अंबेडकर को नहीं जानते थे, किया अपमान: मद्रास हाईकोर्ट ने पढ़वाई जीवनी, परीक्षा ली और फिर तमिलनाडु सरकार को कहा- "पाठ्यक्रम में लाओ बाबासाहेब को"

मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरई पीठ ने 30 अप्रैल को एक ऐसा ऐतिहासिक आदेश पारित किया जो भारतीय न्यायिक इतिहास में एक अनूठी मिसाल के रूप में दर्ज हो गया।
जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी ने तमिलनाडु के शिवगंगा जिले से जुड़े एक SC/ST आपराधिक प्रकरण में न केवल मामले का निपटारा किया, बल्कि तमिलनाडु सरकार को स्कूली पाठ्यक्रम में डॉ. बी.आर. अंबेडकर के जीवन और योगदान को शामिल करने का निर्देश भी  दिया।
जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी ने तमिलनाडु के शिवगंगा जिले से जुड़े एक SC/ST आपराधिक प्रकरण में न केवल मामले का निपटारा किया, बल्कि तमिलनाडु सरकार को स्कूली पाठ्यक्रम में डॉ. बी.आर. अंबेडकर के जीवन और योगदान को शामिल करने का निर्देश भी दिया।एआई निर्मित सांकेतिक चित्र
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मदुरै- मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने डॉ. भीमराव अंबेडकर के पोस्टर के साथ कथित अपमानजनक व्यवहार से जुड़े एक संवेदनशील मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। न्यायालय ने दो युवकों की याचिका स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत चल रही कार्यवाही को सशर्त खारिज कर दिया, लेकिन साथ ही सुधारात्मक शिक्षा पर जोर देते हुए तमिलनाडु सरकार को स्कूली पाठ्यक्रम में डॉ. अंबेडकर के जीवन और योगदान को अनिवार्य रूप से शामिल करने का निर्देश दिया।

यह प्रकरण 14 अप्रैल 2018 का है। शिवगंगा जिले के पुलिकुथी बस स्टैंड पर डॉ. बी.आर. अंबेडकर की जयंती के उपलक्ष्य में उनके चित्र वाले पोस्टर लगाए गए थे। अभियोजन पक्ष के अनुसार पहले आरोपी जी. राजेश उर्फ राजेशकुमार ने उस पोस्टर को फाड़कर उस पर पेशाब किया। दूसरे आरोपी एस. विजय उर्फ विजयकुमार ने इस पूरी घटना का वीडियो बनाया और उसे "नल्लवा बॉयज ग्रुप" नामक व्हाट्सएप ग्रुप में प्रसारित कर दिया। विदुथलाई सिरुथाई काची के देवकोट्टई नगर सचिव अमुथन उर्फ चित्तिरावेलु की शिकायत पर पुलिस ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत एफआईआर दर्ज की। जांच पूरी होने के बाद शिवगंगा की अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय में यह मामला विशेष प्रकरण विचाराधीन था।

आरोपियों ने अंबेडकर के पोस्टर फाड़कर पेशाब किया, वीडियो वायरल किया। न्यायालय ने आरोपियों की अज्ञानता को इस पूरे प्रकरण की असली जड़ माना और कहा कि डॉ. अंबेडकर की छवि का अपमान केवल एक वर्ग को ठेस पहुँचाना नहीं है, बल्कि यह उन संवैधानिक मूल्यों, न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के प्रति उदासीनता है जिन पर यह गणराज्य खड़ा है।

दोनों पक्षों में हो गया समझौता लेकिन न्यायलय ने पूछा- "जानते हो अंबेडकर कौन थे?"

वर्षों बाद 17 नवंबर 2025 को दोनों आरोपियों ने शिकायतकर्ता के साथ संयुक्त समझौता पत्र प्रस्तुत करते हुए कार्यवाही रद्द करने की प्रार्थना की। आरोपियों का कहना था कि वे निर्दोष हैं, बड़े-बुजुर्गों की मध्यस्थता से मामला सुलझ गया है, शिकायतकर्ता को कोई आपत्ति नहीं है और मुकदमा जारी रखने से किसी को कोई लाभ नहीं होगा। परंतु जस्टिस विक्टोरिया गौरी ने इस समझौते को तत्काल स्वीकार करने से इनकार कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल दो व्यक्तियों के बीच का निजी विवाद नहीं है। यह डॉ. बी.आर. अंबेडकर की स्मृति और छवि से जुड़ा है जो आधुनिक भारत के निर्माताओं में से एक, संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष और करोड़ों वंचितों की आवाज़ थे।

