
नई दिल्ली - उत्तराखंड सरकार के नए मदरसा कानून को लेकर देशभर के मुस्लिम संगठनों में भारी रोष है। अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि अगर उत्तराखंड उच्च न्यायालय से राहत नहीं मिली तो वे सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे।
उत्तराखंड सरकार ने अक्टूबर 2025 में 'उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक, 2025' को राज्यपाल की मंजूरी के बाद कानून का रूप दे दिया था। इस कानून के तहत प्रमुख बदलाव ये हैं:
1. राज्य के सभी 452 मदरसों के लिए 1 जुलाई 2026 से अनिवार्य रूप से उत्तराखंड विद्यालय शिक्षा बोर्ड से संबद्धता लेना अनिवार्य होगा
2. पुराने मदरसा शिक्षा बोर्ड को समाप्त कर दिया जाएगा
3. एक नया 'उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण' बनाया जाएगा, जो सभी अल्पसंख्यक संस्थानों को मान्यता देगा
4. अब मदरसों में सिर्फ धार्मिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF) और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुसार विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान और कंप्यूटर जैसे आधुनिक विषय पढ़ाना अनिवार्य होगा
यह कानून सिर्फ मुसलमानों तक सीमित नहीं है बल्कि सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध और पारसी समुदायों के शैक्षणिक संस्थान भी इसके दायरे में आएंगे।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस फैसले को 'ऐतिहासिक कदम' बताया है। सरकार का तर्क है कि इस कानून का उद्देश्य राज्य के हर बच्चे को, चाहे वह किसी भी वर्ग या समुदाय से हो, समान गुणवत्ता वाली शिक्षा और समान अवसर प्रदान करना है। पिछले कई वर्षों से मदरसा शिक्षा प्रणाली में छात्रवृत्ति और मिड-डे मील के वितरण में अनियमितताओं के साथ-साथ प्रबंधन में पारदर्शिता की कमी की गंभीर समस्याएं सामने आ रही थीं।
सरकार का यह भी कहना है कि यह कानून धार्मिक शिक्षा में हस्तक्षेप नहीं करता बल्कि शैक्षणिक उत्कृष्टता सुनिश्चित करता है।
यह कानून 1 जुलाई 2026 से पूरी तरह लागू हो जाएगा और उसके बाद जो भी मदरसे नए प्रावधानों का पालन नहीं करेंगे, उन्हें बंद किये जायेंगे।
उत्तराखंड सरकार द्वारा सभी मदरसों के लिए सरकारी शिक्षा बोर्ड में पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है। इसके अलावा, शिक्षा बोर्ड यह तय करेगा कि कौन-सी धार्मिक सामग्री पढ़ाई जा सकती है या नहीं, और पाठ्यक्रम भी सरकार द्वारा निर्धारित होगा।
भारत का संविधान अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 30 धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन का पूर्ण अधिकार प्रदान करता है। इन संवैधानिक प्रावधानों के मद्देनजर देशभर के प्रमुख मुस्लिम संगठनों ने उत्तराखंड सरकार के हालिया मदरसा बिल का कड़ा शब्दों में विरोध किया है।
अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी ने कहा कि हमारे प्रिय देश में धार्मिक सेमिनरी यानी मदरसे हमारे धार्मिक मूल्यों के संरक्षण के लिए सबसे महत्वपूर्ण संस्थान हैं। संविधान ने इन अधिकारों को मौलिक अधिकारों के रूप में मान्यता दी है, इसलिए इनकी रक्षा मुस्लिम समुदाय की सामूहिक जिम्मेदारी है। मदरसों ने देश की आजादी और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और आज भी निभा रहे हैं।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि यह कानून स्पष्ट रूप से संविधान में निहित गारंटियों और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है और एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की अपेक्षाओं के भी विपरीत है।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना सैयद महमूद असद मदनी, मजलिस इत्तेहाद-ए-मिल्लत के अध्यक्ष मौलाना उबैदुल्लाह खान आज़मी, जमात-ए-इस्लामी हिंद के अमीर सैयद सदातुल्लाह हुसैनी और जमीयत अहले-हदीस हिंद के अध्यक्ष मौलाना असगर अली इमाम मेहदी सलफी ने भी संयुक्त बयान में कहा कि इस कानून का विरोध करना और मदरसों की संवैधानिक रूप से गारंटीशुदा स्वायत्तता को बचाना पूरे मुस्लिम समुदाय का कर्तव्य है। सभी प्रतिनिधि संगठन मदरसों के साथ खड़े हैं और हरसंभव समर्थन देंगे।
बोर्ड के महासचिव मौलाना मोहम्मद फजलुर रहीम मुजद्दिदी और सचिव मौलाना एस बिलाल अब्दुल हई हसन नदवी ने बताया कि इस मामले से जुड़े कुछ मामले वर्तमान में उत्तराखंड उच्च न्यायालय में विचाराधीन हैं और आवश्यकता पड़ने पर इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय में भी ले जाया जाएगा। सभी संगठनों ने सरकार से इस विधेयक को वापस लेने और मदरसों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने की अपील की है।
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