया। भवन तैयार होने के बावजूद उसके उद्घाटन में देरी हुई। बाद में 15 अगस्त को CJI सूर्यकांत ने नए भवन का उद्घाटन किया।
एक अधिवक्ता पूजा त्रिपाठी ने 25 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ को शिकायत भेजी थी। इस शिकायत में जयपुर और अजमेर में स्थायी लोक अदालतों में नियुक्तियों को लेकर कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा पर कथित पक्षपात के आरोप लगाए गए थे। शिकायत में कुछ नियुक्तियों में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के कथित करीबी लोगों के संबंध होने का दावा किया गया था। इनमें एक व्यक्ति को उनका बचपन का मित्र तथा अन्य नियुक्तियों को जिला न्यायाधीशों के जीवनसाथियों से जोड़ा गया था।
शिकायत में चार महिला अधिवक्ताओं के उच्च न्यायालय में पदोन्नति के लिए नाम आगे बढ़ाए जाने को लेकर भी सवाल उठाए गए थे। शिकायतकर्ता का आरोप था कि ये अधिवक्ता सक्रिय रूप से वकालत नहीं कर रही थीं।
अपने पत्रों में जस्टिस संदीप मेहता ने भारत के मुख्य न्यायाधीश से आग्रह किया था कि राजस्थान उच्च न्यायालय में किसी अन्य राज्य के उच्च न्यायालय से स्थायी मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जाए। उन्होंने चेतावनी दी थी कि मामले में कार्रवाई नहीं होने से न्यायिक संस्था को नुकसान हो सकता है।
जस्टिस मेहता के पत्रों की जानकरी सार्वजनिक होने के बाद CJI सूर्यकांत ने भी इस विवाद पर प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने कहा था कि किसी न्यायाधीश के खिलाफ लगाए गए आरोप अपने आप में न्यायिक निष्कर्ष नहीं होते और ऐसे मामलों में संबंधित न्यायाधीश को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए।
इसी पूरे घटनाक्रम के बीच 31 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने राजस्थान उच्च न्यायालय के लिए स्थायी मुख्य न्यायाधीश के नाम की सिफारिश कर दी।
कॉलेजियम ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस संजय अग्रवाल को राजस्थान उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश की है। जस्टिस अग्रवाल छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हैं। वे सितंबर 2013 में अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त हुए थे और मार्च 2016 में स्थायी न्यायाधीश बने। इससे पहले वे छत्तीसगढ़ के महाधिवक्ता भी रह चुके हैं। यह सिफारिश उस समय आई है जब राजस्थान उच्च न्यायालय में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश को लेकर वकीलों का विरोध चरम पर पहुंच चुका था।
फिलहाल राजस्थान उच्च न्यायालय में तीन घटनाक्रम एक साथ आगे बढ़ रहे हैं। पहला, जोधपुर की दोनों प्रमुख बार संस्थाओं का 6 सितंबर तक न्यायिक कार्य से विरत रहने का फैसला। दूसरा, कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा का 5 सितंबर तक न्यायिक कार्य से अलग रहना। और तीसरा, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा जस्टिस संजय के. अग्रवाल को राजस्थान उच्च न्यायालय का अगला मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश।
इस पूरे विवाद में लगाए गए आरोपों पर जांच अभी बाकी है लेकिन इतना स्पष्ट है कि जस्टिस संदीप मेहता की तीन चिट्ठियां, राजस्थान उच्च न्यायालय में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ वकीलों का इतना व्यापक विरोध और उसी दिन स्थायी मुख्य न्यायाधीश के लिए जस्टिस संजय के. अग्रवाल के नाम की सिफारिश, इन घटनाओं ने राजस्थान की न्यायिक व्यवस्था में एक असाधारण परिस्थिति पैदा कर दी है।
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