UGC Equity Regulations 2026 पर दो फाड़: किन प्रावधानों से सामान्य वर्ग नाराज़, जानिये क्यों हो रही 'रोल बैक' की मांग

सोशल मीडिया पर कई इन्फ्लुएंसर और यूजर यूजीसी के इस नियम का कड़ा विरोध कर रहे हैं और तमाम तरह के पोस्ट कर रहे हैं। साथ ही यूजीसी के नए रेगुलेशन को वापस लेने की मांग हो रही है। इसी बीच राजस्थान में इस यूजीसी के इस कदम के खिलाफ एस-4 का गठन हुआ है। जिसमें ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य और कायस्थ संगठन एक साथ आए हैं।
यूजीसी के अनुसार, ये नियम सुप्रीम कोर्ट के एक मामले में दिए निर्देशों का पालन हैं, जहां जातिगत भेदभाव को उच्च शिक्षा में समाप्त करने पर जोर दिया गया था।  नियम 'कास्ट-बेस्ड डिस्क्रिमिनेशन' को पूरी तरह समाप्त करने के लिए जिम्मेदारी संस्थानों पर डालते हैं। हालांकि, सामान्य वर्ग के संगठनों का कहना है कि ये प्रावधान किसी हालिया डेटा के आधार के बिना,  'व्यापक जातिगत भेदभाव' की धारणा पर टिके हैं।
यूजीसी के अनुसार, ये नियम सुप्रीम कोर्ट के एक मामले में दिए निर्देशों का पालन हैं, जहां जातिगत भेदभाव को उच्च शिक्षा में समाप्त करने पर जोर दिया गया था। नियम 'कास्ट-बेस्ड डिस्क्रिमिनेशन' को पूरी तरह समाप्त करने के लिए जिम्मेदारी संस्थानों पर डालते हैं। हालांकि, सामान्य वर्ग के संगठनों का कहना है कि ये प्रावधान किसी हालिया डेटा के आधार के बिना, 'व्यापक जातिगत भेदभाव' की धारणा पर टिके हैं। सोशल मीडिया
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नई दिल्ली- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा 13 जनवरी को जारी 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु नियम, 2026' (UGC Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations) ने उच्च शिक्षा क्षेत्र में व्यापक बहस छेड़ दी है। ये नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति, लिंग, धर्म या दिव्यांगता आधारित भेदभाव को समाप्त करने का लक्ष्य रखते हैं, लेकिन सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के छात्रों और संगठनों ने इन्हें 'जातिगत विभाजन को बढ़ावा देने वाला' बताते हुए रद्द करने की मांग तेज कर दी है।

सोशल मीडिया पर #UGCRollback हैशटैग ट्रेंड कर रहा है, और दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर समेत कई शहरों में छात्र संगठनों ने विरोध प्रदर्शन की योजना बनाई है। यूजीसी का कहना है कि ये नियम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर आधारित हैं और सभी छात्रों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करेंगे, लेकिन आलोचकों का मानना है कि प्रावधानों में अस्पष्टता और एकतरफा फोकस से सामान्य वर्ग को नुकसान हो सकता है। सोशल मीडिया पर कई इन्फ्लुएंसर और यूजर यूजीसी के इस नियम का कड़ा विरोध कर रहे हैं और तमाम तरह के पोस्ट कर रहे हैं। साथ ही यूजीसी के नए रेगुलेशन को वापस लेने की मांग हो रही है। इसी बीच राजस्थान में इस यूजीसी के इस कदम के खिलाफ एस-4 का गठन हुआ है। जिसमें ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य और कायस्थ संगठन एक साथ आए हैं।

