
भोपाल- विरोधाभासों से भरे इस देश में हर दिन नई बहस जन्म लेती है। एक तरफ अम्बेडकरवादियों और बहुजन समुदायों द्वारा हर साल 25 दिसंबर को 'मनुस्मृति दहन दिवस' मनाया जाता है, क्योंकि संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने इसे दलितों और महिलाओं के शोषण का प्रतीक मानकर 1927 में महाड़ में जलाया था। तो वहीं दूसरी ओर, देश के एक शीर्ष न्यायाधीश ने भोपाल में आयोजित एक सम्मेलन में कहा कि राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों (NLUs) के छात्रों को सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के लिए इसी 'मनुस्मृति' और 'अर्थशास्त्र' को पढ़ाना अनिवार्य किया जाए। मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एस.ए. धर्माधिकारी के इस बयान ने विधि क्षेत्र में एक नई बहस छेड़ दी है। राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय आज उन संस्थानों में गिने जाते हैं जहां सामाजिक न्याय और आरक्षण जैसे मुद्दों पर सबसे तीखी बहसें होती हैं।
मध्य प्रदेश के भोपाल स्थित नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी में आयोजित एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एस.ए. धर्माधिकारी ने कहा कि देश के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय 'प्रॉडिजी' यानि प्रतिभाशाली छात्र तैयार कर रहे हैं, लेकिन इनका अंतिम लक्ष्य सिर्फ तेजी से करोड़पति बनना है। उन्होंने कहा कि इन छात्रों का अपनी सांस्कृतिक और वैचारिक जड़ों से पूरी तरह से अलगाव हो गया है।
जस्टिस धर्माधिकारी का कहना है कि ये स्नातक अक्सर अपनी सांस्कृतिक और वैचारिक जड़ों से कटे हुए होते हैं। न्यायाधीश ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जैन धर्म, बौद्ध धर्म, मनुस्मृति और कौटिल्य के अर्थशास्त्र के सिद्धांतों, तथा इन ग्रंथों के आपसी संबंधों के बारे में विधि के छात्रों को अवश्य पढ़ाया जाना चाहिए, उन्होंने कहा, "इन ग्रंथों का आपसी संबंध और समृद्ध साहित्य सभी विधि छात्रों को जरूर पता होना चाहिए। इससे न केवल उनकी सोच में स्थिरता और परिपक्वता आएगी, बल्कि वह भारतीय संस्कृति के मूल दर्शन 'कर्तव्य और कर्म' के प्रति जागरूक भी होंगे।"
भारतीयकरण पर जोर देते हुए जस्टिस धर्माधिकारी ने कहा कि न्यायिक प्रणाली का भारतीयकरण सिर्फ कानूनी सुधार नहीं है, बल्कि भारत की कानूनी पहचान को बहाल करने का कदम है। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक विरासत कोहरे की तरह है जो हमें अपना परिदृश्य साफ तौर पर देखने से रोक रही है। न्यायाधीश ने कहा कि कानून को 'जैसा है वैसा' स्वीकार करने के बजाय उसकी आलोचना करनी चाहिए कि वह किस उद्देश्य से बनाया गया था, और फिर उसे वैसा लिखना चाहिए जैसा भारत को चाहिए। उन्होंने जजों को 'लॉर्डशिप' या 'लेडीशिप' कहने की औपनिवेशिक प्रथा पर भी सवाल उठाया और कहा कि यह उस समय की सोच को दर्शाता है जब आम नागरिक को न्याय के लिए विनती करनी पड़ती थी, न कि उसे अधिकार के रूप में पाना। उन्होंने कहा:
"यह ज़रूरी है कि सभी लॉ स्कूलों के पाठ्यक्रम में भारतीय विज्ञान, भारतीय संस्कृति, और हज़ारों सालों से चले आ रहे उन स्थायी मूल्यों और परंपराओं पर एक अलग और विशेष कोर्स अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए, जिन्होंने भारतीय सभ्यता की रीढ़ को हर तरह के हमलों के बावजूद मज़बूत बनाए रखा है और उसे अमरता प्रदान की है। पंचतंत्र की कहानियाँ, जातक कथाएँ, चाणक्य के उपदेश, और बौद्ध धर्म अपनाने के बाद अशोक को मिली शिक्षाएँ और चर्चाएँ, जिनकी झलक हमारे भारतीय संविधान के कई हिस्सों में मिलती है, ये सभी बातें युवा लॉ छात्रों को, खासकर देश के प्रमुख NLU में, अनिवार्य रूप से पढ़ाई जानी चाहिए।"
