
नई दिल्ली- दलित शोषण मुक्ति मंच (डीएसएमएम) ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर शांतिश्री धुलिपुडी पंडित के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। यह मांग 16 फरवरी को एक अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन, संडे गार्जियन को दिए गए उनके लंबे साक्षात्कार के दौरान उनके द्वारा की गई असंवेदनशील, जातिवादी और नस्लवादी टिप्पणियों के कारण की गई है। मंच ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पत्र लिखकर कुलपति को तत्काल पद से हटाने की अपील की है।
कुलपति द्वारा दिए गए अत्यंत आपत्तिजनक बयान, 'यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने) विनियम, 2026, जिसे 13 जनवरी को अधिसूचित किया गया था, उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव सहित भेदभाव को दूर करने का प्रयास करता है' से संबंधित एक प्रश्न के उत्तर में थे। प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि यूजीसी का आदेश "पूरी तरह से अनावश्यक" और "अतार्किक" था और आगे कहा कि "हमेशा पीड़ित बने रहना एक चलन है। और आप हमेशा पीड़ित बने रहकर या पीड़ित होने का नाटक करके प्रगति नहीं कर सकते। यह अश्वेतों के लिए किया गया था... वही चीजें यहां दलितों के लिए भी लाई गईं।" उन्होंने "स्थायी पीड़ित होने" की तुलना "एक प्रकार की निर्भरता से की जो प्रगति में बाधा डालती है", और अमेरिका में अश्वेत समुदायों के लिए किए गए सकारात्मक कार्रवाई प्रयासों और भारत में दलितों के लिए किए गए प्रयासों के बीच समानताएं बताईं।
डीएसएमएम के महासचिव रामचंद्र डोम और उपाध्यक्ष सुभाषिनी अली ने पत्र में लिखा कि यूजीसी के आदेश पर कुलपति द्वारा अपमानजनक टिप्पणी करने की उपयुक्तता और अनुपयुक्तता के प्रश्न के अलावा, उनके बयान एक जातिवादी और नस्लवादी मानसिकता को उजागर करते हैं जिसे माफ नहीं किया जा सकता। उनके बयानों को और भी शर्मनाक बनाने वाली बात यह है कि ये किस संदर्भ में दिए गए थे। विचाराधीन आदेश सर्वोच्च न्यायालय के उस निर्देश के जवाब में जारी किया गया था जो 2019 में रोहित वेमुला और पायल ताडवी की माताओं द्वारा दायर एक जनहित याचिका के संबंध में था। रोहित वेमुला हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में दलित छात्र थे और पायल मुंबई में एक आदिवासी मेडिकल इंटर्न थीं। जातिगत भेदभाव के कारण उन्हें आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा और वे 'संस्थागत हत्या' की शिकार हुईं। शोक संतप्त माताओं ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख करते हुए एक ऐसे तंत्र की मांग की जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि ऐसी त्रासदी दोबारा न हो।
इसी याचिका के जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार को नोटिस जारी किया था। इसी नोटिस के जवाब में यूजीसी ने अपने विनियम 2026 जारी किए, जिन्हें कुलपति ने 'पूरी तरह से अनावश्यक' और 'अतार्किक' बताया था।
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 2004 से 2024 के बीच केवल IIT संस्थानों में ही अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों से संबंधित 115 छात्रों ने आत्महत्या की थी। यह कल्पना करना मुश्किल है कि इस अवधि में देश के सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में कितने सैकड़ों छात्रों को आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा होगा।
पत्र में आगे लिखा कि " कुलपति का कहना है कि जिन लोगों को 'संस्थागत हत्याओं' जैसी नियति से बचाया जाना है, जिसका शिकार उनके भाई-बहन हुए हैं, वे 'पीड़ित होने का नाटक' कर रहे हैं, बेहद अनुचित और अक्षम्य है। जेएनयू कुलपति ने यह साबित कर दिया है कि वे इस उच्च पद के लिए पूरी तरह अयोग्य हैं। उन्होंने अपनी जातिवादी और नस्लवादी मानसिकता और घोर अमानवीयता के पर्याप्त प्रमाण दिए हैं। एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की कुलपति होने के नाते, उनका कर्तव्य है कि वे संविधान और सामाजिक न्याय के प्रति उसकी गहरी प्रतिबद्धता का पालन करें। उनके कथनों से यह निर्विवाद रूप से सिद्ध हो गया है कि उनका ऐसा करने का कोई इरादा नहीं है।" पत्र में कुलपति को अविलम्ब अपने पद से हटाने की मांग की गयी है।
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