कैंपस में समता: क्या हैं UGC के नए नियम? सरल शब्दों में समझें, कॉलेज-यूनिवर्सिटीज में कैसे ख़त्म होगा धर्म,जाति-लैंगिक भेदभाव

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप तैयार ये नियम धार्मिक, नस्लीय, जातिगत, लिंग, जन्म स्थान या दिव्यांगता के आधार पर होने वाले किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकने पर विशेष रूप से केंद्रित हैं। खास तौर पर अनुसूचित जाति और जनजाति, सामाजिक-शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग तथा दिव्यांगजनों के हितों की रक्षा के लिए ये नियम एक मजबूत और व्यापक ढांचा प्रस्तुत करते हैं।
यूजीसी के नए नियमों का उद्देश्य धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान या दिव्यांगता के आधार पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और दिव्यांगजनों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करना है। साथ ही, संस्थान के सभी हितधारकों यानी छात्रों, संकाय सदस्यों, कर्मचारियों और प्रबंध समिति के सदस्यों के बीच पूर्ण समता और समावेशन को मजबूत करना भी इनका लक्ष्य है।
यूजीसी के नए नियमों का उद्देश्य धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान या दिव्यांगता के आधार पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और दिव्यांगजनों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करना है। साथ ही, संस्थान के सभी हितधारकों यानी छात्रों, संकाय सदस्यों, कर्मचारियों और प्रबंध समिति के सदस्यों के बीच पूर्ण समता और समावेशन को मजबूत करना भी इनका लक्ष्य है। एआई निर्मित सांकेतिक चित्र
Published on

नई दिल्ली- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव को जड़ से समाप्त करने और पूर्ण समता व समावेशन सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। 13 जनवरी को जारी अधिसूचना के माध्यम से यूजीसी ने 'विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु) नियम, 2026' को मंजूरी प्रदान की है। ये नियम 2012 के पुराने नियमों के स्थान पर लागू होंगे और भारत के सभी उच्च शिक्षा संस्थानों (एचईआई) पर बाध्यकारी रूप से अमल में लाए जाएंगे।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप तैयार ये नियम धार्मिक, नस्लीय, जातिगत, लिंग, जन्म स्थान या दिव्यांगता के आधार पर होने वाले किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकने पर विशेष रूप से केंद्रित हैं। खास तौर पर अनुसूचित जाति और जनजाति, सामाजिक-शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग तथा दिव्यांगजनों के हितों की रक्षा के लिए ये नियम एक मजबूत और व्यापक ढांचा प्रस्तुत करते हैं। ये नियम न केवल उच्च शिक्षा में समान अवसरों को बढ़ावा देंगे, बल्कि संस्थानों को पूरी तरह जवाबदेह भी बनाएंगे। राजपत्र में प्रकाशन के साथ ही ये नियम तत्काल प्रभावी हो चुके हैं।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त ताकीद के बाद बने हैं ये नियम

सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2025 में रोहित वेमुला और पायल ताडवी केस पर सुनवाई करते हुए यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमिशन (UGC) को निर्देश दिया कि वह उच्च शैक्षणिक संस्थानों में उत्पीड़न और भेदभाव रोकने के लिए नए विनियमों (regulations) को अंतिम रूप देते समय जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए सुरक्षा उपायों पर विचार करे।

जस्टिस सूर्यकांत और जॉयमल्या बागची की पीठ ने UGC को 8 सप्ताह (लगभग 2 महीने) के भीतर इन विनियमों को अंतिम रूप देने का आदेश दिया। शीर्ष अदालत 2019 में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो रोहित वेमुला और पायल ताडवी की माताओं ने दायर की थी। ये दोनों छात्र हाशिए के समुदायों से थे और जातिगत उत्पीड़न का सामना करने के बाद उन्होंने आत्महत्या कर ली थी। अपीलकर्ताओं की सहायक वकील दिशा वाडेकर ने 'द मूकनायक' को बताया कि "अदालत ने अपने आदेश में हमारे सभी सुझाव दर्ज किए और यूजीसी को आठ सप्ताह के भीतर उन्हें शामिल करते हुए 'इक्विटी इन हायर एजुकेशन रेगुलेशंस, 2025' को अधिसूचित करने का निर्देश दिया।"

उच्च शिक्षा में भेदभाव को कैसे करेंगे समाप्त?

