
लखनऊ- बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने देश की उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिवादी भेदभाव को दूर करने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए नए नियमों पर हो रहे विवाद पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि सामान्य वर्ग के कुछ लोगों द्वारा इसे अपने खिलाफ भेदभाव बताकर विरोध करना उचित नहीं है। उन्होंने साथ ही सुझाव दिया कि ऐसे नियमों को लागू करने से पहले सभी पक्षों को विश्वास में लेना चाहिए ताकि सामाजिक तनाव न फैले।
मायावती ने अपने बयान में तीन मुख्य बिंदुओं पर जोर दिया। पहला, UGC के नए नियम के तहत सरकारी कॉलेजों और निजी विश्वविद्यालयों में 'इक्विटी कमेटी' (समता समिति) बनाने के प्रावधानों को केवल जातिवादी मानसिकता वाले लोग ही अपने खिलाफ षड्यंत्र मानकर विरोध कर रहे हैं, जो पूरी तरह गलत है। उन्होंने कहा कि यह कदम उच्च शिक्षा में जातिवादी भेदभाव के निराकरण के लिए आवश्यक है।
दूसरा, पार्टी का मानना है कि यदि इन नियमों को लागू करने से पहले सभी संबंधित पक्षों को विश्वास में ले लिया जाता, तो यह बेहतर होता और देश में अनावश्यक सामाजिक तनाव का कारण भी नहीं बनता। मायावती ने सरकारों और संस्थानों से अपील की कि भविष्य में इस ओर विशेष ध्यान दिया जाए।
तीसरा, उन्होंने दलितों और पिछड़े वर्गों के लोगों को चेतावनी दी कि वे इन वर्गों के स्वार्थी और बिकाऊ नेताओं के भड़काऊ बयानों के जाल में न फंसें। ऐसे नेता इन मुद्दों का इस्तेमाल अपनी घिनौनी राजनीति के लिए करते रहते हैं। मायावती ने इन वर्गों से सावधान रहने की अपील की।
बसपा उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष विश्वनाथ पाल ने भी मायावती के बयान का समर्थन करते हुए कहा, "UGC द्वारा सरकारी कॉलेज एवं निजी यूनिवर्सिटियों में भी 'इक्विटी कमेटी' (समता समिति) बनाने के नए नियम के कुछ प्रावधानों को सामान्य वर्ग के केवल जातिवादी मानसिकता के ही लोगों द्वारा इसे अपने विरुद्ध भेदभाव व षड्यंत्रकारी मानकर इसका जो विरोध किया जा रहा है, तो यह कतई भी उचित नहीं है।" उन्होंने मायावती को 'आदरणीय बहन कुमारी' कहकर श्रद्धा व्यक्त की।
UGC के इन नए नियमों को लेकर हाल ही में कई सामान्य वर्ग संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किए हैं, जिससे शिक्षा क्षेत्र में बहस तेज हो गई है। लखनऊ यूनिवर्सिटी में मंगलवार को स्टूडेंट्स ने प्रदर्शन किया। छात्रों ने नियमों को काला कानून बताते हुए इसे वापस लेने की मांग की है। वहीं छात्रों ने आरोप लगाया कि ये नियम जनरल कैटेगरी के छात्रों के खिलाफ भेदभावपूर्ण हैं। यह नियम झूठे मामलों को बढ़ावा देगा। हालांकि, यूनिवर्सिटी प्रशासन ने प्रदर्शनकारी छात्रों पर परीक्षा बाधित करने का आरोप लगाते हुए कार्रवाई करने की चेतावनी दी है।
उग्र प्रदर्शनों के बीच बसपा का यह बयान विवाद को और हवा दे सकता है, खासकर आगामी चुनावी माहौल में। पार्टी ने स्पष्ट किया है कि ये नियम सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं और उनका समर्थन किया जाएगा। उधर आज़ाद समाज पार्टी चीफ और नगीना सांसद ने भी नियमों का समर्थन किया है, अपने बयान में उन्होंने कहा, " उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव को समाप्त करने के उद्देश्य से लाए गए UGC (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु) विनियम, 2026 का विरोध अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के छात्रों के अधिकारों के संदर्भ में किया जाना सामाजिक न्याय के विरुद्ध एक भ्रामक एवं संगठित प्रयास है, जो अत्यंत चिंताजनक है। जबकि UGC (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु) विनियम, 2026 का मूल उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म-स्थान अथवा दिव्यांगता के आधार पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों तथा दिव्यांगजनों या इनमें से किसी भी वर्ग के सदस्यों के विरुद्ध होने वाले भेदभाव का उन्मूलन करना तथा सभी हितधारकों के मध्य पूर्ण समता एवं समावेशन को सुनिश्चित करना है। उच्च शिक्षा संस्थानों के हितधारकों के मध्य पूर्ण समता एवं समावेशन को संवर्धन करने के उद्देश्य लाए गए UGC (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु) विनियम, 2026 का भीम आर्मी - आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) पूर्ण समर्थन करती है।"
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