
इंदौर- मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने महाकुंभ 2025 से चर्चा में आई युवती की जन्मतिथि से जुड़े विवाद में अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस गजेंद्र सिंह ने जिला खरगोन के महेश्वर मुख्य नगर पालिका अधिकारी का 31 मार्च 2026 का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें युवती की जन्मतिथि 01.01.2008 से बदलकर 30.12.2009 कर दी गई थी। अदालत ने कहा कि जिस व्यक्ति पर इस बदलाव का सबसे ज्यादा असर पड़ता है, यानी स्वयं युवती, उसे इस पूरी प्रक्रिया में सुना ही नहीं गया। रिट पर सुनवाई 28 सितंबर को हुई थी और फैसला 30 सितंबर को सुनाया गया।
अदालत ने अपने आदेश में युवती की पहचान गोपनीय रखते हुए उसे केवल "एम" कहा है। चूंकि उसकी उम्र ही विवाद का विषय है और पिता उसे नाबालिग बता रहे हैं, इसलिए इस रिपोर्ट में भी उसका नाम नहीं दिया गया है।
याचिकाकर्ताओं युवती और उसके पति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक कृष्ण तन्खा और अधिवक्ता जैरी लोपेज पेश हुए, जबकि युवती के पिता (प्रतिवादी नंबर 3) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजेश महाजन और अधिवक्ता कमलेश मानवानी ने पैरवी की। राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू सहित अन्य अधिकारी उपस्थित रहे।
महाकुंभ 2025 की शुरुआत 13 जनवरी 2025 को प्रयागराज में हुई थी और करीब 45 करोड़ श्रद्धालु वहां पहुंचे थे। मध्य प्रदेश की यह युवती पारदी जनजाति समुदाय से ताल्लुक रखती है। वह अपने परिवार के साथ महाकुंभ मेले में आजीविका कमाने गई थी, लेकिन वहां रातोंरात चर्चित हो गई और सड़क पर सामान बेचने वाली लड़की से राष्ट्रीय स्तर की सेलिब्रिटी और फिल्मों में काम करने की इच्छुक अभिनेत्री बन गई। इसके बाद उसके माता-पिता ने महेश्वर नगर परिषद के जन्म-मृत्यु पंजीयक के पास जन्म प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया, जिसमें जन्मतिथि 01.01.2008 बताई गई और कहा गया कि जन्म घर पर हुआ था।
आवेदन के समर्थन में मां का 30.05.2025 का शपथ-पत्र लगाया गया। 05.06.2025 को आदेश के बाद जन्मतिथि 01.01.2008 दर्ज कर प्रमाणपत्र जारी कर दिया गया, जिसके हिसाब से युवती 01.01.2026 को बालिग हो गई। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे पहले 2015 में उसका आधार कार्ड बन चुका था, जिसमें यही जन्मतिथि थी, जबकि 2026 में पैन कार्ड और बालिग होने के बाद वोटर आईडी भी जारी हुए। आदेश में यह भी दर्ज है कि आधार कार्ड 28.05.2015 को और पैन 10.01.2026 को जारी हुआ था।
फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में युवती अपने पिता के साथ केरल गई, जहां एक मलयालम फिल्म में सह-कलाकार के रूप में काम कर रहे याचिकाकर्ता नंबर 2 से उसकी नजदीकी बढ़ी और दोनों में प्रेम संबंध हो गया। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि 10 मार्च 2026 को पिता ने युवती पर अपने चचेरे भाई से विवाह करने और मध्य प्रदेश लौटने का दबाव बनाया, और मां ने फोन पर बताया कि लौटने पर जबरन शादी कर दी जाएगी।
अगले दिन, 11 मार्च को तिरुवनंतपुरम के थंपानूर थाने में दस्तावेजों का सत्यापन हुआ। याचिकाकर्ताओं के अनुसार पुलिस ने उसकी उम्र और बालिग होने की पुष्टि की और पिता के खिलाफ धमकी व दबाव की उसकी शिकायत दर्ज की, जबकि पिता वहां मौजूद थे और उन्होंने दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर आपत्ति नहीं की। इसी दिन पूवार के एक मंदिर में दोनों ने विवाह किया, जिसका पंजीयन पूवार ग्राम पंचायत में केरल विवाह पंजीयन नियम 2008 के तहत कराया गया।
