
नई दिल्ली- भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) दिल्ली में 16 से 18 जनवरी को आयोजित 'जाति और नस्ल का आलोचनात्मक दर्शन' (सीपीसीआर-3) सम्मेलन अब देशव्यापी बहस का केंद्र बन गया है। एक ओर सोशल मीडिया पर आयोजकों की कड़ी आलोचना हो रही है, क्योंकि सम्मेलन में भारत के दलितों की स्थिति को फिलिस्तीनियों के दमन से जोड़ा गया। दूसरी ओर, पूर्व आईएएस अधिकारी पी. शिवकामी जैसे बुद्धिजीवियों ने इसे शैक्षणिक स्वतंत्रता पर हमला बताते हुए आयोजकों का खुला समर्थन किया है।
आईआईटी प्रशासन ने बढ़ते विवाद को देखते हुए जांच समिति गठित कर दी है। आइए, समझते हैं कि आखिर यह विवाद क्यों भड़का और इसमें क्या-क्या हुआ।
यह तीसरा सीपीसीआर सम्मेलन था, जिसका आयोजन आईआईटी दिल्ली के मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभाग के 'क्रिटिकल फिलॉसफी ऑफ कास्ट एंड रेस' (सीपीसीआर) रिसर्च ग्रुप ने किया। मुख्य आयोजक प्रोफेसर दिव्या द्विवेदी और सौजन्या तमलापाकुला थीं। सम्मेलन 2001 में दक्षिण अफ्रीका के डरबन में हुए विश्व नस्लवाद विरोधी सम्मेलन की 25वीं वर्षगांठ पर आधारित था। वहां जाति को नस्लवाद के वैश्विक रूप के तौर पर मान्यता दी गई थी।
सम्मेलन में कीनोट व्याख्यान, पैनल चर्चाएं, राउंड टेबल बहसें, किताबों का विमोचन और फिल्म स्क्रीनिंग शामिल थीं। जाति, नस्ल, लिंग, धर्म, औपनिवेशिक इतिहास और वैश्विक मानवाधिकार विषय थे। आयोजकों का कहना था कि यह सम्मेलन भारत की पुरानी असमानताओं को वैश्विक संदर्भ में समझने का प्रयास था। इसमें भारत, अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका और यूरोप के विद्वान शामिल हुए। लेकिन कुछ सत्रों में उद्बोधनों ने आग लगा दी।
विवाद का मुख्य कारण एक सत्र बना, जिसमें स्कॉलर आरुषि पूनिया ने 'दलितों और फिलिस्तीनियों के बीच क्या समानताएं हैं?' शीर्षक पर व्याख्यान दिया। पूनिया ने कहा कि भारत में दलितों को जो अपमान, सामाजिक अलगाव, आर्थिक शोषण और सांस्कृतिक विलोपन झेलना पड़ता है, वह फिलिस्तीनियों की इजरायल के 'एथ्नो-नेशनल स्टेट' के तहत दमनकारी जिंदगी से मिलता-जुलता है। उन्होंने जातिगत हिंसा को नस्लीय वर्चस्व के समकक्ष बताया और कहा कि दोनों ही मामलों में 'उत्पीड़क' समूह अपनी श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए 'पीड़ितों' को कुचलते हैं।
प्रोफेसर दिव्या द्विवेदी के कीनोट पेपर 'डरबन के अवशेष: जाति और नस्ल की आलोचनात्मक दर्शन की ओर' ने भी हंगामा मचा दिया। उन्होंने जाति को 'रेस प्लस' (नस्ल से आगे की चीज) करार दिया और कहा कि इसकी जड़ें पूर्व-औपनिवेशिक 'आर्य सिद्धांत' और ब्रिटिश काल के 'आर्यन इनवेजन थ्योरी' में हैं। द्विवेदी ने इसे 'पेलियो रेसिज्म' (प्राचीन नस्लवाद) कहा। उन्होंने हिंदू धर्म को 20वीं सदी में 'निम्न जाति बहुमत को छिपाने' के लिए गढ़ा गया 'धोखा' बताया। 2023 के जी20 साक्षात्कार में भी उन्होंने भारत को 'हिंदू धर्म से ऊपर उठकर जाति-रहित समतामूलक समाज' बनाने की सलाह दी थी।
