पुरानी जाति का दर्जा मुस्लिम पिछड़ा वर्ग में नहीं होगा ट्रांसफर, सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार की अपील खारिज की

शीर्ष अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट का फैसला रखा बरकरार
धर्मांतरण के बाद दोबारा हिंदू बनने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट का साफ संदेश
धर्मांतरण के बाद दोबारा हिंदू बनने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट का साफ संदेश
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नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने अपने लेटेस्ट आदेश में मद्रास हाईकोर्ट के उस निर्णय को सही ठहराया, जिसमें कहा गया था कि इस्लाम धर्म अपनाने वाला व्यक्ति धर्मांतरण से पहले की अपनी सामाजिक स्थिति के आधार पर पिछड़ा वर्ग आरक्षण का हकदार नहीं है। शीर्ष न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार की अपील खारिज कर दी। तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग आयोग ने 6 फरवरी 2024 के पत्र में सिफारिश की थी कि धर्मांतरण पर पिछड़े वर्गों के लोगों को सात चिह्नित समूहों में से किसी एक का सामुदायिक प्रमाणपत्र दिया जाए।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस चंद्रशेखर की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि इस्लाम कबूल करने मात्र से कोई व्यक्ति राज्य के सात अधिसूचित पिछड़े वर्ग समुदायों में से किसी का सदस्य नहीं बन जाता। पीठ के अनुसार, उसकी पूर्व जातीय स्थिति को मुस्लिम पिछड़ा वर्ग श्रेणी में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता, और कोई निजी धार्मिक संस्था भी ऐसी पात्रता को अंतिम रूप से तय नहीं कर सकती।

पीठ ने कहा कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था से किसी गैर-हिंदू सामाजिक व्यवस्था में जाने वाला व्यक्ति केवल पूर्व स्थिति से जुड़े सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर अनुच्छेद 16(4) के तहत सकारात्मक कार्रवाई का दावा नहीं कर सकता। पूर्ववर्ती सामाजिक व्यवस्था में झेला गया पिछड़ापन अपने आप आगे नहीं ले जाया जा सकता, जिससे व्यक्ति को नई सामाजिक व्यवस्था में पिछड़े वर्ग का दर्जा मिल जाए।

अनुसूचित जाति के संबंध में पीठ ने कहा कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश के तहत हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा कोई अन्य धर्म मानने वाला व्यक्ति अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। ऐसे में किसी अन्य धर्म में परिवर्तन करने पर उसका अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त हो जाता है और वह अनुच्छेद 16(4) के तहत उस दर्जे पर आधारित लाभ नहीं ले सकता।

पीठ के अनुसार गैर-हिंदू सामाजिक व्यवस्था में जाने से अपने आप किसी विशेष पिछड़ी जाति समुदाय की सदस्यता नहीं मिलती। धर्मांतरण के कारण पूर्व जाति या समुदाय की स्थिति किसी अधिसूचित पिछड़ा वर्ग समुदाय में स्थानांतरित नहीं हो सकती, और धर्मांतरण से पहले की स्थिति का सामाजिक पिछड़ापन, अपने आप में, धर्मांतरण के बाद किसी अन्य अधिसूचित पिछड़े वर्ग समुदाय की सदस्यता देने का कानूनी आधार नहीं बन सकता।

पुनः धर्मांतरण के मामले में पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू व्यवस्था से गैर-हिंदू व्यवस्था में जाकर फिर हिंदू व्यवस्था में लौटता है, तो उसकी पात्रता केवल पूर्व स्थिति से तय नहीं होगी। इसके लिए स्वतंत्र और तथ्य-आधारित जांच जरूरी होगी कि मूल जाति या सामाजिक पहचान वास्तव में पुनर्जीवित हुई है या नहीं और व्यक्ति ने लागू संवैधानिक व कानूनी शर्तें पूरी की हैं या नहीं।

