नई दिल्ली: जस्टिस दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया है कि यह पूरा मामला शिक्षा मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आता है, इसलिए फिलहाल अदालत को इसमें दखल देने की कोई आवश्यकता नहीं है।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार (11 मई, 2026) को यह तय करने का अधिकार सरकार पर छोड़ दिया है कि धार्मिक निर्देश देने वाले स्कूलों को 'धर्मनिरपेक्ष या व्यावसायिक' शैक्षणिक संस्थानों के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए, या फिर उन्हें धर्मार्थ एवं धार्मिक प्रतिष्ठानों से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के दायरे में लाया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दीपांकर दत्ता की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि यह विषय शिक्षा मंत्रालय के नीतिगत मामलों के तहत आता है। इसी वजह से न्यायपालिका को वर्तमान समय में इस मुद्दे पर किसी भी तरह के हस्तक्षेप की जरूरत महसूस नहीं होती है।
यह मामला याचिकाकर्ता और वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर एक जनहित याचिका से जुड़ा है। उन्होंने अदालत से यह घोषित करने का निर्देश देने की मांग की थी कि जो भी संस्थान किसी धर्म को बढ़ावा देने के लिए धार्मिक शिक्षा देते हैं, वे संविधान के अनुच्छेद 26(a) के अंतर्गत आते हैं। ऐसे संस्थानों को अनुच्छेद 19(1)(g) या अनुच्छेद 30(1) के तहत शामिल नहीं माना जाना चाहिए।
संविधान का अनुच्छेद 26(a) मूल रूप से 'धार्मिक स्वतंत्रता' के अधिकारों में से एक है। इसके अनुसार, किसी भी धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी भी वर्ग को धार्मिक और धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए संस्थान स्थापित करने तथा उनका रखरखाव करने का अधिकार होगा। अगर ऐसा होता है, तो इसका सीधा मतलब यह होगा कि धार्मिक शिक्षा देने वाले स्कूल सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता से जुड़े नियमों व प्रतिबंधों के अधीन आ जाएंगे।
याचिका में यह तर्क दिया गया है कि धार्मिक शिक्षा प्रदान करने वाले स्कूलों को अनुच्छेद 19(1)(g) में निहित पेशे या व्यवसाय के अधिकार के अंतर्गत नहीं रखा जाना चाहिए। साथ ही, उन्हें अल्पसंख्यक समुदायों को "शैक्षणिक संस्थानों" की स्थापना और प्रशासन के लिए दिए गए अधिकार के दायरे में भी नहीं लाया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता ने स्पष्ट रूप से इस आधार पर बंटवारे की मांग की है कि धार्मिक शिक्षा किसी स्कूल के पाठ्यक्रम का हिस्सा है या नहीं।
हालांकि, इस बात को लेकर स्थिति अभी भी अस्पष्ट है कि वे स्कूल किस श्रेणी में आएंगे जो धर्मनिरपेक्ष और धार्मिक दोनों तरह की शिक्षा देते हैं, जहां धार्मिक शिक्षा का चुनाव पूरी तरह से छात्रों की इच्छा पर निर्भर करता है।
गौरतलब है कि अनुच्छेद 30(1) अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों को ऐसे शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने की अनुमति देता है जो धर्मनिरपेक्ष और धार्मिक दोनों प्रकार की शिक्षा प्रदान करते हैं। इस अनुच्छेद में लिखा है कि धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार होगा।
इस याचिका में अदालत से यह भी मांग की गई कि अनुच्छेद 30(1) में वर्णित 'अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों' की व्याख्या 'अपनी पसंद के धर्मनिरपेक्ष या व्यावसायिक शैक्षणिक संस्थानों' के रूप में की जानी चाहिए। इसे 'अपनी पसंद के धार्मिक शैक्षणिक संस्थानों' के रूप में बिल्कुल नहीं देखा जाना चाहिए।
अश्विनी कुमार उपाध्याय ने जोर देकर कहा कि केंद्र सरकार के पास 14 वर्ष तक के बच्चों को शिक्षा प्रदान करने वाले संस्थानों को पंजीकृत करने, मान्यता देने, उनका पर्यवेक्षण और निगरानी करने के लिए एक उचित व सख्त तंत्र होना चाहिए।
याचिका में कहा गया है कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का एक गंभीर मुद्दा है क्योंकि छोटे बच्चे ही देश का भविष्य होते हैं। ऐसे में गैर-पंजीकृत संस्थानों में उनका ब्रेनवॉश किया जा सकता है या उन्हें आसानी से गुमराह किया जा सकता है।
इसके अलावा, इस अपील में यह भी संदेह जताया गया है कि क्या ऐसे गैर-पंजीकृत और बिना मान्यता प्राप्त संस्थानों द्वारा शिक्षा की सही गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सकती है।
याचिका के अंत में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि बच्चों की हिफाजत और सुरक्षा सर्वोपरि है। ऐसे में शुरुआत में ही गैर-पंजीकृत और गैर-मान्यता प्राप्त संस्थानों द्वारा बच्चों की होने वाली तस्करी को रोकना पूरी तरह से राज्य की जिम्मेदारी है।
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