गौरतलब है कि मनुस्मृति को प्राचीन धर्मशास्त्र माना जाता है, जिसमें सामाजिक और धार्मिक जीवन के नियम बताए गए हैं। हालांकि, यही वह पुस्तक है जिसे लेकर सबसे अधिक विवाद है क्योंकि इसमें जाति आधारित वर्ण-व्यवस्था को स्थापित किया गया है। इस ग्रंथ के अनुसार शूद्रों (दलित) को अशिक्षित और दलित बनाकर रखने की सोच को बढ़ावा दिया गया है, जबकि महिलाओं को पूरी तरह से पुरुषों पर निर्भर रहने का आदेश दिया गया है।
वर्ण व्यवस्था में समाज के सबसे निचले पायदान पर रखे गए शूद्र वर्ण को अन्य उच्च जातियों की सेवा करने का आदेश दिया गया है, उन्हें शिक्षा या संपत्ति के अधिकार से वंचित रखा गया है, वहीं महिलाओं की स्थिति और भी दयनीय बताई गई है; मनुस्मृति के अनुसार महिलाओं को कभी स्वतंत्र नहीं होना चाहिए - बचपन में पिता के अधीन, युवावस्था में पति के अधीन और बुढ़ापे में पुत्र के अधीन रहना चाहिए ।
यही कारण है कि दलितों और महिलाओं के उत्थान के लिए संघर्ष करने वाले संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इस पुस्तक को 'प्रतिगामी' और 'शोषण का प्रतीक' बताया था। 25 दिसंबर 1927 को महाराष्ट्र के महाड़ में उन्होंने इसी मनुस्मृति की प्रति को सार्वजनिक रूप से जलाकर शोषण के खिलाफ विद्रोह का ऐलान किया था। इस घटना को आज भी 'मनुस्मृति दहन दिवस' के रूप में मनाया जाता है।
गौरतलब है कि पोलिटिकल साइंस के स्टूडेंट्स को बीए और एमए में भारतीय और पाश्चात्य दर्शन (Political Thinkers) पढ़ाया जाता है, इसमें भारतीय प्राचीन चिंतकों में मनु और उनकी मनुस्मृति, कौटिल्य का अर्थशास्त्र मुख्य हैं जबकि यूनानी दर्शन में प्लेटो, अरस्तु के दर्शन प्रमुख हैं। राजथान की एक यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएट मीता बताती हैं कि कालेजों में आज भी मनुस्मृति तो पढाया जा रहा है लेकिन बाबा साहब ने इस पुस्तक का दहन किया था और इसके पीछे क्या वजह थी- इसके बारे में कोई कुरिकुलम नहीं बताता है।
विचारकों और शिक्षाविदों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि अगर मनुस्मृति जैसा प्रतिगामी ग्रंथ पढ़ाया ही जाता है विशेषकर विधि, इतिहास या दर्शनशास्त्र में, तो उसे उसके आलोचनात्मक और ऐतिहासिक संदर्भ के साथ ही पढ़ाया जाना चाहिए। इसका मतलब है कि इसके साथ उन विचारधाराओं को भी पढ़ाना अनिवार्य होगा जिन्होंने इसका डटकर विरोध किया।
प्रोफेसर लक्ष्मण यादव जैसे विद्वानों का सुझाव है कि यदि मनुस्मृति पढ़ानी भी है, तो उसके ठीक बाद ज्योतिबा फुले की 'गुलामगिरी' और डॉ. अंबेडकर की 'अनिहिलेशन ऑफ कास्ट'जैसी रचनाओं को पढ़ाना अनिवार्य किया जाना चाहिए।
दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) में वर्ष 2025 के दौरान मनुस्मृति को पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने को लेकर गंभीर विवाद उत्पन्न हुआ था और अंततः कुलपति के स्पष्ट निर्देश पर इसे पूरी तरह से हटा दिया गया। दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग की संयुक्त पाठ्यक्रम समिति ने स्नातक इतिहास (ऑनर्स) के पाठ्यक्रम में मनुस्मृति और बाबरनामा (तुजुक-ए-बाबरी) को शामिल करने को मंजूरी दे दी थी। इस निर्णय से तीव्र विरोध शुरू हो गया।
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए, दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर योगेश सिंह ने स्पष्ट कर दिया कि मनुस्मृति और बाबरनामा को किसी भी पाठ्यक्रम या अध्ययन सामग्री में शामिल करने की कोई योजना नहीं है। उन्होंने कहा, "बाबरनामा एक अत्याचारी की आत्मकथा है। इसका वर्तमान समय में कोई प्रासंगिकता नहीं है।" उन्होंने कहा कि ऐसे विषय न तो विचाराधीन हैं और न ही भविष्य में शामिल किए जाएंगे।
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