छत्तीसगढ़: स्कूलों में नये सत्र से धार्मिक प्रार्थनाएं अनिवार्य; वकीलों के संगठन ने उठाए संविधान और धर्मनिरपेक्षता पर सवाल

AILAJ ने सरकारी स्कूलों में छात्रों के लिए सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र, दीप मंत्र, भोजन मंत्र, गायत्री मंत्र, शांति मंत्र आदि का पाठ करना अनिवार्य करने वाले सर्कुलर पर गहरी चिंता जताते हुए छत्तीसगढ़ सरकार से आदेश वापस लेने की मांग की।
संगठन का कहना है कि यह महज स्कूल अनुशासन या दिनचर्या का प्रशासनिक मामला नहीं है, बल्कि राज्य के पूर्ण वित्तपोषण वाले शैक्षणिक संस्थानों में एक विशेष धार्मिक परंपरा से जुड़े अनुष्ठानों और प्रार्थनाओं को अनिवार्य बनाने का प्रयास है, जो संविधान की मूल भावना के विपरीत है।
संगठन का कहना है कि यह महज स्कूल अनुशासन या दिनचर्या का प्रशासनिक मामला नहीं है, बल्कि राज्य के पूर्ण वित्तपोषण वाले शैक्षणिक संस्थानों में एक विशेष धार्मिक परंपरा से जुड़े अनुष्ठानों और प्रार्थनाओं को अनिवार्य बनाने का प्रयास है, जो संविधान की मूल भावना के विपरीत है।AI image for symbolic purpose
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नई दिल्ली- ऑल इंडिया लॉयर्स एसोसिएशन फॉर जस्टिस (AILAJ) ने छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा सरकारी स्कूलों में विभिन्न धार्मिक मंत्रों और वंदनाओं के अनिवार्य पाठ संबंधी आदेश का कड़ा विरोध करते हुए इसे संविधान के अनुच्छेद 28 और भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे के विरुद्ध बताया है। संगठन ने राज्य सरकार से इस आदेश को तत्काल वापस लेने की मांग की है।

AILAJ ने एक विस्तृत बयान जारी कर कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार के स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा 12 जून को जारी परिपत्र संख्या GENCOR-35010/1981/2026 के तहत राज्य के सभी सरकारी विद्यालयों में शैक्षणिक सत्र 2026-27 से प्रतिदिन दीप मंत्र, सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र, भोजन मंत्र, गायत्री मंत्र और शांति मंत्र का पाठ अनिवार्य किया गया है।

संगठन का कहना है कि यह महज स्कूल अनुशासन या दिनचर्या का प्रशासनिक मामला नहीं है, बल्कि राज्य के पूर्ण वित्तपोषण वाले शैक्षणिक संस्थानों में एक विशेष धार्मिक परंपरा से जुड़े अनुष्ठानों और प्रार्थनाओं को अनिवार्य बनाने का प्रयास है, जो संविधान की मूल भावना के विपरीत है।

AILAJ ने अपने बयान में संविधान के अनुच्छेद 28(1) का हवाला देते हुए कहा कि इसमें स्पष्ट रूप से प्रावधान है कि "राज्य निधियों से पूर्णतः संचालित किसी भी शैक्षणिक संस्थान में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी।"

संगठन के अनुसार यह प्रावधान किसी अपवाद या शर्त की अनुमति नहीं देता। सरकारी विद्यालय इस संवैधानिक निषेध के दायरे में आते हैं, इसलिए धार्मिक मंत्रों और वंदनाओं को अनिवार्य करना सीधे-सीधे संविधान का उल्लंघन है।

AILAJ ने कहा कि इन गतिविधियों को "मूल्य शिक्षा", "सांस्कृतिक शिक्षा" या "विरासत संरक्षण" बताकर उचित नहीं ठहराया जा सकता। संविधान और न्यायालयों ने धर्म के अध्ययन और धार्मिक अनुष्ठानों में भागीदारी के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित किया है।

