Himanta Files: कॉमरेड सुभाषिनी अली ने बताया असम CM अल्पसंख्यकों के लिए क्यों बड़ा खतरा और सुप्रीम कोर्ट में CPI(M) याचिका के क्या हैं गहरे मायने

याचिका में बताया गया कि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने 10 मई 2021 को पद संभालने के बाद से कई सार्वजनिक बयान दिए हैं, जो प्रिंट, टीवी और सोशल मीडिया पर फैले हैं। ये बयान अल्पसंख्यक को अपमानित करते हैं, झूठे स्टीरियोटाइप फैलाते हैं, सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार को बढ़ावा देते हैं और हिंसा की स्थिति पैदा करते हैं।
यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि मुख्यमंत्री संवैधानिक पद की शपथ का उल्लंघन कर रहे हैं और अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ घृणा का माहौल बना रहे हैं।
यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि मुख्यमंत्री संवैधानिक पद की शपथ का उल्लंघन कर रहे हैं और अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ घृणा का माहौल बना रहे हैं।ग्राफिक- आसिफ निसार/द मूकनायक
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नई दिल्ली: असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के खिलाफ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) दायर की है, जिसमें सरमा पर मुस्लिम समुदाय, खासकर बंगाली मूल के मुसलमानों ('मिया') के खिलाफ लगातार घृणा फैलाने वाले भाषणों, सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार की अपीलों और हिंसा भड़काने का आरोप लगाया गया है। यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि मुख्यमंत्री संवैधानिक पद की शपथ का उल्लंघन कर रहे हैं और अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ घृणा का माहौल बना रहे हैं। इसमें तत्काल हस्तक्षेप की मांग की गई है।

सबसे चर्चित मुद्दा 7 फरवरी को भाजपा असम प्रदेश के आधिकारिक X हैंडल (@BJP4Assam) पर पोस्ट किया गया 17 सेकंड का AI-जनरेटेड वीडियो है, जिसका टाइटल "पॉइंट ब्लैंक शॉट" था। वीडियो में मुख्यमंत्री को बंदूक चलाते दिखाया गया, जो दो मुस्लिम पुरुषों (दाढ़ी और टोपी वाली एनिमेटेड इमेज) पर क्रॉसहेयर में निशाना साध रही है। गोलियां चलती दिखाई गईं, साथ में "नो मर्सी" और "पॉइंट ब्लैंक शॉट" जैसे टेक्स्ट ओवरले थे। अंत में सरमा को काउबॉय लुक में दिखाया गया, साथ में स्लोगन जैसे "विदेशी मुक्त असम", "समुदाय, भूमि, जड़ें पहले", "पाकिस्तान क्यों नहीं गए" और "बांग्लादेशियों के लिए कोई माफी नहीं"। भारी विरोध और आलोचना के बाद वीडियो हटा लिया गया, लेकिन यह सोशल मीडिया पर अब भी वायरल है। असम भाजपा ने इसे "अनऑथराइज्ड" बताकर सोशल मीडिया विभाग के एक को-कन्वीनर को हटा दिया।

CPI(M) की सीनियर लीडर और याचिका की अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता कॉमरेड सुभाषिनी अली ने द मूकनायक को विस्तार से बताया कि यह मामला क्यों इतना खतरनाक है और याचिका के गहरे मायने क्या हैं।

सबसे गंभीर बात यह है कि ये बयान संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से आ रहे हैं, इसलिए इनमें राज्य की वैधता का आभास होता है, जो घृणा को सामान्य बनाता है।

सुभाषिनी कहती हैं, “यह याचिका इसलिए दायर की गई है क्योंकि असम में मुस्लिम समुदाय के खिलाफ एक सतत और बढ़ता पैटर्न है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने 10 मई 2021 से पद संभालने के बाद से कई सार्वजनिक बयान दिए हैं, जो प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया में फैले हैं। ये बयान अल्पसंख्यक को अपमानित करते हैं, झूठे स्टीरियोटाइप फैलाते हैं, सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार को बढ़ावा देते हैं और हिंसा की स्थिति पैदा करते हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि ये बयान संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा दिए जा रहे हैं, इसलिए इनमें राज्य की वैधता का आभास होता है।”

उन्होंने कहा, “7 फरवरी का वीडियो सबसे स्पष्ट उदाहरण है। इसमें मुख्यमंत्री को मुस्लिम पुरुषों पर 'पॉइंट ब्लैंक शॉट' और 'नो मर्सी' के साथ निशाना साधते दिखाया गया। यह हिंसा का प्रतीकात्मक संदेश है, जो एक मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया है। विरोध के बाद हटाया गया, लेकिन असर बाकी है। यह संविधान (सोलहवां संशोधन) अधिनियम, 1963 के तहत ली गई शपथ का खुला उल्लंघन है, जिसमें मंत्री भारत की संप्रभुता और अखंडता बनाए रखने की शपथ लेते हैं। ऐसे बयान सांप्रदायिक घृणा फैलाते हैं, जो संवैधानिक भाईचारे पर हमला है। सुप्रीम कोर्ट ने मनोज नरूला मामले में कहा है कि सार्वजनिक पद का दुरुपयोग अस्वीकार्य है।”