काली सेना प्रमुख स्वामी आनंद स्वरूप ने बताया कि यूजीसी वाले मुद्दे सहित सवर्ण समाज के मुद्दों पर विचार करने के लिए समन्वय समिति का गठन किया गया है। जयपुर में 20 जनवरी को समस्त करणी सेना , कायस्थ महासभा , ब्राह्मण संगठनों और वैश्य संगठनों के साथ मिलकर एक समन्वय समिति का गठन किया गया है जिसका नाम सवर्ण समाज समन्वय समिति है , जो देश भर में काम करने वाले समस्त सवर्ण संगठनों (सामान्य श्रेणी) के बीच समन्वय बनाने के लिए कार्य करेगी।

जयपुर में आलोचकों ने यूजीसी नियमों के विरोध में प्रदर्शन किया।
जयपुर में आलोचकों ने यूजीसी नियमों के विरोध में प्रदर्शन किया। सोशल मीडिया

नियमों का उद्देश्य भेदभाव मुक्त कैंपस

यूजीसी इन नियमों को 2012 के पुराने दिशानिर्देशों के स्थान पर लाया है, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के 'पूर्ण समता और समावेशन' सिद्धांत पर आधारित हैं। मुख्य प्रावधानों में प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान (एचईआई) में 'समान अवसर केंद्र' (ईओसी) की स्थापना, 'समता समिति' का गठन, 24x7 समता हेल्पलाइन और 'इक्विटी स्क्वॉड्स' तथा 'इक्विटी एम्बेसडर्स' की व्यवस्था शामिल है। ये तंत्र भेदभाव की शिकायतों पर 24 घंटे में बैठक, 15 दिनों में जांच रिपोर्ट और 7 दिनों में कार्रवाई सुनिश्चित करते हैं। अनुपालन न करने पर संस्थानों को यूजीसी योजनाओं से वंचित करने या डिग्री प्रोग्राम बंद करने जैसी सजाएं दी जा सकती हैं।

यूजीसी के अनुसार, ये नियम सुप्रीम कोर्ट के एक मामले में दिए निर्देशों का पालन हैं, जहां जातिगत भेदभाव को उच्च शिक्षा में समाप्त करने पर जोर दिया गया था। नियम 'कास्ट-बेस्ड डिस्क्रिमिनेशन' को पूरी तरह समाप्त करने के लिए जिम्मेदारी संस्थानों पर डालते हैं। हालांकि, सामान्य वर्ग के संगठनों का कहना है कि ये प्रावधान किसी हालिया डेटा के आधार के बिना, 'व्यापक जातिगत भेदभाव' की धारणा पर टिके हैं। स्वराज्य मैगजीन ने बताया कि सोशल मीडिया पर आक्रोश मुख्य रूप से 'इक्विटी स्क्वॉड्स' और 'एम्बेसडर्स' पर केंद्रित है, जिन्हें 'ड्रेकोनियन मॉनिटरिंग सिस्टम' (कठोर निगरानी तंत्र) कहा जा रहा है।

सामान्य वर्ग की मुख्य आपत्तियां: अस्पष्ट परिभाषाएं और झूठे आरोपों का खतरा

विवाद की जड़ में नियमों की 'भेदभाव' परिभाषा है, जो 'अंतर्निहित' (इंप्लिसिट) व्यवहारों को भी शामिल करती है, भले ही इरादा न हो। ओपइंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, ये प्रावधान प्रक्रियागत संतुलन की कमी पैदा करते हैं और सामान्य वर्ग को 'स्वत: दमनकारी' (ऑटोमैटिक ओप्रेसर) ठहरा सकते हैं। आलोचकों का कहना है कि केवल एससी/एसटी/ओबीसी को 'विक्टिम' मानना सामान्य वर्ग के खिलाफ पूर्वाग्रह दिखाता है, जबकि उनके खिलाफ भेदभाव को अनदेखा किया गया।