संगठन का कहना है कि यह महज स्कूल अनुशासन या दिनचर्या का प्रशासनिक मामला नहीं है, बल्कि राज्य के पूर्ण वित्तपोषण वाले शैक्षणिक संस्थानों में एक विशेष धार्मिक परंपरा से जुड़े अनुष्ठानों और प्रार्थनाओं को अनिवार्य बनाने का प्रयास है, जो संविधान की मूल भावना के विपरीत है।
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सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला

संगठन ने कहा कि D.A.V. College बनाम पंजाब राज्य (1971) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि धार्मिक शिक्षा का अर्थ किसी विशेष धर्म के सिद्धांतों, अनुष्ठानों, पूजा-पद्धतियों और धार्मिक मान्यताओं का प्रचार-प्रसार है। ऐसे में गायत्री मंत्र, सरस्वती वंदना और अन्य मंत्रों का दैनिक अनिवार्य पाठ धार्मिक अभ्यास की श्रेणी में आता है।

इसी प्रकार Aruna Roy बनाम भारत संघ (2002) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने धर्मों और नैतिक परंपराओं के अध्ययन को केवल इस शर्त पर स्वीकार किया था कि उसमें पूजा, अनुष्ठान, धार्मिक मतवाद या धर्मोपदेश शामिल न हों। AILAJ का कहना है कि छत्तीसगढ़ सरकार का आदेश इस संवैधानिक सीमा का उल्लंघन करता है।

संगठन ने Anjum Kadari बनाम भारत संघ (2024) फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया था कि राज्य द्वारा पूर्ण वित्तपोषित संस्थानों में धार्मिक सिद्धांतों, अनुष्ठानों और पूजा-पद्धतियों का प्रचार अनुच्छेद 28 के तहत प्रतिबंधित है।

संगठन का कहना है कि यह महज स्कूल अनुशासन या दिनचर्या का प्रशासनिक मामला नहीं है, बल्कि राज्य के पूर्ण वित्तपोषण वाले शैक्षणिक संस्थानों में एक विशेष धार्मिक परंपरा से जुड़े अनुष्ठानों और प्रार्थनाओं को अनिवार्य बनाने का प्रयास है, जो संविधान की मूल भावना के विपरीत है।
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AILAJ ने कहा कि मामला केवल अनुच्छेद 28 तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संविधान के मूल ढांचे में शामिल धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत से भी जुड़ा हुआ है।

संगठन ने S.R. Bommai बनाम भारत संघ (1994) फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से माना था कि राज्य की धर्म के प्रति तटस्थता भारतीय संविधान के बुनियादी ढांचे का हिस्सा है। सार्वजनिक शिक्षा राज्य का एक धर्मनिरपेक्ष कार्य है और सरकारी विद्यालय सभी धर्मों, जातियों, समुदायों और विचारधाराओं के नागरिकों के लिए समान रूप से खुले होने चाहिए।

AILAJ ने कहा कि किसी एक धार्मिक परंपरा से जुड़े मंत्रों और प्रार्थनाओं को सरकारी विद्यालयों की अनिवार्य दिनचर्या का हिस्सा बनाना राज्य की धार्मिक तटस्थता के सिद्धांत के विपरीत है।

बयान में कहा गया है कि यह आदेश विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि इससे विभिन्न धर्मों से आने वाले बच्चों तथा किसी धर्म में विश्वास न रखने वाले विद्यार्थियों पर एक विशेष धार्मिक परंपरा में भागीदारी का दबाव बन सकता है।

संगठन ने Bijoe Emmanuel बनाम केरल राज्य (1986) मामले का हवाला देते हुए कहा कि संविधान द्वारा प्रदत्त अंतरात्मा और धार्मिक स्वतंत्रता विद्यालय के द्वार पर समाप्त नहीं हो जाती। प्रत्येक नागरिक को किसी धार्मिक गतिविधि में भाग लेने या उससे दूर रहने का समान अधिकार है।

