सुप्रीम कोर्ट: ट्रांसजेंडर शिक्षिका अब दिल्ली सरकार के स्कूलों में कर सकेंगी आवेदन; विज्ञापन में अन्य लिंग लिखा होने पर भी नहीं रोक!

अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया कि जेन कौशिक OARS पोर्टल पर 'ट्रांसजेंडर' श्रेणी के तहत आवेदन कर सकती हैं, चाहे उस विशेष शिक्षक पद के लिए विज्ञापन में किसी भी लिंग का उल्लेख क्यों न किया गया हो।
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर शिक्षिका को बड़ी राहत दी है।
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नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने एक ट्रांसजेंडर शिक्षिका को एक अहम अंतरिम राहत देते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि दिल्ली सरकार में शिक्षकों की भर्ती के लिए जारी विज्ञापनों में वह बिना किसी भेदभाव के ट्रांसजेंडर श्रेणी में आवेदन कर सकती हैं, भले ही उस पद के लिए किसी अन्य लिंग (पुरुष/महिला) का उल्लेख क्यों न किया गया हो।

जस्टिस जे.बी. पार्डीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने याचिकाकर्ता जेन कौशिक की अर्जी पर सुनवाई करते हुए 14 मई को अगली सुनवाई के लिए नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ता ने दिल्ली हाईकोर्ट के 18 दिसंबर 2025 के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे सलाहकार समिति के पास जाने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को प्रथम दृष्टया गलत माना, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को सलाहकार समिति के पास भेजकर "त्रुटि" की है, क्योंकि उस समिति के पास न्यायिक निर्णय देने की शक्ति नहीं है। कोर्ट ने कहा, “प्रथम दृष्टया, हमारी राय है कि हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए गलती की है, क्योंकि समिति के पास कोई adjudicatory powers नहीं हैं।

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ये है पूरा विवाद

याचिकाकर्ता जेन कौशिक, जो एक ट्रांसजेंडर महिला हैं, दिल्ली सरकार के स्कूलों में शिक्षक (टीचर) के पद के लिए आवेदन करना चाहती थीं। हालाँकि, उन्हें कई बाधाओं का सामना करना पड़ा:

 ऑनलाइन आवेदन पोर्टल (OARS) पर केवल 'पुरुष' और 'महिला' का विकल्प था, 'ट्रांसजेंडर' का कोई विकल्प नहीं था। ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए न तो कोई अलग आरक्षित रिक्ति (Separate Vacancy) निकाली जा रही थी, न ही कोई नीति बनी थी।

याचिका में जेन कौशिक ने दिल्ली उपराज्यपाल, NCT दिल्ली और अन्य के विरुद्ध SLP दायर की थी, जो दिल्ली हाईकोर्ट के 18 दिसंबर 2025 के फैसले के खिलाफ है। याचिका में मांग की गई थी कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए शिक्षण पदों पर अलग रिक्तियां अधिसूचित की जाएं, न्यूनतम योग्यता और आयु में छूट दी जाए, दिल्ली सरकार के सभी नियुक्तियों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए नीति बनाई जाए, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019 और नियम 2020 को लागू किया जाए तथा याचिकाकर्ता को ऑनलाइन आवेदन पोर्टल पर अपना कानूनी लिंग और नाम बदलने की अनुमति दी जाए।

 दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्हें सलाहकार समिति (Advisory Committee) के पास भेज दिया, तो वह इस फैसले से असहमत हो गईं और सुप्रीम कोर्ट पहुँच गईं।

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कोर्ट ने अपने आदेश में याद दिलाया कि 2023 में जेन कौशिक ने इसी मामले में आर्टिकल 32 के तहत याचिका दायर की थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने 2026 (1) SCC 336 में जेन कौशिक बनाम यूनियन ऑफ इंडिया नाम से फैसला सुनाया था। उस फैसले में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम और नियमों के क्रियान्वयन से संबंधित कई बाध्यकारी दिशानिर्देश जारी किए गए थे। साथ ही जस्टिस (सेवानिवृत्त) आशा मेनन की अध्यक्षता में एक सलाहकार समिति गठित की गई थी, जो समान अवसर नीति, अधिनियम में कमियों को दूर करने, सार्वजनिक स्थानों में उचित समायोजन, शिकायत निवारण तंत्र आदि पर सिफारिशें दे रही है।

कोर्ट ने प्रथम दृष्टया यह राय जताई कि हाईकोर्ट में उठाए गए कई मुद्दे पहले ही जेन कौशिक (सुप्रा) फैसले में विस्तार से सुलझाए जा चुके हैं। बचा हुआ मुख्य मुद्दा दिल्ली सरकार द्वारा ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए अलग रिक्तियां अधिसूचित न करने और रोजगार की न्यूनतम आवश्यकताओं में छूट न देने का है, जो याचिकाकर्ता को शिक्षण पदों के लिए आवेदन करने में बाधा पहुंचा रहा है।

महत्वपूर्ण अंतरिम राहत देते हुए कोर्ट ने कहा, “हम सूचित किए गए हैं कि याचिकाकर्ता ने ओएआरएस पोर्टल पर पंजीकरण कराया है। दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका लंबित रहते हुए भी याचिकाकर्ता को ट्रांसजेंडर कैटेगरी के तहत रिक्तियों के लिए आवेदन करने की अनुमति दी गई थी, जिसमें रिक्ति के लिए उल्लिखित लिंग को नजरअंदाज किया जा सकता था। हम वही आदेश पारित करते हैं और वही राहत प्रदान करते हैं।”

कोर्ट ने 20 जनवरी 2023 के दिल्ली हाईकोर्ट के सिंगल जज के आदेश का भी हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि याचिकाकर्ता रिक्ति के उल्लिखित लिंग को नजरअंदाज करते हुए ट्रांसजेंडर कैटेगरी में उपयुक्त रिक्तियों के लिए आवेदन कर सकती हैं, ।

इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अमृतानंद चक्रवर्ती, एओआर श्रेया मुनोथ, असावरी सोढ़ी और तवलीन कौर सलूजा ने पक्ष रखा।

यह आदेश ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के रोजगार में समावेशन और Transgender Persons (Protection of Rights) Act, 2019 के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सलाहकार समिति सिफारिशें दे सकती है, लेकिन विवादों का न्यायिक समाधान उसका काम नहीं है।

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