यूजीसी के ये नए नियम उच्च शिक्षा संस्थानों को भेदभाव-मुक्त बनाने के लिए एक विस्तृत और स्पष्ट रोडमैप प्रदान करते हैं। प्रारंभिक खंड में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि यूजीसी का मूल उद्देश्य विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा के मानकों का समन्वय और निर्धारण करना है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुसार 'पूर्ण समता और समावेशन' को सभी शैक्षिक निर्णयों का आधार बनाया गया है, जिससे हर छात्र शिक्षा प्रणाली में अपनी पूरी क्षमता के साथ उन्नति कर सके। नियमों का संक्षिप्त शीर्षक 'विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु) नियम, 2026' है, जो भारत के सभी उच्च शिक्षा संस्थानों पर लागू होंगे और राजपत्र में प्रकाशन की तिथि से ही प्रभावी हो जाएंगे।

इनका मुख्य उद्देश्य धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान या दिव्यांगता के आधार पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और दिव्यांगजनों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करना है। साथ ही, संस्थान के सभी हितधारकों यानी छात्रों, संकाय सदस्यों, कर्मचारियों और प्रबंध समिति के सदस्यों के बीच पूर्ण समता और समावेशन को मजबूत करना भी इनका लक्ष्य है।

नियमों में लगभग 20 महत्वपूर्ण शब्दों की विस्तृत परिभाषाएं दी गई हैं, जो किसी भी प्रकार के भ्रम को दूर करती हैं। उदाहरण के लिए, 'भेदभाव' को धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान या दिव्यांगता के आधार पर किसी हितधारक के विरुद्ध होने वाले अनुचित, भेदभावपूर्ण या पक्षपातीपूर्ण व्यवहार के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसमें स्पष्ट या अंतर्निहित कोई भी कृत्य शामिल है जो शिक्षा में समान व्यवहार को प्रभावहीन बनाता हो। 'समता' का अर्थ सभी हितधारकों के लिए सभी वैध अधिकारों के प्रयोग में समान अवसर का क्षेत्र है।

हितधारक में छात्र, संकाय सदस्य, कर्मचारी और प्रबंध समिति के सदस्य (संस्थान प्रमुख सहित) शामिल हैं, जबकि उच्च शिक्षा संस्थान में विश्वविद्यालय, महाविद्यालय और डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी आती हैं।

'लिंग' में पुरुष, महिला और तृतीय लिंग का समावेश है। अन्य शब्द जैसे 'समता समिति', 'समता हेल्पलाइन', 'समान अवसर केंद्र' आदि की परिभाषाएं यूजीसी अधिनियम 1956 या सामान्य धाराओं अधिनियम 1897 से जुड़ी हुई हैं। हर उच्च शिक्षा संस्थान का कर्तव्य होगा कि वह भेदभाव का उन्मूलन करे, हितधारकों के बीच समता का संवर्धन करे और जाति, धर्म, भाषा, नृपेश्ठ्यता, लिंग या दिव्यांगता के भेदभाव के बिना हितों की रक्षा करे। कोई भी संस्थान भेदभाव की किसी भी रूप की अनुमति या उपेक्षा नहीं करेगा, और संस्थान प्रमुख इन नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करेगा, जिसमें उसके पास सभी आवश्यक शक्तियां होंगी।

यूजीसी के नए नियमों का उद्देश्य धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान या दिव्यांगता के आधार पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और दिव्यांगजनों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करना है। साथ ही, संस्थान के सभी हितधारकों यानी छात्रों, संकाय सदस्यों, कर्मचारियों और प्रबंध समिति के सदस्यों के बीच पूर्ण समता और समावेशन को मजबूत करना भी इनका लक्ष्य है।
सुप्रीम कोर्ट की ताकीद : कैंपस में जातिगत भेदभाव पर UGC को 8 हफ्ते में बनाने होंगे सख्त नियम!