अमेरिकी संगठन इक्वेलिटी लैब्स की संस्थापक थेनमोझी सौंदरराजन ने 'डरबन के 25 वर्ष: दलित अमेरिकियों पर नस्लीय और जातिगत समानता का प्रभाव' पर बोला। इक्वेलिटी लैब्स अमेरिका में भारतीय मूल के ऊपरी जाति लोगों पर दलित सहकर्मियों के खिलाफ भेदभाव के आरोप लगाती है। सौंदरराजन ने संस्कृत को 'ब्राह्मणों तक सीमित' बताया और योग को 'शिकारी व्यवहार' को बढ़ावा देने वाला कहा। इन बयानों ने सोशल मीडिया पर तूफान ला दिया।
सम्मेलन का एजेंडा और वक्ताओं की सूची एक्स पर वायरल होते ही आलोचना की बाढ़ आ गई। पूर्व सीबीआई निदेशक एम. नागेश्वर राव ने इसे 'राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने वाली एंटी-हिंदू डीप स्टेट की साजिश' कहा। उन्होंने आरोप लगाया कि यह 'एंटी-नेशनल और अस्थिरकारी गतिविधियां' हैं, जो शैक्षणिक आड़ में हिंदू समाज को बदनाम करती हैं। राव ने लिखा, "आईआईटी जैसे संस्थान विज्ञान के लिए हैं, न कि विभाजनकारी विचारधाराओं के लिए।"
अन्य आलोचकों का कहना है कि सम्मेलन हिंदू समाज को अपरिवर्तनीय रूप से दमनकारी दिखाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्यों फिलिस्तीन-इजरायल जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दे को भारतीय जाति से जोड़ा जा रहा है? कुछ ने इसे 'वामपंथी एजेंडा' बताया, जो भारत की सांस्कृतिक एकता को तोड़ने की कोशिश है। आलोचकों का मानना है कि ऐसे आयोजन राष्ट्रीय हितों के खिलाफ हैं और संस्थानों को सतर्क रहना चाहिए।
विवाद के बीच पूर्व आईएएस अधिकारी और 'ऑल इंडिया फोरम फॉर विमेन इंटेलेक्चुअल्स' की संयोजक पी. शिवकामी ने एक विस्तृत थ्रेड में आयोजकों का समर्थन किया। उन्होंने इसे सेंसरशिप का मामला बताते हुए शैक्षणिक स्वतंत्रता की रक्षा की अपील की। उन्होंने कहा, " आईआईटी दिल्ली जैसे संस्थान बौद्धिक नेतृत्व (vanguard of intellect) के केंद्र होने चाहिए। लेकिन सीपीसीआर3 सम्मेलन में जाति पर चर्चा कराने को लेकर आयोजकों के खिलाफ जो कथित कार्रवाई/विरोध हुआ है, वह इस बात का संकेत है कि हम उन सामाजिक वास्तविकताओं से डर रहे हैं, जिनका सामना करना सबसे ज़रूरी है। हमें इस तरह की सेंसरशिप के ख़िलाफ़ खड़ा होना होगा।
जाति पर संवाद कराने के लिए “आयोजकों को कटघरे में खड़ा करना” अकादमिक स्पेस को कृत्रिम रूप से साफ़-सुथरा बनाने की कोशिश है। आप “आधुनिक भारत” बनाने का दावा नहीं कर सकते, और साथ ही उसकी सबसे पुरानी व्यवस्थागत असमानताओं को खोलकर देखने वालों को दंडित भी करें।
प्रशासन से कहना है: विश्वविद्यालय कोई पीआर एजेंसी नहीं, बल्कि विचारों की प्रयोगशाला (crucible of thought) होता है। जब आप किसी सम्मेलन को दबाते हैं, तो आप संस्थान की छवि नहीं बचा रहे होते—आप यह संकेत दे रहे होते हैं कि आलोचनात्मक सामाजिक विमर्श यहाँ स्वागतयोग्य नहीं है।
हम संवाद से क्यों डर रहे हैं? जाति कोई “हाशिए” का विषय नहीं है; यह हमारे समाज की संरचनात्मक वास्तविकता है। इन चर्चाओं को चुप कराकर IITDelhi एक शिक्षण स्थल से यथास्थिति बनाए रखने की जगह बनने का जोखिम उठा रहा है।
शिवकामी ने कहा," हम सीपीसीआर3 के आयोजकों के खिलाफ किसी भी दंडात्मक कार्रवाई की निंदा करते हैं। हमें ऐसे संवाद और ज़्यादा चाहिए, कम नहीं। अकादमिक स्वतंत्रता कोई विशेषाधिकार नहीं जिसे दिया जाए, वह हर उस संस्था की नींव है जो अपने नाम के योग्य होना चाहती है।"
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