न्यायालय ने जब आरोपियों से पूछा कि वे डॉ. अंबेडकर के बारे में क्या जानते हैं, तो उनका उत्तर यह था कि वे एक कानूनी विद्वान थे। इससे आगे उन्हें कुछ भी ज्ञात नहीं था। न्यायालय ने इस अज्ञानता को इस पूरे प्रकरण की असली जड़ माना और कहा कि डॉ. अंबेडकर की छवि का अपमान केवल एक वर्ग को ठेस पहुँचाना नहीं है, बल्कि यह उन संवैधानिक मूल्यों, न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के प्रति उदासीनता है जिन पर यह गणराज्य खड़ा है।

डॉ. अंबेडकर को सच्ची श्रद्धांजलि मूर्तियों और समारोहों में नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने में है कि इस राज्य का हर बच्चा जाने कि वे भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं।
- जस्टिस विक्टोरिया गौरी

सज़ा नहीं, समझ की अनिवार्य शर्त

19 दिसंबर 2025 को न्यायालय ने एक विशेष अंतरिम आदेश पारित किया। पहली शर्त यह थी कि चूँकि सरकार पहले ही शिकायतकर्ता को अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत 50,000 रुपये का मुआवज़ा दे चुकी थी और अब मामला समझौते से बंद किया जा रहा है, इसलिए शिकायतकर्ता वह राशि "आदि द्रविड़ वेलफेयर, जिला कलेक्टोरेट, शिवगंगा" के नाम डिमांड ड्राफ्ट के रूप में वापस करे। इसके अतिरिक्त दोनों आरोपियों को निर्देश दिया गया कि वे डॉ. बी.आर. अंबेडकर के जीवन पर तमिल भाषा में 101-101 पुस्तकें खरीदें, उनमें से एक-एक प्रति स्वयं पढ़कर रखें और शेष 100-100 पुस्तकें टी. कल्लुपट्टी स्थित मुरुगप्पा सरकारी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के 11वीं और 12वीं कक्षा के छात्रों में वितरित करें। यदि पुस्तकें बचें तो 10वीं कक्षा से नीचे के छात्रों में भी बाँटी जाएं। विद्यालय के प्रधानाध्यापक से अनुपालन का प्रमाणपत्र प्राप्त करना भी अनिवार्य था। साथ ही दोनों को 5,000-5,000 रुपये अदयार कैंसर इंस्टीट्यूट, चेन्नई के नाम जमा करने थे। सबसे महत्वपूर्ण निर्देश यह था कि दोनों पूरी पुस्तक पढ़कर न्यायालय के समक्ष मौखिक परीक्षा के लिए तैयार रहें।

न्यायालय के सामने 30 सवालों की परीक्षा

23 जनवरी 2026 को दोनों आरोपी स्वयं न्यायालय में उपस्थित हुए। उन्होंने पुस्तकों की खरीद और वितरण के प्रमाण, प्रधानाध्यापक का प्रमाणपत्र तथा कैंसर संस्थान को किए गए भुगतान की रसीदें प्रस्तुत कीं। जस्टिस विक्टोरिया गौरी यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने कैमरे के समक्ष दोनों की मौखिक परीक्षा ली जिसमें डॉ. अंबेडकर के जीवन, उनकी विद्वत्ता, सार्वजनिक सेवा और संवैधानिक योगदान से संबंधित तीस-तीस प्रश्न पूछे गए। आदेश में दर्ज है कि दोनों ने सभी प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर दिए और यह प्रमाणित किया कि उन्होंने पुस्तक को महज औपचारिकता के रूप में नहीं पढ़ा था। आदेश में यह भी उल्लेख है कि 26 और 29 वर्षीय ये दोनों युवक स्पष्ट लज्जा और खेद के साथ उपस्थित हुए, उनका आचरण विद्रोही नहीं बल्कि प्रायश्चित से भरा था और उनका पश्चाताप वास्तविक प्रतीत हुआ।

