
नई दिल्ली- राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एनएलयू) के एक छात्र ने अपने निजी ब्लॉग पर न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और न्यायिक अतिक्रमण (Judicial Overreach) जैसे मुद्दों पर कड़ा लेख लिखा था। इस लेख ने न केवल सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों व वकीलों का ध्यान खींचा, बल्कि छात्र के विश्वविद्यालय प्रशासन पर इतना दबाव बनाया गया कि उसे 'तुरंत कार्रवाई' करने के लिए मजबूर होना पड़ा। हालांकि, छात्र ने धमकियों के बावजूद लेख हटाने से इनकार कर दिया है, जिसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शैक्षणिक स्वतंत्रता की एक नई बहस छेड़ दी है।
यह पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की नागरिक शास्त्र (सिविक्स) की पाठ्यपुस्तक से एक अध्याय पर प्रतिबंध लगा दिया। दरअसल, उस अध्याय में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का जिक्र था। लेकिन विडंबना यह थी कि 18 पन्नों के लंबे अध्याय में महज दो पंक्तियाँ थीं, जिनमें भ्रष्टाचार का उल्लेख था। अदालत ने न केवल उस अध्याय पर प्रतिबंध लगाया, बल्कि बिना सुनवाई का कोई मौका दिए उसके लेखकों को ब्लैकलिस्ट भी कर दिया। इस फैसले की आलोचना करने वालों में से एक थे राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एनएलयू) के छात्र ऋषि ए कुमार।
ऋषि ने 14 मार्च को सबस्टैक ब्लॉग पर 'द सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया हैज़ नो स्पाइन' (The Supreme Court of India has No Spine) शीर्षक से एक विस्तृत लेख लिखा। इसमें उन्होंने कई सवाल खड़े किए:
उन्होंने तर्क दिया कि बिना किसी सुनवाई के तीन लेखकों को ब्लैकलिस्ट करना प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) और संविधान के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है। उन्होंने लिखा, "अदालत की प्रतिक्रिया यह साबित करने का एक अजीब तरीका है कि उनके पास छिपाने को कुछ नहीं है।"
लेख में उन्होंने यह भी बताया कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का मुद्दा कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह एक सुप्रलेखित (well-documented) समस्या है। अदालत ने जिस बात से 'आहत' होने का दिखावा किया, वह असल में एक गंभीर मुद्दा है जिस पर चुप्पी तोड़ने की जरूरत थी।
ऋषि ने सिर्फ न्यायपालिका को ही निशाना नहीं बनाया। उन्होंने बार काउंसिल के वरिष्ठ सदस्यों पर भी निशाना साधा, जिन्होंने बिना पूरा अध्याय पढ़े ही अदालत में जाकर इस प्रतिबंध की मांग कर दी। साथ ही, उन्होंने प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्री की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने संविधान की शपठ लेकर भी इस सेंसरशिप का समर्थन किया। उनकी दृष्टि में, न्यायपालिका, कार्यपालिका और बार- तीनों ही इस 'शैक्षिक सेंसरशिप' के लिए जिम्मेदार थे।
ऋषि ने यह लेख परीक्षा की तैयारी के बीच एक ब्रेक में लिखा था। उनकी अपेक्षा थी कि यह उनके कुछ दोस्तों तक सीमित रहेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। लेख सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। लोगों ने इसे इंस्टाग्राम पर साझा किया, देश-विदेश से लोगों ने उन्हें संदेश भेजकर बताया कि वे भी इस मुद्दे पर कुछ ऐसा ही सोच रहे थे, लेकिन उनमें इसे लिखने का साहस नहीं था। यह समर्थन की लहर रिशी के लिए एक संकेत थी कि उन्होंने जो लिखा वह सही दिशा में था।
