जिसने कठुआ रेप पीड़िता को न्याय दिलाया, आज उसी की बेटी स्कूल नहीं जाती! जम्मू कश्मीर की एक्टिविस्ट दीपिका पुष्करनाथ कैसे कर रहीं हालातों से मुकाबला?

2018 कठुआ केस में पीड़िता की पैरवी करने वाली वकील दीपिका पुष्करनाथ को अब अपनी और अपनी नाबालिग बेटी की सुरक्षा की चिंता सता रही है। सुरक्षा में कटौती के बाद उन्होंने CJI से न्याय की गुहार लगाई है।
कठुआ मामले में स्थानीय बार एसोसिएशन ने पीड़ित परिवार की मदद करने से इनकार कर दिया और आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने का विरोध किया, तब दीपिका ने आगे आकर पीड़िता के पिता की ओर से पैरवी करने की पेशकश की। उन्होंने न सिर्फ पीड़ित परिवार का कानूनी पक्ष रखा, बल्कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक यह लड़ाई लड़ी। यहीं से दीपिका की मुश्किलें शुरू हुईं।
कठुआ मामले में स्थानीय बार एसोसिएशन ने पीड़ित परिवार की मदद करने से इनकार कर दिया और आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने का विरोध किया, तब दीपिका ने आगे आकर पीड़िता के पिता की ओर से पैरवी करने की पेशकश की। उन्होंने न सिर्फ पीड़ित परिवार का कानूनी पक्ष रखा, बल्कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक यह लड़ाई लड़ी। यहीं से दीपिका की मुश्किलें शुरू हुईं।द मूकनायक
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जम्मू- 2018 के कठुआ (रसाना) बलात्कार मामले में पीड़िता के परिवार की ओर से पैरवी करने वाली अधिवक्ता दीपिका पुष्करनाथ आज एक बार फिर सुर्खियों में हैं, लेकिन इस बार वजह कोई नया मुकदमा या जीत नहीं, बल्कि उनकी अपनी जंग है - जीने की जंग। जिस साहस के लिए उन्हें कभी सलाम किया जाता था, आज वही साहस उनके लिए अभिशाप बन गया है।

दीपिका ने 'द मूकनायक' से खास बातचीत में अपनी व्यथा साझा करते हुए बताया कि कैसे एक मासूम बच्ची के लिए न्याय की मांग करना उनकी अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए खतरा बन गया है। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने इस पूरे प्रकरण में अपनी और अपनी नाबालिग बेटी की बिगड़ती सुरक्षा स्थिति को लेकर मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को एक पत्र लिखकर हस्तक्षेप की गुहार लगाई है 

कठुआ केस ने बदल दी जिंदगी

वर्ष 2018 में जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में आठ वर्षीया बच्ची के साथ हुए सामूहिक बलात्कार और उसके बाद हत्या के मामले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।  पुलिस द्वारा दायर आरोप पत्र के अनुसार, बच्ची को एक मंदिर में बंधक बनाकर कई दिनों तक उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और अंत में उसकी हत्या कर दी गई। इस मामने में एक सरकारी अधिकारी सहित कई पुलिसकर्मियों पर आरोप लगे थे जब स्थानीय बार एसोसिएशन ने पीड़ित परिवार की मदद करने से इनकार कर दिया और आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने का विरोध किया, तब दीपिका जो उस समय जम्मू में वकालत कर रही थीं, ने आगे आकर पीड़िता के पिता की ओर से पैरवी करने की पेशकश की। उन्होंने न सिर्फ पीड़ित परिवार का कानूनी पक्ष रखा, बल्कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक यह लड़ाई लड़ी। यहीं से दीपिका की मुश्किलें शुरू हुईं।

"मैं उन दिनों को कभी नहीं भूल सकती," दीपिका ने बताया, "रातों-रात मेरे अपने सहकर्मी दुश्मन हो गए। मुझे 'एंटी-हिन्दू' और 'देशद्रोही' करार दिया गया। जिस समाज में मैं पली-बढ़ी, उसी ने मुझसे मुंह मोड़ लिया।" उन्होंने बताया कि हालात इतने बदतर हो गए थे कि उन्हें अपने ही भाई से कहना पड़ा था कि वह उन्हें त्याग दे, ताकि उसके परिवार को भी नुकसान न उठाना पड़े । "लोग किराए पर मकान देने से कतराने लगे। मेरे चरित्र पर कीचड़ उछाला गया। यह सब इसलिए क्योंकि मैंने एक मासूम बच्ची के लिए आवाज उठाई थी, चाहे वह किसी भी धर्म की क्यों न हो," दीपिका ने दर्दभरे लहजे में कहा।

