
जयपुर- राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने अहम फैसले में कहा है कि अनुसूचित जनजाति के जो सदस्य हिंदू रीति-रिवाज और परंपराओं का पालन करते हैं, उन्हें हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। जस्टिस सुदेश बंसल और जस्टिस रवि चिरानिया की खंडपीठ ने कोटा के फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए मीणा समुदाय के एक दंपती का विवाह धारा 13-बी के तहत आपसी सहमति से समाप्त कर दिया। यह फैसला डी.बी. सिविल विविध अपील संख्या 411/2026 (लक्ष्मी मीणा बनाम बहादुर सिंह मीणा) में सुनाया गया।
पति और पत्नी दोनों मीणा समुदाय से हैं। दोनों का विवाह 12.06.2017 को हुआ था। लगभग तीन वर्ष के साथ के दौरान उनके बीच गंभीर वैचारिक मतभेद उत्पन्न हुए, जो बढ़ते-बढ़ते अलगाव में बदल गए। वैवाहिक विवाद सुलझने योग्य न रहने पर दोनों ने आपसी सहमति से विवाह-विच्छेद का निर्णय लिया और 15.09.2024 को लिखित सहमति दस्तावेज निष्पादित किया। इसी के आधार पर हाड़ौती आदिवासी मीणा सामाजिक सुधार संघ ने 22.09.2024 को विवाह-विच्छेद का प्रमाणपत्र जारी किया।
इसके बाद पत्नी ने 01.10.2024 को फैमिली कोर्ट संख्या-1, कोटा में सिविल वाद दायर कर आपसी सहमति के आधार पर विवाह-विच्छेद की डिक्री मांगी। पति ने जवाब में प्रार्थना का विरोध नहीं किया और बाद में उसे एकपक्षीय रखा गया। फिर भी फैमिली कोर्ट ने 03.09.2025 को वाद खारिज कर दिया। कारण यह बताया कि पक्षकारों ने अपने अभिवचनों में "मीणा समुदाय" में प्रचलित रीति-रिवाजों और प्रथाओं का उल्लेख नहीं किया और यह सिद्ध नहीं हुआ कि विवाह-विच्छेद समुदाय की प्रथाओं के अनुसार हुआ।
इस निर्णय के विरुद्ध पत्नी ने पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 की धारा 19 के तहत अपील दायर की। अपीलार्थी की ओर से सुधीर यादव, मंगल सिंह सैनी और राजेश कुमार यादव तथा प्रतिवादी की ओर से अविनाश फेनिन उपस्थित रहे।
दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं ने संयुक्त रूप से कहा कि मीणा समुदाय अनुसूचित जनजाति है, लेकिन पक्षकारों ने विवाह और उसके विच्छेद, दोनों के लिए हिंदू विधि की प्रक्रिया अपनाई। उनका विवाह सप्तपदी (पवित्र अग्नि के समक्ष सात फेरे) और अन्य हिंदू रीति-रिवाजों से संपन्न हुआ। इसलिए अधिनियम की धारा 2(2) का प्रतिबंध उन पर लागू नहीं होता। उन्होंने संयुक्त प्रार्थना की कि वाद को धारा 13-बी के तहत संयुक्त याचिका मानकर आपसी सहमति से तलाक की डिक्री पारित की जाए।
न्यायालय ने नोट किया कि विवाह हिंदू रीति-रिवाजों से, सप्तपदी की प्रक्रिया के साथ संपन्न हुआ। पक्षकार हिंदू धर्म, हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन करते हैं। वैवाहिक संबंध से कोई संतान नहीं है। दोनों पक्षकार 2021 से, यानी पांच वर्ष से अधिक समय से, बिना किसी सहवास के अलग रह रहे हैं। दोनों बिना किसी दुरभिसंधि (collusion) के आपसी सहमति से विवाह-विच्छेद चाहते हैं।
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 2(2) के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना जारी कर अन्यथा निर्देश न दिए जाने तक, यह अधिनियम अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर लागू नहीं होता। न्यायालय ने कहा कि यह प्रावधान हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 2(2) के समान है। न्यायालय ने तीन निर्णयों का सहारा लिया:
लाबिश्वर मांझी बनाम प्राण मांझी [(2000) 8 SCC 587]: सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जो संथाल पक्षकार "हिंदूकृत" हो चुके हैं और हिंदू परंपराओं का पालन करते हैं, वे हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम से बाहर नहीं हैं।
सत्यप्रकाश मीणा बनाम अलका मीणा [(2021) SCC OnLine Del 3645]: दिल्ली हाईकोर्ट ने मीणा दंपती का विवाह धारा 13-बी के तहत विघटित किया। उसने कहा कि धारा 2(2) मान्यता प्राप्त जनजातियों की प्रथागत परंपराओं की रक्षा के लिए है, उन जनजातीय सदस्यों को बाहर रखने के लिए नहीं जो स्वेच्छा से हिंदू रीति-रिवाज अपनाते हैं।
चित्तापुली बनाम भारत संघ [(2021) SCC OnLine AP 1039]: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 2(2) "संरक्षण का उपाय है, बहिष्करण का नहीं"। जो जनजातीय सदस्य हिंदूकृत होकर स्वेच्छा से न्यायालय की अधिकारिता में आता है, उसे प्रारंभ में ही रोका नहीं जा सकता।
खंडपीठ ने कहा कि यह विधिक स्थिति तय हो चुकी है कि धारा 2(2) में दिया गया अपवर्जन मान्यता प्राप्त जनजातियों की प्रथागत परंपराओं की रक्षा के लिए है। यदि पक्षकार हिंदू परंपराओं और रीति-रिवाजों का पालन करते हैं और सारतः हिंदूकृत हैं, तो उन्हें "प्रथागत न्यायालयों" के पास नहीं भेजा जा सकता, विशेषकर तब जब वे स्वयं स्वीकार करते हैं कि वे हिंदू रीति-रिवाज मानते हैं।
न्यायालय ने कहा कि किसी भी पक्षकार का यह मामला नहीं है कि उसने हिंदुओं पर लागू प्रथाओं से भिन्न कोई प्रथा, रीति या रिवाज कभी अपनाया। दोनों का स्वीकृत मत है कि विवाह के संपन्न होने और उसके विच्छेद, दोनों के संबंध में वे हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन करते हैं।
धारा 13-बी की उपधारा (1) और (2) की शर्तें पूर्ण पाई गईं। अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर [(2017) 8 SCC 746] में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा धारा 13-बी(2) को आज्ञापक नहीं, निदेशात्मक ठहराए जाने के आधार पर छह माह की प्रतीक्षा अवधि माफ की गई।
दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं ने बताया कि इस कार्यवाही के अतिरिक्त उनके बीच कोई दीवानी या फौजदारी मामला लंबित नहीं है। स्थायी गुजारा-भत्ते का मुद्दा भी अंतिम रूप से सुलझ चुका है और कोई देनदारी शेष नहीं है।
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का 03.09.2025 का निर्णय ख़ारिज किया और 12.06.2017 को संपन्न विवाह को हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13-बी के तहत आपसी सहमति से विघटित करते हुए तलाक की डिक्री पारित की।
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