एक बड़ी चिंता झूठे आरोपों को लेकर है। आलोचकों का कहना है कि नियमों में फर्जी शिकायतों के लिए कोई सजा का प्रावधान नहीं है, जिससे 'पेटेंटली फाल्स असंप्शन' (स्पष्ट रूप से गलत धारणा) को बढ़ावा मिलेगा। शिकायत पर तुरंत कार्रवाई (24 घंटे में बैठक) और आरोपी पर सबूत का बोझ डालना 'गिल्टी अनटिल प्रूवन इनोसेंट' (दोषी साबित होने तक निर्दोष नहीं) का सिद्धांत लागू करता है। ये नियम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों से प्रेरित हैं, लेकिन सामान्य वर्ग के छात्रों को 'टारगेट' करने का डर व्यक्त किया गया।

इसके अलावा, कैंपस में सिविल सोसाइटी, एनजीओ और पुलिस का समावेश राजनीतिकरण का खतरा पैदा करता है। स्कोप का विस्तार फैकल्टी और स्टाफ तक होने से एससी/एसटी/ओबीसी शिक्षक सामान्य वर्ग के छात्रों के खिलाफ शिकायत कर सकते हैं। इक्विटी स्क्वॉड्स को 'स्निचिंग कल्चर' (चुगली का माहौल) पैदा करने वाला बताया जा रहा है, जो कैंपस को 'फियरफुल एनवायरनमेंट' (डर का वातावरण) बना सकता है। कुल प्रभाव: लगातार डर, आसान मूल्यांकन में पक्षपात, व्यक्तिगत विवादों का हथियार बनना, और संस्थानों पर सजाएं जो ब्यूरोक्रेसी बढ़ाएंगी।

विवाद का एक महत्वपूर्ण आयाम महिलाओं की सुरक्षा है। इंस्टाग्राम रील में अभियानकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि ये नियम 'प्रीडेटर मर्दों' को सामान्य वर्ग की लड़कियों के खिलाफ दुरुपयोग करने का मौका देंगे रिजेक्शन या रिवेंज के लिए। रिपोर्ट्स में कहा गया है कि हर छात्र को सुरक्षा मिलनी चाहिए, लेकिन प्रावधानों की अस्पष्टता एक्सप्लॉइटेशन को आसान बना सकती है। टेलीग्राफ इंडिया के संपादकीय में उल्लेख है कि गैर-अनुपालन पर सख्त सजाएं (जैसे डिग्री प्रोग्राम बंद) संस्थानों को दबाव में ला सकती हैं, जो न्याय को प्रभावित करेगी।

शुभम शुक्ला नामक एक यूजर ने x पर लिखा: UGC के नोटिफिकेशन में निकाला गया नियम वास्तव में बहुत ही ख़तरनाक है:—- यह सामान्य वर्ग के बच्चों का आत्मविश्वास कम करने वाला है। छोटी छोटी बात पर बच्चे जाँच में उलझ जायेंगे, तो पढ़ेंगे कब? उनके करियर का क्या होगा? वास्तव में सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ यह स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा षड़यंत्र है सवर्ण बच्चों के साथ। सरकार को तत्काल इस पर ध्यान देना चाहिए।

एक अन्य पोस्ट में लिखा, " UGC और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान जी ने अगर 26 जनवरी तक सामान्य वर्ग विरोधी नोटिफिकेशन में संशोधन नहीं किया तो 26 जनवरी को पूरी दुनिया इस सोशिल मीडिया पर देखेगी कि छात्रों के साथ किस तरह का अन्याय जो रहा है। 26 जनवरी को जब देश गणतंत्र दिवस मनाएगा तब पूरे देश के शोषित पीड़ित सामान्य वर्ग के छात्र अपने लिए न्याय माँगेंगे। उस दिन सोशल मीडिया में पूरे दिन UGC ट्रेंड करेगा।"

सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट रीना सिंह के मुताबिक, "UGC की ‘Equity Regulation’ असल में सामान्य वर्ग (General Category) के खिलाफ खुला भेदभाव है। केवल SC/ST/OBC/Minority को संरक्षित किया गया है, जबकि सामान्य वर्ग को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया है — यह अनुच्छेद 14 और 15 का सीधा उल्लंघन  है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि झूठे SC/ST मामलों के खिलाफ कोई सुरक्षा नहीं, शिकायतकर्ता के लिए शून्य जवाबदेही है और आरोपी सामान्य वर्ग के विद्यार्थी को दोषी मान लिया जाता है, जाँच बाद में। यह ‘Equity’ नहीं, बल्कि चयनात्मक संवेदना और बहिष्कार  है, जो समाज में डर और विभाजन पैदा करती है। बांटो और काटो — फिर वोट मांगो? क्या यही लोकतंत्र और संविधान है? भारत  समान अधिकारों से चलेगा, न कि चयनात्मक ‘Equity’ से। अब चुप रहना विकल्प नहीं है!"

समर्थक बोल रहे 'समावेशन की क्रांति!

समर्थक इसे 'समता का आवश्यक कदम' बता रहे हैं। वे मानते हैं कि केंद्र ने जातिगत भेदभाव से निपटने के लिए बड़ा हस्तक्षेप किया है। नियम कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज में जातिगत भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य रखते हैं।

मध्यप्रदेश से भीम आर्मी लीडर सुनील अस्तेय कहते हैं, "UGC द्वारा जारी की गई नई गाइडलाइंस का उद्देश्य किसी भी वर्ग के खिलाफ़ जाना नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालय परिसरों में समानता, पारदर्शिता और छात्र-सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इन दिशा-निर्देशों के अंतर्गत Equal Opportunity Centre, Equity Committee , 24×7 शिकायत निवारण तंत्र जैसी व्यवस्थाएँ अनिवार्य की गई हैं, ताकि किसी भी छात्र के साथ होने वाले भेदभाव, उत्पीड़न या अन्याय पर समयबद्ध और निष्पक्ष कार्रवाई हो सके। इन गाइडलाइंस को “किसी वर्ग विशेष के विरोध” के रूप में प्रस्तुत करना भ्रामक और तथ्यहीन है। वास्तव में, यह पहल संविधान में निहित समानता, गरिमा और न्याय के मूल सिद्धांतों को मजबूत करती है और सभी छात्रों के लिए सुरक्षित व समावेशी शैक्षणिक वातावरण बनाने की दिशा में एक आवश्यक कदम है। शिक्षा संस्थानों में जवाबदेही और समान अवसर से किसी को डरने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। जो भी संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखता है, उसे UGC के इस प्रयास का स्वागत करना चाहिए।"