AILAJ ने अमेरिका के प्रसिद्ध Engel v. Vitale (1962) मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी स्कूलों में प्रायोजित प्रार्थनाओं को असंवैधानिक ठहराया था। न्यायालय ने कहा था कि केवल यह विकल्प दे देना कि छात्र प्रार्थना में भाग न लें, ऐसे आदेश को संवैधानिक नहीं बना देता, क्योंकि राज्य को किसी विशेष धार्मिक विश्वास का समर्थन करने का अधिकार नहीं है।

राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत पर कोई आपत्ति नहीं

संगठन ने स्पष्ट किया कि उसे राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत या अन्य वास्तविक रूप से धर्मनिरपेक्ष शैक्षणिक गतिविधियों से कोई आपत्ति नहीं है। उसका विरोध केवल उन धार्मिक मंत्रों और प्रार्थनाओं के अनिवार्य पाठ से है जिन्हें सरकारी विद्यालयों में लागू किया जा रहा है।

AILAJ ने Hindu Front for Justice बनाम भारत संघ (2016) मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की टिप्पणी का भी उल्लेख किया, जिसमें न्यायालय ने स्कूलों और कॉलेजों में अनिवार्य धार्मिक शिक्षा की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए कहा था कि सभी धर्मों का अध्ययन सामाजिक सौहार्द बढ़ा सकता है, लेकिन राज्य का ध्यान शिक्षा की गुणवत्ता, बुनियादी ढांचे और शिक्षकों की कमी जैसी वास्तविक चुनौतियों पर होना चाहिए।

AILAJ ने मांग की है कि छत्तीसगढ़ सरकार तत्काल प्रभाव से उस परिपत्र के उन हिस्सों को वापस ले, जिनके तहत सरकारी विद्यालयों में सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र, दीप मंत्र, भोजन मंत्र, गायत्री मंत्र और शांति मंत्र का अनिवार्य पाठ कराया जा रहा है।

संगठन ने कहा कि भारत का संविधान ऐसे गणराज्य की परिकल्पना करता है जहां राज्य सभी नागरिकों का समान रूप से हो और किसी भी धर्म को विशेष संरक्षण या प्राथमिकता न दे। सार्वजनिक शिक्षा का क्षेत्र धार्मिक दबाव और किसी विशेष धार्मिक विचारधारा के संस्थागत प्रचार से मुक्त रहना चाहिए। संविधान के प्रति निष्ठा इसी की मांग करती है।

संगठन का कहना है कि यह महज स्कूल अनुशासन या दिनचर्या का प्रशासनिक मामला नहीं है, बल्कि राज्य के पूर्ण वित्तपोषण वाले शैक्षणिक संस्थानों में एक विशेष धार्मिक परंपरा से जुड़े अनुष्ठानों और प्रार्थनाओं को अनिवार्य बनाने का प्रयास है, जो संविधान की मूल भावना के विपरीत है।
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संगठन का कहना है कि यह महज स्कूल अनुशासन या दिनचर्या का प्रशासनिक मामला नहीं है, बल्कि राज्य के पूर्ण वित्तपोषण वाले शैक्षणिक संस्थानों में एक विशेष धार्मिक परंपरा से जुड़े अनुष्ठानों और प्रार्थनाओं को अनिवार्य बनाने का प्रयास है, जो संविधान की मूल भावना के विपरीत है।
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संगठन का कहना है कि यह महज स्कूल अनुशासन या दिनचर्या का प्रशासनिक मामला नहीं है, बल्कि राज्य के पूर्ण वित्तपोषण वाले शैक्षणिक संस्थानों में एक विशेष धार्मिक परंपरा से जुड़े अनुष्ठानों और प्रार्थनाओं को अनिवार्य बनाने का प्रयास है, जो संविधान की मूल भावना के विपरीत है।
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