लेख के वायरल होने के बाद स्वाभाविक रूप से कई लोगों ने इससे असहमति जताई। कुछ ने तर्क दिए, कुछ ने बहस की। रिशी ने उनसे जवाब भी दिए। लेकिन जल्द ही, यह विमर्श का मामला न रहकर दबाव और धमकी का मामला बन गया।
घटनाक्रम के अनुसार, कुछ ही दिनों में ऋषि के विश्वविद्यालय प्रशासन को सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट्स के वकीलों और यहां तक कि कुछ न्यायाधीशों के फोन आने शुरू हो गए। ये फोन करने वाले लेख से नाराज थे और वे इसकी शिकायत कर रहे थे। उनका दबाव था कि विश्वविद्यालय इस मामले में हस्तक्षेप करे।
इसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने ऋषि को एक ईमेल भेजा। ईमेल की भाषा औपचारिक थी, लेकिन उसका आशय स्पष्ट था। ईमेल में लिखा था कि विश्वविद्यालय को 'सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट्स के एडवोकेट्स और कुछ न्यायाधीशों' से लगातार फोन आ रहे हैं, जो लेख की आलोचना कर रहे हैं। प्रशासन ने चिंता जताई कि इससे 'विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा' दांव पर लग गई है। ईमेल में ऋषि से अनुरोध किया गया कि वह 'तुरंत लेख हटा दें' क्योंकि यह 'विश्वविद्यालय और आपके अपने सर्वोत्तम हित' में होगा।
ऋषि ने इस ईमेल को लेकर सवाल उठाया- इस देश के जज, यूनिवर्सिटी के ज़रिए छात्रों को असल में "हटाने" के आदेश दे रहे हैं- सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उन्होंने जजों की आलोचना की थी। कम से कम SC का पिछला आदेश तो एक कानूनी प्रक्रिया जैसा था। वह कम से कम सबके सामने हो रहा था। लेकिन यह? यह आखिर है क्या? आप इसे कहेंगे क्या? एक ठीक से काम करने वाले लोकतंत्र के किस रूप में यह सब सामान्य माना जा सकता है? 22 मार्च को लिखे blog में ऋषि लिखते हैं, "उस ईमेल ने अपना सारा काम बस एक ही वाक्य में कर दिया। उसमें कहा गया था कि मुझे इसे तुरंत हटा देना चाहिए- "यूनिवर्सिटी और आपके अपने सबसे अच्छे हित में।" इसका आखिर मतलब क्या है? एक ईमानदार राय ज़ाहिर करने के लिए एक छात्र से इस तरह बात क्यों की जा रही है? और सबसे ज़रूरी बात- दबाव डालने के लिए चिंता का बहाना क्यों बनाया जा रहा है? किसी ने जान-बूझकर ये शब्द चुने थे। कोई ऐसा व्यक्ति, जो ठीक-ठीक जानता है कि किसी छात्र को चुपचाप बात मनवाने के लिए कितना दबाव डालना पड़ता है। मेरे दोस्त ने इसे वही कहा जो यह असल में था: एक छिपा हुआ खतरा।"
ऋषि ने इस पूरे प्रकरण को सिर्फ एक व्यक्तिगत हमले के रूप में नहीं देखा, बल्कि उन्होंने इसे भारत के कानूनी शिक्षा ढांचे की एक बड़ी संरचनात्मक समस्या से जोड़ा। उन्होंने बताया कि अधिकांश राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों (एनएलयू) में नाममात्र के कुलाधिपति (Chancellor) के पद पर कोई न कोई हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का जज होता है। साथ ही कई वरिष्ठ अधिवक्ता विश्वविद्यालय की परिषदों में बैठते हैं।