BASF (भीम आर्मी स्टूडेंट्स फेडरेशन) के डॉ घनश्याम कहते हैं, " हमारा आंदोलन नए UGC (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा) रेगुलेशन नोटिफिकेशन (2026) पर चल रहा है।भेदभाव की परिभाषा को बढ़ाया गया है ताकि इसमें खुले और छिपे दोनों तरह के काम शामिल हों - हालांकि, कामों को विशेष रूप से लिस्टेड नहीं किया गया है, जिससे अस्पष्टता पैदा होती है जो जातिवादियों की मदद कर सकती है। OBCs को इस एक्ट में साफ तौर पर शामिल किया गया है, जिसका हम स्वागत करते हैं - हालांकि, अब OBC नेताओं को भी यह समझना चाहिए कि केवल अंबेडकरवादी संवैधानिकवाद ही उनके बच्चों के अधिकारों के लिए लड़ रहा है, न कि RW विचारधारा। उच्च संस्थानों को इक्विटी अपॉर्चुनिटी सेंटर (EOC) स्थापित करने होंगे - जिसमें संस्थान के प्रमुख की अध्यक्षता में एक इक्विटी कमेटी (EC) होगी और SC, ST, OBC, महिला, PwD सदस्य होंगे। यह EOC अपनी गतिविधियों पर हर छह महीने में रिपोर्ट तैयार करेगा और आगे भेजेगा। - हालांकि, हमारी चिंता यह है कि ऐसे सदस्य प्रमुख के चमचे नहीं होने चाहिए। उनके पास स्वतंत्र और खोजी दिमाग होना चाहिए। एक तरीका है BASF जैसे अंबेडकरवादी छात्र संगठनों को शामिल करना। साथ ही हम मांग करते हैं कि इस कमेटी के पास जातिवादियों का पता लगाने और उन्हें दंडित करने की खोजी और कार्यकारी शक्ति होनी चाहिए, जैसे कि निष्कासन, सेवा से बर्खास्तगी, रोक और PhD रद्द करना, ताकि ऐसे अपराधियों को स्थायी रूप से अपंग किया जा सके। राष्ट्रीय निगरानी और देखरेख UGC द्वारा एक कमेटी के साथ प्रदान की जाएगी जिसमें वैधानिक निकायों, NGOs, नागरिक समाज के सदस्य शामिल होंगे। - हम फिर से घोषणा करते हैं कि हम इस स्तर पर खुद को शामिल करेंगे और हम आगे मांग करते हैं कि एक राष्ट्रीय स्तर का डैशबोर्ड स्थापित किया जाए, साथ ही प्राप्त शिकायतों पर कार्रवाई के लिए निश्चित समय-सीमा तय की जाए। यह UGC द्वारा शुरू किया गया एक अच्छा कदम है, अंबेडकरवादी लोकतांत्रिक दबाव के कारण, लेकिन निश्चित रूप से हम उम्मीद करते हैं कि जातिवादी इस प्रक्रिया को कमजोर करने, भटकाने और खत्म करने की कोशिश करेंगे। हालांकि, जब तक हम हैं, हम अपने बच्चों के साथ कोई अन्याय नहीं होने देंगे।"

वरिष्ठ आईआरएस अधिकारी नेत्रपाल कहते हैं, " यूजीसी के नियमों पर मेरी सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि यह अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ को सभी के लिए एक समान भेदभाव प्रकोष्ठ से बदल रहा है। मुझे नहीं पता कि यह कारगर होगा या नहीं। क्या होगा अगर भेदभाव प्रकोष्ठ या तथाकथित समानता प्रकोष्ठ में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए कोई उचित आवाज न हो, जिन्हें विश्वविद्यालयों में सबसे अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है? अनुसूचित जनजाति/अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ में एक संपर्क अधिकारी होना संविधान द्वारा अनिवार्य है। मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई बदलाव किया जाना चाहिए।"

यूजीसी के अनुसार, ये नियम सुप्रीम कोर्ट के एक मामले में दिए निर्देशों का पालन हैं, जहां जातिगत भेदभाव को उच्च शिक्षा में समाप्त करने पर जोर दिया गया था।  नियम 'कास्ट-बेस्ड डिस्क्रिमिनेशन' को पूरी तरह समाप्त करने के लिए जिम्मेदारी संस्थानों पर डालते हैं। हालांकि, सामान्य वर्ग के संगठनों का कहना है कि ये प्रावधान किसी हालिया डेटा के आधार के बिना,  'व्यापक जातिगत भेदभाव' की धारणा पर टिके हैं।
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यूजीसी के अनुसार, ये नियम सुप्रीम कोर्ट के एक मामले में दिए निर्देशों का पालन हैं, जहां जातिगत भेदभाव को उच्च शिक्षा में समाप्त करने पर जोर दिया गया था।  नियम 'कास्ट-बेस्ड डिस्क्रिमिनेशन' को पूरी तरह समाप्त करने के लिए जिम्मेदारी संस्थानों पर डालते हैं। हालांकि, सामान्य वर्ग के संगठनों का कहना है कि ये प्रावधान किसी हालिया डेटा के आधार के बिना,  'व्यापक जातिगत भेदभाव' की धारणा पर टिके हैं।
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