
नई दिल्ली- जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में कुलपति प्रोफेसर शांतिश्री धुलिपुडी पंडित के खिलाफ छात्रों और शिक्षकों के गुस्से का सिलसिला जारी है। हाल ही जेएनयू छात्र संघ (JNUSU) और जेएनयू शिक्षक संघ (JNUTA) ने मार्च 16 और 18 को आयोजित जन सुनवाई की रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट में कुलपति को सभी आरोपों में दोषी ठहराया गया है और उनकी पद से हटाने की औपचारिक मांग की गई है।
रिपोर्ट में साफ कहा गया है, "...जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की कुलपति शांतिश्री धुलिपुडी पंडित, जेएनयूएसयू और जेएनयूटीए द्वारा लगाए गए सभी आरोपों में दोषी हैं। प्रस्तुत सबूतों के आधार पर, यह उनके पद से हटाने की औपचारिक मांग करने का उचित मामला है।" रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि आरोपों का सामना करने के लिए कुलपति को आमंत्रित किया गया था, लेकिन उन्होंने न तो कोई जवाब दिया और न ही जन सुनवाई में खुद को बचाया।
यह जन सुनवाई किसी वैधानिक प्राधिकरण की शक्तियों पर आधारित नहीं थी, बल्कि जेएनयू के छात्रों और शिक्षकों की सामूहिक भावना पर आधारित एक विरोध का रूप थी, जिसे औपचारिक जांच की तर्ज पर आयोजित किया गया।
जेएनयू परिसर फरवरी की शुरुआत से ही विवादों में घिरा हुआ है। फरवरी में जेएनयूएसयू के चार पदाधिकारियों और एक पूर्व अध्यक्ष को पिछले विरोध प्रदर्शन के दौरान "विश्वविद्यालय की संपत्ति को स्थायी नुकसान पहुंचाने" के आरोप में रस्टीकेट (निष्कासित) कर दिया गया था। इसके बाद हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान कुलपति के कथित जातिवादी बयान ने आग में घी डाल दिया।
कुलपति ने एक पॉडकास्ट साक्षात्कार में कहा था कि "दलित और ब्लैक्स विक्टिमहुड (पीड़ित मानसिकता) की नशे में डूबे हुए हैं" ("Dalits and Blacks are drugged with victimhood")। उन्होंने "स्थायी विक्टिमहुड" (permanent victimhood) की भी बात की। इस बयान ने पूरे परिसर में व्यापक आक्रोश पैदा कर दिया और दलित-बहुल छात्र समुदाय तथा शिक्षकों में गहरी नाराजगी फैला दी। छात्रों का आरोप है कि यह बयान न केवल जातिवादी है, बल्कि विश्वविद्यालय के समावेशी और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ भी है।
विवाद के बीच जेएनयूएसयू ने छात्रों की राय जानने के लिए 10 मार्च को पूरे विश्वविद्यालय में रेफरेंडम आयोजित किया। इसमें कुल 2409 छात्रों ने हिस्सा लिया। इनमें से 2181 छात्रों (लगभग 90.5 प्रतिशत) ने कुलपति के खिलाफ वोट किया और उनकी इस्तीफे की मांग की। केवल 207 छात्र (8.59 प्रतिशत) ने उनके बने रहने के पक्ष में वोट किया, जबकि 21 वोट (0.87 प्रतिशत) अमान्य घोषित किए गए।
जेएनयूएसयू ने इसे छात्र समुदाय की लोकतांत्रिक आवाज बताया और कहा कि छात्रों ने स्पष्ट जनादेश दिया है कि कुलपति प्रशासनिक भ्रष्टाचार और जातिवादी टिप्पणियों के कारण पद पर बने नहीं रह सकते। रेफरेंडम में सभी स्कूलों के छात्रों ने बड़े पैमाने पर भाग लिया।
पिछले दो महीने से छात्र भ्रष्टाचार, आरक्षण नीतियों के कथित उल्लंघन, नेपोटिज्म और कुलपति के काम करने तरीके से काम करने के खिलाफ लगातार प्रदर्शन कर रहे थे। जेएनयूएसयू ने सभी स्कूल फैकल्टी कमेटियों (SFCs), काउंसलर्स, छात्र संगठनों और व्यापक छात्र समुदाय के सहयोग से हड़ताल और लॉकडाउन का आह्वान किया। स्कूल जनरल बॉडी मीटिंग्स (GBMs) में लोकतांत्रिक फैसले लिए गए।
प्रशासन ने दमनात्मक रवैया अपनाया। कई छात्रों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गईं, जिनमें जेएनयूएसयू के पदाधिकारियों पर एक से ज्यादा एफआईआर शामिल हैं। छात्रों के शिक्षा मंत्रालय (MoE) तक मार्च निकालने पर पुलिस ने 50 से ज्यादा छात्रों को हिरासत में लिया और 14 छात्रों (जिन्हें जेएनयू-14 कहा गया) को गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया, जहां वे तीन दिन रहे।
कुलपति ने अपने छात्रों पर पुलिस कार्रवाई की निंदा तक नहीं की। उनकी चुप्पी ने प्रशासन और पुलिस के बीच कथित गठजोड़ को और उजागर किया। छात्रों का कहना है कि यह दमन हड़ताल और लॉकडाउन के दबाव को ही दर्शाता है।
जन सुनवाई से पहले जेएनयूएसयू ने कुलपति को आरोपों का सामना करने का निमंत्रण दिया था, लेकिन उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
रिपोर्ट जारी करने के साथ ही जेएनयूएसयू और जेएनयूटीए ने शिक्षा मंत्रालय से अपील की है कि छात्रों की लोकतांत्रिक आवाज को गंभीरता से लिया जाए और कुलपति की हटाने की कार्रवाई की जाए। संघ ने भ्रष्टाचार, नेपोटिज्म, जातिवाद, आरक्षण के उल्लंघन के आरोपों का चार्जशीट जारी करने की भी बात कही थी।
जेएनयूएसयू पदाधिकारियों आदिती मिश्रा (अध्यक्ष), के. गोपिका बाबू (उपाध्यक्ष), सुनील यादव (महासचिव) और दानिश अली (संयुक्त सचिव) ने बयान जारी कर कहा कि कुलपति संतिश्री धूलिपुड़ी पंडित तुरंत इस्तीफा दें।
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