अंत में पीठ ने कहा कि इस्लाम, ईसाई या किसी अन्य गैर-हिंदू सामाजिक व्यवस्था में धर्मांतरण के बाद ऐसा कोई लाभ, संरक्षण या आरक्षण पूर्व सदस्यता के आधार पर नहीं मांगा जा सकता, जो किसी विशेष सामाजिक व्यवस्था पर निर्भर है। पीठ के अनुसार ऐसा धर्मांतरण हिंदू सामाजिक व्यवस्था की सदस्यता पर टिकी पात्रता की कानूनी बुनियाद को समाप्त कर देता है।

धर्मांतरण से पहले की स्थिति का जो सामाजिक पिछड़ापन किसी व्यक्ति के दर्जे का आधार था, वह अपने आप में धर्मांतरण के बाद किसी अन्य अधिसूचित पिछड़े वर्ग समुदाय की सदस्यता देने का कानूनी आधार नहीं बन सकता।
- सुप्रीम कोर्ट

हाईकोर्ट ने रद्द किया था 2024 का सरकारी आदेश

मद्रास हाईकोर्ट ने 2024 में जारी उस सरकारी आदेश (जीओ) को असंवैधानिक करार दिया था, जिसके तहत पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग, विमुक्त समुदाय या अनुसूचित जाति से इस्लाम अपनाने वाले व्यक्ति को बीसी (मुस्लिम) माना जाना था। उसे आरक्षण के लिए सात अधिसूचित वर्गों में से किसी एक का सामुदायिक प्रमाणपत्र दिया जाना था।

तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (शैक्षणिक संस्थानों में सीटों और राज्य सेवाओं में नियुक्तियों या पदों का आरक्षण) अधिनियम, 1993 के तहत पिछड़े वर्ग के मुस्लिम के रूप में अधिसूचित सात समूह हैं: अंसार, दक्खनी मुस्लिम, दुबेकुला, लब्बई (राउथर और मरक्कयार सहित), मापिल्ला, शेख और सैयद।

जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस पी.बी. बालाजी की हाईकोर्ट पीठ ने कहा था कि यह आदेश हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों के सख्त खिलाफ है, जिनके अनुसार इस्लाम अपनाने वाले व्यक्ति को केवल मुस्लिम ही माना जा सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि

हाईकोर्ट समीर अहमद की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिन्होंने 2015 में हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाया था। इसके लिए 2016 में राजपत्र अधिसूचना जारी हुई थी। समीर ने इस्लामी रीति-रिवाजों से विवाह भी किया और उनके दो बच्चे हैं।

समीर ने "मुस्लिम लेब्बई" समुदाय का सामुदायिक प्रमाणपत्र मांगा, लेकिन तहसीलदार ने आवेदन खारिज कर दिया। इसी के खिलाफ उन्होंने याचिका दायर की। उनका दावा था कि 9 मार्च 2024 को बीसी, एमबीसी और एमडब्ल्यू विभाग (माइनॉरिटी वेलफेयर) द्वारा जारी सरकारी आदेश के तहत उन्हें प्रमाणपत्र मिल सकता है।

हाईकोर्ट पीठ की राय थी कि यह आदेश शायद न्यायिक जांच में न टिक पाए। इसलिए उसने आदेश की वैधता परखने के लिए राज्य सरकार को पक्षकार बनाया।

राज्य ने दलील दी कि आदेश मनमाने ढंग से जारी नहीं किया गया था। उसके अनुसार तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग आयोग ने 6 फरवरी 2024 के पत्र में सिफारिश की थी कि धर्मांतरण पर पिछड़े वर्गों के लोगों को सात चिह्नित समूहों में से किसी एक का सामुदायिक प्रमाणपत्र दिया जाए। सरकार ने कहा कि आदेश विस्तृत विचार-विमर्श के बाद पारित हुआ और इसका उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना था कि आरक्षण का लाभ ले रहे लोग इस्लाम अपनाने से उसे न खोएं। राज्य का तर्क था कि ऐसे लोगों को आरक्षण देने से सामाजिक संतुलन प्रभावित नहीं होगा।

हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने 6 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की थी। याचिका एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड बी. करुणाकरण के माध्यम से दाखिल की गई।

(सोर्स: लाइव लॉ रिपोर्ट)

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