
जयपुर- राजस्थान उच्च न्यायालय की जयपुर बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ग्रामीण राजस्थान की सदियों पुरानी 'नाता विवाह' प्रथा को कानूनी मान्यता प्रदान करते हुए एक विधवा को उसके सरकारी सेवक पति की मृत्यु के बाद परिवारिक पेंशन का हकदार ठहराया है। सिविल रिट याचिका संख्या 17330/2022 में याचिकाकर्ता राम प्यारी सुमन को उनके पति पुरण लाल सैनी की मृत्यु के बाद परिवारिक पेंशन और उसके बकाया राशि के साथ 18 प्रतिशत ब्याज देने का निर्देश देते हुए जस्टिस अशोक कुमार जैन ने कहा कि वैवाहिक विवादों के बावजूद, यदि पत्नी को विधिवत तलाक नहीं दिया गया हो, तो वह पेंशन की हकदार है। इस फैसले ने न केवल याचिकाकर्ता को न्याय दिलाया, बल्कि राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में प्रचलित नाता विवाह जैसी प्रथाओं को भी कानूनी संरक्षण प्रदान किया है।
नाता प्रथा राजस्थान में पायी जाने वाली एक ऐसी प्रथा है, जिसमें एक विवाहित महिला अपने पति की मृत्यु के बाद या अपने पति से तलाक लेने के बाद किसी दूसरे पुरुष के साथ समाज के स्थापित नाता प्रथा के रीति-रिवाजों से एक पत्नी की तरह रहने लगती है ताकि वो अन्य विवाहित महिला कि तरह अपना परिवार बसा सके। इस प्रथा को मान्यता देने वाले समाज और जातियों में किसी युवती के पति की मृत्यु के बाद उसे सामाजिक रीति-रिवाज से दूसरा विवाह करने का अधिकार जिस रिवाज से प्राप्त है, उसे आधिकारिक तौर पर समाज नाता प्रथा के रुप में मान्यता देता है।
मामला कोटा जिले के एक साधारण परिवार से जुड़ा है, जहां राम प्यारी सुमन ने अपने पहले पति की मृत्यु के बाद पुरण लाल सैनी से नाता विवाह रचा था। पुरण लाल सैनी एक पटवारी थे और 20 दिसंबर 2020 को उनकी मृत्यु हो गई। सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें पेंशन पेमेंट ऑर्डर जारी किया गया था, लेकिन मृत्यु के बाद राम प्यारी को परिवारिक पेंशन देने से इनकार कर दिया गया। याचिकाकर्ता का दावा था कि वे पुरण लाल की दूसरी पत्नी हैं और उनके गर्भ से एक बेटी का जन्म हुआ था। उन्होंने दलील दी कि वैवाहिक विवाद के कारण उन्होंने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत परिवारिक न्यायालय, कोटा में गुजारा भत्ता प्राप्त किया था, जिसे पुरण लाल ने चुकाया भी। बाद में धारा 127 के तहत गुजारे की राशि बढ़ाने की अर्जी पर सुनवाई के दौरान पुरण लाल ने खुद कोर्ट में गवाही दी और राम प्यारी को अपनी पत्नी स्वीकार किया।
न्यायालय ने इस मामले को विस्तार से सुना, जहां याचिकाकर्ता के वकील तुषार पंवार, रोहित कुमार महड़ा, विनीता सैनी और विजय लक्ष्मी ने जोर देकर कहा कि पुरण लाल की गवाही ही पर्याप्त प्रमाण है। उन्होंने राजस्थान सिविल सेवा (पेंशन) नियमावली, 1996 के नियम 66 का हवाला देते हुए कहा कि पत्नी को नोमिनेशन की कमी के बावजूद पेंशन का अधिकार है, यदि तलाक नहीं हुआ हो।
याचिकाकर्ता के वकील ने राजस्थान हाईकोर्ट के एक समनुरूप पीठ के उर्मिला देवी बनाम राजस्थान राज्य के मामले और दिल्ली हाईकोर्ट के डिवीजन बेंच के सोनी देवी बनाम भारत संघ के फैसले का हवाला दिया था, जहां यह माना गया था कि कानूनी तौर पर तलाक न होने पर, भले ही पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद हो और पत्नी को लाभार्थी नामित न किया गया हो, पत्नी पेंशन की हकदार होती है।
राज्य सरकार के वकील ने विरोध करते हुए कहा था कि याचिकाकर्ता का नाम मृतक कर्मचारी द्वारा जमा कराए गए परिवार विवरण में नहीं है, इसलिए वह पेंशन की हकदार नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने स्वयं अपने आवेदन में 'नाता पत्नी' होने का उल्लेख किया है, जो एक अनुबंध जैसा संबंध है और विवाह नहीं माना जा सकता।
उन्होंने तर्क दिया कि राम प्यारी का नाम पुरण लाल के सरकारी रिकॉर्ड में परिवारिक सदस्य के रूप में दर्ज नहीं था। 17 जनवरी 2006 को जमा कराए गए परिवारिक विवरण में केवल दो पुत्रों - अनूप कुमार सैनी और प्रमोद कुमार सैनी - का उल्लेख था। प्रतिवादी पक्ष ने याचिकाकर्ता के ही संलग्नक-3 का हवाला देते हुए कहा कि यह एक 'नाता' जैसा संविदात्मक संबंध मात्र है, न कि विधिवत विवाह। इसलिए पेंशन का कोई अधिकार नहीं बनता। उन्होंने जोर दिया कि सरकारी नियमों के अनुसार, नामांकन के बिना लाभ नहीं दिया जा सकता।