कठुआ मामले में स्थानीय बार एसोसिएशन ने पीड़ित परिवार की मदद करने से इनकार कर दिया और आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने का विरोध किया, तब दीपिका ने आगे आकर पीड़िता के पिता की ओर से पैरवी करने की पेशकश की। उन्होंने न सिर्फ पीड़ित परिवार का कानूनी पक्ष रखा, बल्कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक यह लड़ाई लड़ी। यहीं से दीपिका की मुश्किलें शुरू हुईं।
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सुप्रीम कोर्ट ने दी थी सुरक्षा

सुप्रीम कोर्ट ने 16 अप्रैल 2018 के आदेश से जम्मू और कश्मीर पुलिस के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया कि दीपिका और उनके परिवार के सदस्यों को सुरक्षा प्रदान की जाए। इसके साथ ही यह स्पष्ट निर्देश भी दिया गया कि यह सुरक्षा तब तक जारी रहेगी जब तक मुकदमे की सुनवाई पूरी नहीं हो जाती; उक्त आदेश के अनुपालन में दीपिका और उनकी बेटी साथ दो 'पर्सनल सिक्योरिटी ऑफिसर' (PSOs) तैनात किए गये।

2018 से ही दीपिका को लगातार सुनियोजित घृणा अभियानों, सार्वजनिक बदनामी, चरित्र हनन और विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा है। दीपिका कहती हैं, " दुर्भाग्य से आज भी मुझे संदेह और शत्रुता की दृष्टि से देखा जाता है और ऐसा किसी गलत काम के कारण नहीं, बल्कि इसलिए है क्योंकि मैंने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद न्याय के लिए संघर्ष किया, और इसके लिए मुझे व्यक्तिगत स्तर पर भारी कीमत चुकानी पड़ी।"

2018 में जब कठुआ की आठ साल की बच्ची के साथ हैवानियत हुई, तब दीपिका पुष्करनाथ ने बिना किसी डर के पीड़ित परिवार की ओर से लड़ाई लड़ी। सुप्रीम कोर्ट तक यह लड़ाई लड़कर उन्होंने न्याय दिलाया। लेकिन यह 'न्याय दिलाने' की कीमत उन्हें अपनी जिंदगी से चुकानी पड़ रही है। आज वह खुद सुरक्षा के लिए तरस रही हैं। उनकी बेटी स्कूल जाने से डरती है। जान से मारने की धमकियों के बीच सरकार ने उनकी सुरक्षा घटा दी है।

बजरंग दल का प्रदर्शन, पुतला जलाया

2020/2021 में नवरात्रि के दौरान ट्विटर पर दीपिका द्वारा किए गए एक ट्वीट के बाद कई जगहों पर BJP और उससे जुड़े दक्षिणपंथी समूहों द्वारा उनके पुतले जलाए गए। उनके घर के बाहर विरोध प्रदर्शन आयोजित किए गए, जो कई दिनों तक जारी रहे। जम्मू के बजरंग दल के सदस्यों ने उनके घर के बाहर आधी रात को विरोध प्रदर्शन किया और जान से मारने की धमकियाँ दीं; "दीपिका तेरी कब्र खोद देंगे, जम्मू कश्मीर की धरती पर" जैसे नारे लगाए।

ये धमकियाँ सार्वजनिक थीं, रिकॉर्ड की गई थीं और इनकी व्यापक रूप से रिपोर्ट भी की गई थी। लेकिन पुलिस द्वारा उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई; उलटा दीपिका के खिलाफ एक FIR दर्ज की गई। बाद में, दीपिका द्वारा एक याचिका दायर किए जाने पर, जम्मू के माननीय उच्च न्यायालय ने इसका संज्ञान लिया और उसी मामले में आरोप पत्र (chargesheet) दाखिल करने पर रोक लगा दी। गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए, उन्हें अग्रिम जमानत भी लेनी पड़ी, क्योंकि BJP और उससे जुड़े समूहों द्वारा सोशल मीडिया पर #ArrestDeepikaSinghRajawat अभियान चलाकर पुलिस पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाई जा रही थी।

"बेटी स्कूल नहीं जाती, डर का माहौल"

दीपिका कहती हैं," मैं एक नाबालिग बेटी की माँ हूँ, जो लगातार डर के साए में बड़ी हुई है। धमकियों के बीच जीने के मनोवैज्ञानिक और शारीरिक प्रभाव को कम करके नहीं आंका जा सकता। जिस खतरे का सामना हम कर रहे हैं, वह केवल एक अनुमान नहीं है; अतीत में देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा इसे आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया जा चुका है। मेरी और मेरी नाबालिग बेटी की जान को खतरा अभी टला नहीं है; यह केवल कुछ समय के लिए शांत हो गया है। खतरे की आशंका समय बीतने के साथ या कुछ आरोपियों के जेल जाने से खत्म नहीं हो जाती। जिन लोगों ने खुले तौर पर अपराधियों का समर्थन किया, जिन लोगों ने सार्वजनिक रूप से जान से मारने की धमकियाँ दीं, और जिन लोगों ने सुनियोजित घृणा अभियान चलाए, वे सभी अभी भी समाज में मौजूद हैं। इतिहास गवाह है कि हिंसा से पहले अक्सर चुप्पी छा ​​जाती है। तात्कालिक उकसावे की अनुपस्थिति को खतरे की अनुपस्थिति के बराबर नहीं माना जा सकता।"

