
तेनी- तमिलनाडु के तेनी जिले में एक तिरुनंगा (ट्रांसजेंडर) महिला आराधना ने पुलिस विभाग में नौकरी पाने का सपना देखा था, लेकिन आठ साल बीत जाने के बाद भी उसका सपना अधूरा है। आराधना ने साल 2018 में द्वितीय श्रेणी पुलिस भर्ती परीक्षा पास की थी, लेकिन उन्हें आज तक नियुक्ति नहीं मिली है। सरकार के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़कर वह अदालत से फैसला भी जीत चुकी हैं, फिर भी उनकी मुश्किलें कम नहीं हुई हैं।
तेनी के पारास्ट्रोड 6वीं गली की निवासी आराधना (उम्र 33) इन दिनों गृह रक्षक दल (ऊरक्कावल पड़ई) में सेवाएं दे रही हैं। उन्हें बचपन से ही पुलिस की वर्दी पहनने का शौक था। वह बताती हैं, "जब मैंने 2018 में द्वितीय श्रेणी पुलिस भर्ती परीक्षा के लिए आवेदन करना चाहा, तो मुझे अनुमति नहीं दी गई क्योंकि उस समय तिरुनंगाओं (ट्रांसजेंडर) के लिए अलग से आवेदन करने की कोई व्यवस्था ही नहीं थी।"
आराधना ने हार नहीं मानी। उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया और अदालत के आदेश के बाद परीक्षा दी। उन्होंने लिखित परीक्षा में सफलता प्राप्त की, लेकिन जब बारी आई शारीरिक दक्षता परीक्षा (Physical Efficiency Test) की, तो उन्हें बुलाया ही नहीं गया। इसके बाद आराधना ने मद्रास हाईकोर्ट में एक और याचिका दायर की।
हाईकोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि समाज में तिरुनंगाएं अत्यधिक पिछड़ी हुई स्थिति में जीवन यापन कर रही हैं, इसलिए उन्हें सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया जाना चाहिए। कोर्ट के इसी आदेश के आधार पर आराधना के लिए 2018 में पुलिस विभाग में एक पद आरक्षित किया गया था।
आराधना का मामला अन्य तिरुनंगाओं के मामलों के साथ जोड़ दिया गया। कुल पांच तिरुनंगाओं ने मिलकर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाई। साल 2022 में अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिए कि इन सभी पांचों तिरुनंगाओं को शारीरिक दक्षता परीक्षा सहित अन्य सभी चरणों में महिलाओं वाली सुविधाएं दी जाएं, और पूरी भर्ती प्रक्रिया को आठ सप्ताह के भीतर पूरा किया जाए।
अदालत के इस फैसले से जहां आराधना और उनके साथियों को उम्मीद जगी थी, वहीं तमिलनाडु सरकार ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर कर दी। यह अपील अब भी लंबित है। आराधना कहती हैं, "हमने कानूनी लड़ाई लड़ी, हमने फैसला जीता, लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हुआ। सरकार ने हमारे खिलाफ अपील कर दी है, और तब से हम फिर से उसी इंतजार के दौर में हैं।"
कुछ साल पहले निराशा के चरम पर पहुंचकर आराधना ने तेनी कलेक्टर कार्यालय में एक अर्जी दी थी। उन्होंने कहा था, "अगर मेरा पुलिस बनने का सपना पूरा नहीं किया गया, तो मेरी नागरिकता रद्द कर दीजिए और मुझे यूथेनेसिया (इच्छा-मृत्यु ) करके मार डालिए।" उनका यह कदम तब पूरे इलाके में सनसनी बन गया था, लेकिन इसके बाद भी उनकी समस्या का समाधान नहीं हो सका।
आराधना ने बताया कि पुलिस वर्दी के प्रति उनके मोह ने उन्हें 2019 में गृह रक्षक दल (होम गार्ड) में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। वह अब वहां सेवाएं दे रही हैं, लेकिन उनका असली सपना अभी भी अधूरा है। वह कहती हैं, "हम तिरुनंगाओं के लिए इस समाज में सामान्य जीवन जीना बहुत मुश्किल है। हमारी पहचान ही हमारे सपनों की राह में सबसे बड़ी बाधा बन जाती है। क्या हमारे लिंग के कारण ही हमें पुलिस की नौकरी नहीं मिलनी चाहिए?"
अपने सपने को अब भी जिंदा रखे हुए आराधना ने तमिलनाडु सरकार से गुजारिश की है, "हमने जो फैसला अदालत से लड़कर हासिल किया है, उसके खिलाफ सरकार ने जो अपील दायर की है, कृपया उसे वापस ले लीजिए। अदालत के आदेश को लागू कीजिए। अगर ऐसा होता है, तो हमारी जिंदगी से अंधेरा छंट जाएगा। तमिलनाडु सरकार हमारे ऊपर कृपा करे।" पा रंजीत के नीलम सोशल संस्था ने भी आराधना का समर्थन करते हुए तमिल नाडू सरकार से सहयोग की अपील की है।
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