न्यायालय ने गियान सिंह बनाम पंजाब राज्य (2012), परबतभाई आहिर बनाम गुजरात राज्य (2017) और मध्यप्रदेश राज्य बनाम लक्ष्मी नारायण (2019) के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत केवल समझौते के आधार पर कार्यवाही सामान्यतः रद्द नहीं की जा सकती। परंतु इस प्रकरण में न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि यह मामला अब केवल समझौते का नहीं रहा , यह प्रमाणित पश्चाताप और मापनीय सुधार का मामला बन चुका है। न्यायालय ने कहा कि अभियोजन का सुधारात्मक उद्देश्य पहले ही प्राप्त हो चुका है, शिकायतकर्ता ने भी प्रतिशोध के स्थान पर सुलह को चुना है और ऐसे में मुकदमे को जारी रखना न्याय के हित में नहीं होगा।

तमिलनाडु सरकार को बड़ा निर्देश: 2027-28 से पाठ्यक्रम में अनिवार्य हो अंबेडकर

इस आदेश की सबसे दूरगामी बात यह है कि न्यायालय ने तमिलनाडु के मुख्य सचिव और स्कूल शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव को स्वतः पक्षकार बनाते हुए निर्देश दिया कि कक्षा तीन से कक्षा दस तक के सामाजिक विज्ञान पाठ्यक्रम में डॉ. अंबेडकर के योगदान को उचित स्थान दिया जाए। इसमें संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका, न्याय-स्वतंत्रता-समता-बंधुत्व की संवैधानिक दृष्टि में उनका योगदान, स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्र-निर्माण में उनकी भागीदारी तथा अर्थशास्त्र, विधि और सामाजिक चिंतन में उनकी विद्वत्ता को शामिल किया जाना है। यह निर्देश शैक्षणिक और प्रशासनिक व्यवहार्यता के अधीन शैक्षणिक वर्ष 2027-28 से लागू करने को कहा गया है। सरकार को 21 जनवरी 2027 तक विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करनी होगी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस निर्देश का उद्देश्य राजनीतिक महिमामंडन नहीं बल्कि संवैधानिक शिक्षा है।

जस्टिस विक्टोरिया गौरी ने अपने आदेश में कहा कि डॉ. अंबेडकर को केवल जाति-आधारित दृष्टिकोण से देखना एक बड़ी विडंबना है। वे संपूर्ण राष्ट्र के हैं , हर कक्षा के, हर न्यायालय के, हर उस नागरिक के जो कानून के अंतर्गत गरिमा का मूल्य समझता है। न्यायालय ने कहा कि अज्ञानता पूर्वाग्रह को जन्म देती है, पूर्वाग्रह अपमान को सामान्य बना देता है और अपमान यदि अनियंत्रित रहे तो वह बंधुत्व की उन नींवों को खोखला कर देता है जिन पर संवैधानिक लोकतंत्र टिका है। न्यायालय ने यह भी कहा कि सामाजिक सद्भाव केवल अपराध के बाद दंड देने से नहीं बनता, उसे शिक्षा, जागरूकता और नैतिक नागरिकता के माध्यम से सक्रिय रूप से पोषित करना होता है। डॉ. अंबेडकर को सच्ची श्रद्धांजलि मूर्तियों और समारोहों में नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने में है कि इस राज्य का हर बच्चा जाने कि वे भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं।

Summary

न्यायालय ने याचिका को निम्न शर्तों पर स्वीकार करते हुए शिवगंगा की अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय में चल रहे विशेष प्रकरण संख्या 8/2020 की कार्यवाही को रद्द कर दिया। 17 नवंबर 2025 का संयुक्त समझौता ज्ञापन इस आदेश का अभिन्न अंग बनाया गया। 19 दिसंबर 2025 के आदेश के अनुपालन में मुआवज़े की वापसी, पुस्तकों का वितरण, लागत का भुगतान और 23 जनवरी 2026 को मौखिक परीक्षा- इस आदेश में समाविष्ट किया गया। तमिलनाडु के मुख्य सचिव और स्कूल शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव को स्वतः पक्षकार बनाते हुए पाठ्यक्रम संबंधी निर्देश दिए गए और उन्हें 21 जनवरी 2027 को विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया।

जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी ने तमिलनाडु के शिवगंगा जिले से जुड़े एक SC/ST आपराधिक प्रकरण में न केवल मामले का निपटारा किया, बल्कि तमिलनाडु सरकार को स्कूली पाठ्यक्रम में डॉ. बी.आर. अंबेडकर के जीवन और योगदान को शामिल करने का निर्देश भी  दिया।
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