विवाद शादी के बाद शुरू हुआ। पिता ने खंड चिकित्सा अधिकारी, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, महेश्वर के पास आवेदन देकर जन्म प्रमाणपत्र के सुधार और निरस्तीकरण की मांग की। उनका कहना था कि बुजुर्ग रिश्तेदारों से पूछताछ में पता चला कि बेटी का जन्म सरकारी अस्पताल में हुआ था। पिता के पक्ष के अनुसार अस्पताल के 2009 के प्रसूति रजिस्टर में 30.12.2009 को शाम 5:50 बजे एक बालिका के जन्म की प्रविष्टि मिली, जिसके आधार पर 19.03.2026 को संस्थागत प्रमाणपत्र जारी हुआ।
इसके बाद तहसीलदार एवं कार्यपालिक मजिस्ट्रेट के निर्देश और नगर परिषद की कार्यवाही के बाद पुरानी प्रविष्टि रद्द कर जन्मतिथि 30.12.2009 दर्ज की गई। यह कार्रवाई जन्म-मृत्यु पंजीकरण अधिनियम 1969 की धारा 15 और मध्य प्रदेश जन्म-मृत्यु पंजीकरण नियम 2024 के नियम 11 के तहत की गई।
नई तारीख के हिसाब से शादी के समय युवती नाबालिग, लगभग 16 वर्ष की, ठहरती है और उसके बालिग होने की तारीख करीब दो साल आगे खिसक जाती है।
इसी बीच पिता की शिकायत पर 25 मार्च 2026 को थाना महेश्वर में युवती के पति के खिलाफ एफआईआर संख्या 112/2026 दर्ज हुई। शुरुआत में भारतीय न्याय संहिता की धारा 137(2) लगाई गई, बाद में धाराएं 81, 83 और 87, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 की धारा 9, और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 की धाराएं 3(2)(v) व 3(2)(v-a) भी जोड़ दी गईं। गिरफ्तारी की आशंका पर याचिकाकर्ताओं ने केरल हाईकोर्ट का रुख किया, जिसने 23 मार्च 2026 के आदेश से उन्हें अंतरिम संरक्षण दिया था।
याचिकाकर्ताओं का पक्ष है कि युवती की जन्मतिथि 01.01.2008 ही है, सभी सरकारी दस्तावेज यही दर्शाते हैं, वह बालिग है और उसने अपनी मर्जी से विवाह किया है। उनका कहना है कि माता-पिता ने बचपन में उसे और उसके भाई-बहनों को छोड़ दिया था और पिता तब लौटे जब वह चर्चित हो गई। उनका आरोप है कि पिता ने कुछ लोगों के साथ मिलकर साजिश रची और छोटे भाई के अस्पताल रिकॉर्ड में हेराफेरी कर उसमें युवती का नाम डलवा दिया, ताकि उसे नाबालिग दिखाया जा सके।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि मामले को मीडिया और सोशल मीडिया पर "लव जिहाद" का रंग दिया गया और इससे उनकी जान को खतरा है, साथ ही असली जन्म प्रमाणपत्र बिना नोटिस रद्द कर दिया गया। उन्होंने राहत के रूप में जन्म प्रमाणपत्र बहाल करने, कथित जालसाजी और साजिश की निष्पक्ष जांच कराने और संबंधित मूल दस्तावेज अदालत में पेश कराने की मांग की थी।
दूसरी ओर पिता और राज्य सरकार ने याचिका का कड़ा विरोध किया। पिता के अनुसार परिवार एक घुमंतू अनुसूचित जनजाति से है, मूलतः महाराष्ट्र का रहने वाला है और महेश्वर में रुद्राक्ष व मोती बेचकर गुजारा करता है। उनका कहना है कि युवती नाबालिग है, पहला प्रमाणपत्र केवल माता-पिता के शपथ-पत्र और अनुमान पर बना था, किसी वास्तविक रिकॉर्ड पर नहीं, और अस्पताल का रिकॉर्ड कहीं ज्यादा विश्वसनीय है। उनके अनुसार जन्म का पंजीयन पहले हुआ ही नहीं था, जिसकी पुष्टि 04.06.2025 के गैर-उपलब्धता प्रमाणपत्र से होती है, और देरी से पंजीकरण मजिस्ट्रेट के आदेश पर हुआ।
पिता के पक्ष ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की जांच का हवाला देते हुए कहा कि तहसीलदार और नगर परिषद अधिकारियों ने आयोग को बताया था कि जन्मतिथि माता-पिता के कथन और पटवारी की रिपोर्ट पर आधारित अनुमान थी। उनका यह भी दावा है कि शादी अचानक नहीं, बल्कि पहले से योजनाबद्ध थी और 10 मार्च की धमकी की बात बाद में गढ़ी गई सफाई है। उन्होंने कहा कि नोटिस के जवाब में मां ने सुधार का विरोध नहीं किया और पूर्व की गलती स्वीकार की। राज्य ने याचिका की स्वीकार्यता पर आठ प्रारंभिक आपत्तियां उठाईं, जिनमें यह शामिल था कि याचिकाकर्ता नाबालिग है, जालसाजी जैसे गंभीर तथ्यात्मक विवाद रिट क्षेत्राधिकार में तय नहीं हो सकते, वैकल्पिक उपाय मौजूद है और याचिकाकर्ताओं ने तथ्य छिपाए हैं।