चिट्ठी में उन्होंने लिखा है, "यह सुरक्षा कोई एहसान नहीं, बल्कि अनुच्छेद 21 के तहत मेरा मौलिक अधिकार है।
चिट्ठी में उन्होंने लिखा है, "यह सुरक्षा कोई एहसान नहीं, बल्कि अनुच्छेद 21 के तहत मेरा मौलिक अधिकार है। द मूकनायक

सुरक्षा में कटौती से बढ़ी दहशत

लेकिन अब एक नई मुसीबत ने उनकी जिंदगी में दस्तक दे दी है। दीपिका ने बताया कि 21 नवंबर 2025 को उन्होंने प्रशासनिक कारणों से एक पीएसओ को बदलने का अनुरोध किया था, लेकिन हैरान करने वाली बात यह हुई कि उनका एक पीएसओ हटा लिया गया और अब उनके पास सुरक्षा में केवल एक जवान बचा है। दीपिका कहती हैं, "मैं एक अकेली मां हूं और मेरी बेटी इमोशनली, लीगली और फिजिकली मुझ पर निर्भर है। मेरी बेटी के सवाल मुझे बेचैन कर देते हैं। इस डर का सबसे बुरा उसकी पढ़ाई पर पड़ रहा है।"

दीपिका कहती हैं, "जिन लोगों के पास सत्ता, रसूख या राजनीतिक करीबी होती है, उन्हें अक्सर सुरक्षा दी जाती है। लेकिन, जब कोई महिला और उसका नाबालिग बच्चा जिन्हें पहले ही 'कमज़ोर' (vulnerable) घोषित किया जा चुका हो, सुरक्षा की गुहार लगाते हैं, तो हमारा सिस्टम न जाने क्यों एकदम खामोश हो जाता है।"

कठुआ मामले में स्थानीय बार एसोसिएशन ने पीड़ित परिवार की मदद करने से इनकार कर दिया और आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने का विरोध किया, तब दीपिका ने आगे आकर पीड़िता के पिता की ओर से पैरवी करने की पेशकश की। उन्होंने न सिर्फ पीड़ित परिवार का कानूनी पक्ष रखा, बल्कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक यह लड़ाई लड़ी। यहीं से दीपिका की मुश्किलें शुरू हुईं।
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'सीजेआई को लिखा पत्र, सुरक्षा की गुहार'

मजबूर होकर दीपिका ने अब एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश को एक विस्तृत पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने बताया है कि कैसे 2018 से अब तक उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलती रही हैं। पत्र में लिखा कि, " मैं माननीय न्यायालय के सामने सिर्फ़ एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर नहीं आई हूँ जो अपनी सुरक्षा चाहता हो, बल्कि एक ऐसे नागरिक के तौर पर आई हूँ जो देश की सर्वोच्च अदालत की संवैधानिक अंतरात्मा को जगाना चाहता है। मैं बस इतना आश्वासन चाहती हूँ कि मेरी और मेरे बच्चे की जान बचाने के लिए जिस सुरक्षा को कभी 'बेहद ज़रूरी' माना गया था, वह अब प्रशासनिक मनमानी या संस्थागत उदासीनता की वजह से महज़ एक छलावा बनकर न रह जाए।

चिट्ठी में उन्होंने लिखा है, "यह सुरक्षा कोई एहसान नहीं, बल्कि अनुच्छेद 21 के तहत मेरा मौलिक अधिकार है। गौरी लंकेश, शुजात बुखारी की हत्या के बाद दर्ज एफआईआर उनकी जिंदगी वापस नहीं ला सकीं। इतिहास गवाह है कि चुप्पी के बाद ही हिंसा होती है। मुझे डर है कि कहीं मेरे साथ भी ऐसा न हो, और मेरी बेटी अकेली न रह जाए।" उन्होंने पत्र में मुख्य न्यायाधीश से गुहार लगाई है कि उनकी सुरक्षा में की गई कटौती पर तुरंत संज्ञान लिया जाए और पूर्व की तरह पूर्ण सुरक्षा बहाल की जाए।"

कठुआ मामले में स्थानीय बार एसोसिएशन ने पीड़ित परिवार की मदद करने से इनकार कर दिया और आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने का विरोध किया, तब दीपिका ने आगे आकर पीड़िता के पिता की ओर से पैरवी करने की पेशकश की। उन्होंने न सिर्फ पीड़ित परिवार का कानूनी पक्ष रखा, बल्कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक यह लड़ाई लड़ी। यहीं से दीपिका की मुश्किलें शुरू हुईं।
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