भेदभाव रोकने का मजबूत हथियार होंगे समान अवसर केंद्र, कैसे काम करेगा?

नियमों का एक सबसे प्रमुख और प्रभावी हिस्सा 'समान अवसर केंद्र' (ईओसी) की अनिवार्य स्थापना है, जो पिछड़े और वंचित समूहों के लिए नीतियों तथा कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन पर सतत नजर रखेगा। हर उच्च शिक्षा संस्थान को एक ऐसा केंद्र स्थापित करना होगा, जो शैक्षिक, वित्तीय, सामाजिक और अन्य मामलों में मार्गदर्शन तथा परामर्श प्रदान करेगा और कैंपस में विविधता को बढ़ावा देगा। यदि किसी महाविद्यालय में कम से कम पांच संकाय सदस्य उपलब्ध न हों, तो संबद्ध विश्वविद्यालय का समान अवसर केंद्र ही उसके कार्य संभालेगा।

यह केंद्र सिविल सोसाइटी, स्थानीय मीडिया, पुलिस, जिला प्रशासन, इस क्षेत्र में कार्यरत गैर-सरकारी संगठनों, संकाय सदस्यों, कर्मचारियों और अभिभावकों के साथ समन्वय स्थापित करेगा। साथ ही, सामान्य रूप से इन नियमों के उद्देश्यों को प्राप्त करने और योग्य मामलों में कानूनी सहायता प्रदान करने के लिए जिला तथा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण से भी जुड़ेगा। संस्थान की कार्यकारी परिषद या प्रबंध समिति एक प्रोफेसर या वरिष्ठ संकाय सदस्य को केंद्र का समन्वयक नामित करेगी, जो वंचित सामाजिक समूहों के कल्याण में गहरी रुचि रखता हो। केंद्र में एक समता समिति का गठन संस्थान प्रमुख द्वारा किया जाएगा, जो केंद्र के कार्यों के प्रबंधन और भेदभाव संबंधी शिकायतों की जांच के लिए जिम्मेदार होगी। समता समिति की संरचना में संस्थान प्रमुख पदेन अध्यक्ष होंगे, तीन प्रोफेसर या वरिष्ठ संकाय सदस्य सदस्य के रूप में, एक गैर-शिक्षक कर्मचारी सदस्य के रूप में, दो सिविल सोसाइटी के अनुभवी प्रतिनिधि सदस्य के रूप में, और दो छात्र प्रतिनिधि शैक्षिक योग्यता, खेल उत्कृष्टता या सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों के प्रदर्शन के आधार पर विशेष आमंत्रित के रूप में शामिल होंगे।

समन्वयक सदस्य-सचिव की भूमिका निभाएगा। समिति में अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजन, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य होगा। सदस्यों का कार्यकाल दो वर्ष का तथा विशेष आमंत्रितों का एक वर्ष का होगा। समिति वर्ष में कम से कम दो बार बैठक करेगी, जिसमें कोरम चार सदस्य (अध्यक्ष सहित) होगा, लेकिन विशेष आमंत्रितों को छोड़कर। द्वि-वार्षिक बैठकों में पिछले छह माह में प्राप्त मामलों पर की गई कार्रवाई की समीक्षा होगी, जिसमें अन्य समितियों को भेजे गए मामले भी शामिल होंगे, जो यूजीसी के अन्य नियमों या लागू कानूनों के तहत गठित हों।