युवती का परिवार अनुसूचित जनजाति से है और उसके पति के खिलाफ अत्याचार निवारण अधिनियम की धाराएं लगाई गई हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मामले को "लव जिहाद" बताकर सांप्रदायिक रंग दिया गया।
अदालत ने सबसे पहले जन्मतिथि बदलने के गंभीर नतीजों पर ध्यान दिया। जस्टिस गजेंद्र सिंह ने कहा कि जन्मतिथि 01.01.2008 से 30.12.2009 होने पर बालिग होने की तारीख लगभग दो साल टल जाती है, जिससे युवती अनुच्छेद 326 के तहत मताधिकार से वंचित होगी, बैंक खाते केवल संरक्षकों के जरिए चला सकेगी, अनुबंध करने की उसकी क्षमता को मान्यता नहीं मिलेगी, और विवाह जैसे निजी चयन के उसके अधिकार पर खतरा पैदा होगा, यहां तक कि उसके साथी पर आपराधिक कार्रवाई का जोखिम भी रहेगा।
अदालत के अनुसार बालिग होने पर मिलने वाले कई अन्य अधिकार भी दो साल के लिए टल जाएंगे, और इस तरह की कोई भी रोक, चाहे दो साल की ही क्यों न हो, अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हनन है। अदालत ने पिता की टाइमिंग पर भी टिप्पणी की और कहा कि उन्होंने "जमीन-आसमान एक" तभी किया जब युवती ने अपनी पसंद से विवाह किया। कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि युवती के स्कूल में दाखिले का कोई रिकॉर्ड सामने नहीं आया, जिससे उम्र का विवाद आसानी से सुलझ सके।
फैसले का मुख्य आधार नैसर्गिक न्याय रहा। प्रतिवादियों का तर्क था कि मध्य प्रदेश जन्म-मृत्यु पंजीकरण नियम 2024 के नियम 11 में उस बच्चे को नोटिस देने का प्रावधान नहीं है जिसकी जन्मतिथि बदली जा रही है, और उपनियम (7) के अनुसार सुधार की सूचना केवल जानकारी देने वाले के स्थायी पते पर भेजी जानी होती है। अदालत ने कहा कि जब पीड़ित स्वयं युवती है, तब केवल पिता को सूचना देना "ऑडी अल्टरम पार्टेम" के सिद्धांत, यानी किसी को भी बिना सुने दंडित न करने के नियम, की पूर्ति नहीं करता। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए, जिनमें दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन मामले में संविधान पीठ का निर्णय शामिल है, अदालत ने कहा कि यह सिद्धांत अनुच्छेद 14 का अभिन्न हिस्सा है और केवल अर्ध-न्यायिक ही नहीं, बल्कि किसी के हितों को प्रभावित करने वाले प्रशासनिक आदेशों पर भी लागू होता है।
याचिका की स्वीकार्यता पर वैकल्पिक उपाय की आपत्ति को भी अदालत ने नहीं माना। जन्म-मृत्यु पंजीकरण अधिनियम की धारा 25ए के तहत उपाय उपलब्ध होने की दलील पर कोर्ट ने कहा कि वैकल्पिक वैधानिक उपाय अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के अधिकार में पूर्ण बाधा नहीं है। राधा कृष्ण इंडस्ट्रीज बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2021) में सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों के आधार पर अदालत ने कहा कि मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन और नैसर्गिक न्याय के उल्लंघन की स्थिति में रिट याचिका सुनी जा सकती है।
अंतिम आदेश में अदालत ने मुख्य नगर पालिका अधिकारी, महेश्वर के आदेश क्रमांक 405/न.पा./2026 दिनांक 31.03.2026 को निरस्त कर दिया। साथ ही निर्देश दिया कि वह पिता के आवेदन पर युवती को प्रभावी सुनवाई का अवसर देकर कानून के अनुसार नए सिरे से निर्णय ले। इसी के साथ याचिका का निपटारा कर दिया गया।
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