सरमा पर मुस्लिम समुदाय, खासकर बंगाली मूल के मुसलमानों ('मिया') के खिलाफ लगातार घृणा फैलाने वाले भाषणों, सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार की अपीलों और हिंसा भड़काने का आरोप है।
सरमा पर मुस्लिम समुदाय, खासकर बंगाली मूल के मुसलमानों ('मिया') के खिलाफ लगातार घृणा फैलाने वाले भाषणों, सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार की अपीलों और हिंसा भड़काने का आरोप है।

सुभाषिनी अली ने याचिका के मुख्य उदाहरण बताए:

1. जून 2023: बाराक ओबामा के बयान पर कहा, "भारत में कई हुसैन ओबामा हैं, पहले उनकी देखभाल करें।"

2. जुलाई 2023: सब्जी महंगाई का ठीकरा 'मिया' विक्रेताओं पर फोड़ा, कहा कि असमिया विक्रेता सस्ते होंगे। गुवाहाटी में 80% बस ड्राइवर और 70% ओला-उबर ड्राइवर मुस्लिम बताए।

3. अक्टूबर 2023: कहा कि भाजपा को 'मिया' वोटों की 10 साल तक जरूरत नहीं, जब तक वे परिवार नियोजन, बाल विवाह छोड़ें।

4. छत्तीसगढ़ चुनाव में 'लव जिहाद', 'धर्मांतरण' और कांग्रेस नेता मोहम्मद अकबर को निशाना बनाया।

5. CM की बहिष्कार की अपीलें: “ऐसी स्थिति बनाई जाए कि वे असम में रह न सकें। जमीन, वाहन, रिक्शा, ठेला न दें। फिर बांग्लादेशी खुद चले जाएंगे।” और “रिक्शा में 5 रुपये का किराया हो तो 4 रुपये दें, परेशान करेंगे तो वे छोड़ देंगे। हम खुले तौर पर मियाओं के खिलाफ हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने घृणा भाषण मामलों (कुर्बान अली, शाहीन अब्दुल्ला आदि) में निर्देश दिए थे कि पुलिस स्वत: एफआईआर दर्ज करे, अन्यथा अवमानना होगी। लेकिन असम में कोई कार्रवाई नहीं हुई। कई राज्यों में शिकायतें हुईं लेकिन एफआईआर नहीं। पुलिस निष्क्रिय है क्योंकि अपराधी राज्य का मुख्यमंत्री और केंद्र की सत्ताधारी पार्टी का नेता है। निष्पक्ष जांच असंभव है।

उन्होंने कहा, “ये बयान सिर्फ शब्द नहीं हैं। असम में गरीब रिक्शा पुलर्स और मजदूरों को कम पैसे दिए जा रहे हैं, उन्हें 'बांग्लादेशी' कहकर भगाया जा रहा है। लोग कहते हैं 'मुख्यमंत्री ने कहा है'। यह वास्तविक बहिष्कार और हिंसा का परिणाम है। ये भारतीय न्याय संहिता की धारा 196, 197, 299, 353 के तहत अपराध हैं, साथ ही जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125 भी लागू होती है।”

यह अनुच्छेद 14 (समानता), 15 (धर्म आधारित भेदभाव निषेध), 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और 21 (जीवन का अधिकार) का हनन है। यह संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता, भाईचारा और कानून के शासन पर हमला है। सरमा अवैध प्रवास की बात करते हैं लेकिन NRC में 19 लाख लोग बाहर हुए, जिनमें अधिकांश गैर-मुस्लिम थे, फिर भी सिर्फ मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है – यह स्पष्ट इस्लामोफोबिया है।

सुभाषिनी अली ने जोर देते हुए कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने घृणा भाषण मामलों (कुर्बान अली, शाहीन अब्दुल्ला आदि) में निर्देश दिए थे कि पुलिस स्वत: एफआईआर दर्ज करे, अन्यथा अवमानना होगी। लेकिन असम में कोई कार्रवाई नहीं हुई। कई राज्यों में शिकायतें हुईं लेकिन एफआईआर नहीं। पुलिस निष्क्रिय है क्योंकि अपराधी राज्य का मुख्यमंत्री और केंद्र की सत्ताधारी पार्टी का नेता है। निष्पक्ष जांच असंभव है।”

यह सब संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता, भाईचारा और कानून के शासन पर हमला है। याचिका में मांग है कि संबंधित धाराओं में एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दें, स्वतंत्र विशेष जांच टीम (SIT) गठित करने, भविष्य की एफआईआर SIT को ट्रांसफर करने आदि मांग की गई है।

सुभाषिनी अली ने कहा, “यह याचिका असम के मुसलमानों की सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश में संवैधानिक मूल्यों, भाईचारे और समानता को बचाने के लिए है। सुप्रीम कोर्ट ने घृणा के बढ़ते माहौल पर चिंता जताई है। हम उम्मीद करते हैं कि अदालत तत्काल हस्तक्षेप करेगी।”

यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि मुख्यमंत्री संवैधानिक पद की शपथ का उल्लंघन कर रहे हैं और अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ घृणा का माहौल बना रहे हैं।
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यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि मुख्यमंत्री संवैधानिक पद की शपथ का उल्लंघन कर रहे हैं और अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ घृणा का माहौल बना रहे हैं।
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