समान अवसर केंद्र के 12 प्रमुख कार्य निर्धारित किए गए हैं, जिनमें संस्थान में समुदाय को समग्र रूप से समता और समान अवसर सुनिश्चित करना, छात्रों, शिक्षण एवं गैर-शिक्षण कर्मचारियों के बीच समता का संवर्धन तथा भेदभाव की धारणा का उन्मूलन, विविध सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के लिए अनुकूल सामाजिक वातावरण का निर्माण, हितधारकों को सामाजिक समावेशन के प्रति संवेदनशील बनाना, वंचित वर्ग के व्यक्तियों या छात्र समूहों की सहायता, भेदभाव की सूचना देने वाले को प्रतिशोध से बचाव, कल्याण योजनाओं एवं अधिसूचनाओं का प्रसार, भेदभाव माने जाने वाले कृत्यों की उदाहरणात्मक सूची तैयार करना, वंचित समूहों के छात्रों के प्रवेश के लिए समावेशी प्रक्रियाएं बनाना, संसाधन जुटाने के लिए सरकार एवं अन्य एजेंसियों से समन्वय, भेदभाव की रिपोर्टिंग के लिए ऑनलाइन पोर्टल का रखरखाव तथा समता संवर्धन के लिए अन्य आवश्यक कार्य शामिल हैं।

इसके अलावा, कैंपस में निगरानी और भेदभाव रोकथाम के लिए 'समता दस्ते' (Equity Squads) नामक छोटी इकाइयों का गठन होगा, जो आवश्यक प्रतिनिधित्व के साथ संवेदनशील स्थानों पर गश्त करेंगी और रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगी। प्रत्येक इकाई, विभाग, संकाय, छात्रावास, पुस्तकालय या सुविधा में कम से कम एक हितधारक को 'समता दूत' नामित किया जाएगा, जो कैंपस में समता का प्रतीक बनेगा, केंद्र के कार्यक्रमों का नोडल अधिकारी होगा और किसी भी उल्लंघन की तत्काल सूचना देगा। केंद्र प्रत्येक वर्ष जनवरी और जुलाई के अंत तक अपनी गतिविधियों की द्वि-वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित करेगा, जिसमें छात्रों एवं कर्मचारियों की जनसांख्यिकीय संरचना, पिछले शैक्षिक वर्ष की ड्रॉपआउट दर, प्राप्त शिकायतें एवं उनकी स्थिति शामिल होगी, जो संस्थान की वेबसाइट पर उपलब्ध होगी।

समता हेल्पलाइन: 24x7 सहारा, भेदभाव की शिकायतों का त्वरित समाधान

उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव की घटनाओं से निपटने के लिए एक और महत्वपूर्ण प्रावधान 'समता हेल्पलाइन' की स्थापना है, जो हर संस्थान द्वारा अनिवार्य रूप से स्थापित और संचालित की जाएगी तथा 24 घंटे कार्यरत रहेगी। यदि किसी महाविद्यालय की हेल्पलाइन किसी कारणवश कार्यरत न हो, तो संबद्ध विश्वविद्यालय की हेल्पलाइन उसके हितधारकों के लिए सुलभ होगी। यह हेल्पलाइन भेदभाव संबंधी किसी भी घटना से संकट में फंसे किसी भी हितधारक के लिए आसानी से उपलब्ध होगी। सूचना देने वाले व्यक्ति के अनुरोध पर उसकी पहचान पूरी गोपनीयता के साथ रखी जाएगी। यदि हेल्पलाइन पर प्राप्त सूचना से प्रथम दृष्टया कोई दंडनीय अपराध प्रतीत होता है, तो उसे तत्काल संबंधित पुलिस प्राधिकारियों को फॉरवर्ड कर दिया जाएगा।

छात्र, फैकल्टी और स्टाफ देंगे वचन- भेदभाव नहीं करेंगे

समता की रक्षा के लिए उच्च शिक्षा संस्थानों को कई ठोस उपाय अपनाने के निर्देश दिए गए हैं। प्रवेश या नवीनीकरण के समय सभी छात्र, संकाय सदस्य और कर्मचारी एक घोषणा-पत्र प्रस्तुत करेंगे, जिसमें वे समता का संवर्धन करने और किसी भी रूप के भेदभाव में संलिप्त न होने का वचन देंगे। इन नियमों और समता हेल्पलाइन की पूरी जानकारी संस्थान की वेबसाइट पर प्रमुखता से उपलब्ध होगी।