ऋषि ने लिखा, " मेरे विश्वविद्यालय की परिषदों में कई वरिष्ठ वकील बैठते हैं और प्रशासनिक पदों पर भी हैं। जिन लोगों की आलोचना हो रही है और जो हम पर दबाव डाल रहे हैं, वे लोग पहले से ही हमारी अपनी संस्थागत संरचना में शामिल हैं। मैं बिल्कुल भी यह नहीं कह रहा हूँ कि ये वही लोग हैं जिन्होंने ऐसा किया है। लेकिन संरचना में ही समस्या है। विश्वविद्यालय से यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह प्रभावी ढंग से इसका विरोध करेगा? सच कहूँ तो, ये बिल्कुल वही लोगों के समूह हैं जो दो अलग-अलग भूमिकाओं में काम कर रहे हैं।
मैं मानता हूँ कि ऐसी संस्थागत संरचना हमें एक ऐसा स्तर का पहुँच और समर्थन प्रदान करती है जो दूसरों के लिए संभव नहीं है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह स्वीकार्य है। कभी भी नहीं।"
उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि ये जज और वकील उन विश्वविद्यालयों में कभी नहीं जाते, जिनमें संस्थागत साहस (institutional courage) होता है। वे इस विश्वविद्यालय में इसलिए आए क्योंकि उन्होंने हिसाब लगा लिया कि यहां के छात्रों और प्रशासन को दबाया जा सकता है।
ऋषि ने यूनिवर्सिटी द्वारा भेजे गये email का जवाब भी सार्वजनिक किया है जिसमे उन्होंने लिखा : यह लेख मेरे निजी Substack पेज पर पोस्ट किया गया था और इसे पूरी तरह से मेरी निजी हैसियत से लिखा गया था। मैंने किसी भी समय इस विश्वविद्यालय के छात्र के तौर पर अपनी स्थिति का ज़िक्र नहीं किया। मेरी राय सिर्फ़ मेरी है। मेरी राय को विश्वविद्यालय की राय से जोड़ने की कोई भी कोशिश साफ़ तौर पर गलत है। यह साफ़ होना चाहिए कि मेरे निजी विचारों पर विश्वविद्यालय का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है। मेरी आवाज़ या मेरी अंतरात्मा पर आपका कोई हक़ नहीं है।
हमारी अपनी आचार संहिता कहती है कि आपको "छात्रों के अपनी राय व्यक्त करने के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए।" विश्वविद्यालय ऐसे बाहरी दबावों के आगे कैसे झुक सकता है? यह ज़ाहिर है कि जिनकी आलोचना हो रही है, वे इसे अच्छी तरह से नहीं लेंगे। यह तथ्य कि न्यायाधीश और बार के सदस्य इस दबाव के पीछे हैं, यह दिखाता है कि यह कितना गंभीर मामला है। हालाँकि, इस विश्वविद्यालय से मेरे जुड़ाव के कारण मुझ पर परोक्ष रूप से दबाव डालना, इस विश्वविद्यालय और उन आदर्शों का अपमान है जिनके लिए यह खड़ा होने का दावा करता है। ऐसा कहीं और कभी भी स्वीकार नहीं किया जाता।
इसके अलावा, विश्वविद्यालय ने जिस वाक्यांश का इस्तेमाल किया है - "विश्वविद्यालय और आपके अपने सर्वोत्तम हित में" - वह एक छिपी हुई धमकी के अलावा और कुछ नहीं है, और मैं इसे ठीक वैसा ही मानता हूँ जैसा यह है। मेरा पूरे दिल से मानना है कि मैंने अपने अधिकारों के दायरे में रहकर काम किया है और मुझे किसी भी बात के लिए माफ़ी माँगने की ज़रूरत नहीं है। न ही इस विश्वविद्यालय को यह महसूस करना चाहिए कि उसकी प्रतिष्ठा दाँव पर लगी है, सिर्फ़ इसलिए कि उसके छात्र सच बोलते हैं। सच तो यह है कि बाहरी दबाव के आगे झुकने का यही काम हमारी प्रतिष्ठा को दाँव पर लगाता है।
मैं अपने सभी अधिकार सुरक्षित रखता हूँ।"
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