न्यायालय ने दोनों पक्षों के तर्कों को ध्यानपूर्वक सुना और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री का अवलोकन किया। जस्टिस जैन ने फैसले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की: "सामग्री पर विचार करने से स्पष्ट है कि वर्तमान याचिकाकर्ता ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत पुरण लाल सैनी से गुजारा भत्ता प्राप्त किया, जो 25 अप्रैल 2008 को स्वीकृत हुआ। उसके बाद धारा 127 के तहत दाखिल अर्जी मिसलेनियस क्रिमिनल केस संख्या 359/2014 में 14 फरवरी 2017 को फैसला आया, जिसमें गवाह एनएडब्ल्यू-1 पुरण लाल की गवाही पेज नंबर 3 पर दर्ज है। यह गवाही स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि पुरण लाल सैनी ने वर्तमान याचिकाकर्ता राम प्यारी को अपनी पत्नी बताया और स्वीकार किया कि उनके वैवाहिक संबंध से एक बेटी का जन्म हुआ। सरकारी सेवक की यह गवाही स्वीकार्य है और यह फैसले का हिस्सा होने से विवादास्पद मुद्दे को तय करने के लिए निर्णायक है।" इस उद्धरण से न्यायालय ने पुरण लाल की स्वीकारोक्ति को पेंशन के दावे का मजबूत आधार माना।
फैसले में नाता विवाह की प्रथा पर विशेष प्रकाश डाला गया, जो राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित है। न्यायालय ने कहा कि पहले पति की मृत्यु या अलगाव के बाद महिलाएं पुरुषों के साथ संविदात्मक वैवाहिक संबंध स्थापित करती हैं। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7 के अनुसार, यदि यह पक्षकारों की समुदाय की प्रथागत रीतियों के अनुसार संपन्न हो, तो नाता विवाह को वैध माना जाता है। न्यायमूर्ति जैन ने टिप्पणी की: "नाता विवाह राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में एक रूप है और इसे विवाह के रूप में स्वीकार किया जाता है। याचिकाकर्ता के आवेदन में स्वयं 'नाता पत्नी' का उल्लेख है, लेकिन पुरण लाल की स्वीकारोक्ति से निष्कर्ष निकलता है कि याचिकाकर्ता मृत सरकारी सेवक पुरण लाल सैनी की पत्नी हैं।" न्यायालय ने नाता विवाह को मात्र संविदा न बताते हुए इसे पूर्ण वैवाहिक बंधन माना।
नोमिनेशन की कमी के मुद्दे पर न्यायालय ने पूर्व फैसलों का सहारा लिया। उर्मिला देवी मामले में कोऑर्डिनेट बेंच ने स्पष्ट किया कि पत्नी का नाम न दर्ज होने से अधिकार समाप्त नहीं होता। इसी प्रकार, दिल्ली हाईकोर्ट के सोनी देवी फैसले में कहा गया कि वैवाहिक विवाद पेंशन को प्रभावित नहीं करते। न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला: "नियम 66 के प्रावधान और सरकारी विवरण जमा न करने के मुद्दे को उर्मिला देवी बनाम राजस्थान राज्य (सुप्रा) और स्मत् सोनी देवी बनाम भारत संघ (सुप्रा) में पहले ही विचार किया जा चुका है। इसलिए, याचिका स्वीकार्य है।" इस आधार पर, प्रतिवादी राज्य सरकार, वित्त विभाग के प्रधान सचिव, पेंशन निदेशक, अतिरिक्त निदेशक भरतपुर और जिला कलेक्टर भरतपुर को निर्देश दिया गया कि राम प्यारी को पुरण लाल की पत्नी और कानूनी लाभार्थी मानते हुए नियम 66 के अनुसार परिवारिक पेंशन प्रदान करें।
यह फैसला राजस्थान में महिलाओं के आर्थिक अधिकारों के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। क़ानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इससे ग्रामीण महिलाओं, जो पारंपरिक विवाह प्रथाओं से बंधी हैं, को सरकारी योजनाओं का लाभ मिलना आसान होगा। याचिका में मिसलेनियस आवेदन भी निपटाया गया और कोई लागत का आदेश नहीं दिया गया। यह निर्णय न केवल राम प्यारी जैसे व्यक्तियों को न्याय देता है, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में एक सकारात्मक कदम है, जो पुरानी रूढ़ियों को चुनौती देता है।
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