प्रत्येक शैक्षिक सत्र की शुरुआत में संस्थान प्रमुख छात्रावास अधीक्षकों, छात्रों, अभिभावकों/संरक्षकों, संकाय सदस्यों, कर्मचारियों, जिला प्रशासन और पुलिस के साथ एक बैठक आयोजित करेगा, जो ओरिएंटेशन कार्यक्रम का हिस्सा होगी, ताकि हितधारकों के बीच समता बढ़ाने के उपायों पर चर्चा हो सके और इन नियमों के बारे में जागरूकता फैलाई जा सके। इस बैठक का वीडियो संस्थान की वेबसाइट पर अपलोड किया जाएगा। छात्रावासों, कक्षाओं, मेंटरशिप समूहों या अन्य शैक्षिक उद्देश्यों के लिए कोई भी चयन, अलगाव या आवंटन पारदर्शी, निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण होगा।

समता को बढ़ावा देने के लिए कैंपस के उचित स्थानों पर पोस्टर प्रमुखता से प्रदर्शित होंगे और कार्यशालाएं, कार्यक्रम आदि का आयोजन होगा। छात्रों, संकाय सदस्यों और कर्मचारियों के परामर्श के लिए पेशेवर काउंसलरों की सेवाएं ली जाएंगी या सहायता प्राप्त की जाएगी। यूजीसी द्वारा समय-समय पर जारी विभिन्न दिशानिर्देश, जैसे सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समूहों (एसईडीजी) के लिए उच्च शिक्षा संस्थानों में समान अवसर प्रदान करने वाले दिशानिर्देश, का कड़ाई से पालन किया जाएगा। किसी भी भेदभाव की घटना के पीड़ित या साक्षी, चाहे वह छात्र, संकाय सदस्य या कर्मचारी ही क्यों न हो, को ऐसी घटनाओं की रिपोर्टिंग के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा, और सूचना देने वाले के अनुरोध पर उनकी पहचान गोपनीय रखी जाएगी तथा प्रतिशोध या उत्पीड़न से आवश्यक सुरक्षा प्रदान की जाएगी।

भेदभाव की रिपोर्ट पर होगी त्वरित जांच-कार्रवाई

भेदभाव की किसी भी घटना की शिकायत पर एक स्पष्ट और त्वरित प्रक्रिया निर्धारित की गई है। कोई भी पीड़ित व्यक्ति घटना की सूचना ऑनलाइन पोर्टल पर, लिखित रूप में या समान अवसर केंद्र के समन्वयक को ईमेल भेजकर दे सकता है, और अनुरोध पर उसकी पहचान गोपनीय रखी जाएगी। इसके अलावा, समता हेल्पलाइन पर भी शिकायत दर्ज करने का विकल्प उपलब्ध होगा। समता समिति को सूचना मिलते ही 24 घंटों के भीतर बैठक कर उचित कार्रवाई की जाएगी।

यदि आवश्यक हो, तो मामले को यूजीसी के अन्य नियमों या लागू कानूनों के तहत गठित किसी अन्य समिति को भेजा जा सकता है, यदि वह समिति मामले को बेहतर ढंग से निपटा सके या पहले से ही जांच में हो। समता समिति 15 कार्य दिवसों के भीतर अपनी रिपोर्ट संस्थान प्रमुख को प्रस्तुत करेगी, और इसकी एक प्रति शिकायतकर्ता को भी भेजी जाएगी। रिपोर्ट प्राप्त होने पर संस्थान प्रमुख सात कार्य दिवसों के भीतर संस्थान के नियमों के अनुसार आगे की कार्रवाई आरंभ करेगा, लेकिन यदि दंडनीय अपराध प्रतीत होता है, तो पुलिस को तत्काल सूचित किया जाएगा। यदि शिकायत संस्थान प्रमुख के विरुद्ध हो, तो समता समिति की बैठक समन्वयक की अध्यक्षता में होगी और रिपोर्ट प्रमुख के उच्चतर प्राधिकारी को अग्रेषित की जाएगी।

समता समिति की रिपोर्ट से असंतुष्ट कोई भी व्यक्ति 30 दिनों के भीतर लोकपाल के समक्ष अपील कर सकता है, जो यूजीसी (छात्रों की शिकायतों का निवारण) नियम, 2023 के तहत नियुक्त होता है। लोकपाल अपील की सुनवाई सुगम बनाने के लिए एमिकस क्यूरी नियुक्त कर सकता है, जिसका उचित शुल्क संस्थान द्वारा वहन किया जाएगा। लोकपाल सभी प्रयास करेगा कि अपील 30 दिनों के भीतर निपटाई जाए। निगरानी के लिए यूजीसी एक तंत्र स्थापित करेगा, जिसमें संस्थानों से सूचना मांगना, कैंपस दौरा आदि शामिल होंगे। इस समीक्षा के आधार पर यूजीसी संस्थानों को समता के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सलाह देगा, जिसका पालन अनिवार्य होगा। यूजीसी एक राष्ट्रीय स्तर की निगरानी समिति का गठन करेगा, जिसमें वैधानिक पेशेवर परिषदों, आयोगों और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधि होंगे। यह समिति नियमों के क्रियान्वयन की निगरानी करेगी, भेदभाव के मुद्दों पर विचार करेगी और रोकथाम के साधन सुझाएगी, तथा वर्ष में कम से कम दो बार बैठक करेगी। हर संस्थान अपने समान अवसर केंद्र के कार्यों पर वार्षिक रिपोर्ट जनवरी के अंत तक यूजीसी, संबंधित वैधानिक परिषदों या आयोगों, राज्य उच्च शिक्षा विभाग या निदेशालय तथा संबद्ध विश्वविद्यालय को प्रस्तुत करेगा।

यूजीसी के नए नियमों का उद्देश्य धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान या दिव्यांगता के आधार पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और दिव्यांगजनों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करना है। साथ ही, संस्थान के सभी हितधारकों यानी छात्रों, संकाय सदस्यों, कर्मचारियों और प्रबंध समिति के सदस्यों के बीच पूर्ण समता और समावेशन को मजबूत करना भी इनका लक्ष्य है।
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की एग्जीक्यूटिव कौंसिल में SC-ST के प्रतिनिधि नहीं : संसदीय समिति ने लगाई जोरदार फटकार!

अनुपालन न करने पर सजा, यूजीसी की कड़ी चेतावनी

यदि कोई उच्च शिक्षा संस्थान इन नियमों के किसी भी प्रावधान का अनुपालन न करे, तो यूजीसी एक जांच समिति गठित करेगा। यदि अनुपालन न करने की पुष्टि हो जाती है, तो संस्थान पर कड़ी कार्रवाई होगी, जिसमें यूजीसी योजनाओं में भागीदारी से वंचित करना, डिग्री कार्यक्रम चलाने से रोकना, मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षा (ओडीएल) तथा ऑनलाइन कार्यक्रमों से वंचित करना, तथा यूजीसी अधिनियम 1956 की धारा 2(फ) और 12बी के तहत रखी गई सूची से हटाना शामिल है। एक से अधिक कार्रवाइयां संभव हैं, और मामले की प्रकृति के अनुसार अतिरिक्त दंडात्मक कदम भी उठाए जा सकते हैं।

ये नए नियम उच्च शिक्षा में समता को एक मजबूत और स्थायी आधार प्रदान करेंगे। समान अवसर केंद्र और समता हेल्पलाइन जैसे तंत्र त्वरित जांच और कार्रवाई सुनिश्चित करेंगे, जबकि सख्त निगरानी तथा दंड व्यवस्था संस्थानों को पूरी तरह जवाबदेह बनाएगी। विशेष रूप से ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों के छात्रों को इसका अपार लाभ मिलेगा, जिससे ड्रॉपआउट दर में कमी आएगी और विविधता बढ़ेगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप ये कदम शिक्षा को वास्तविक रूप से समावेशी बनाएंगे, जहां हर छात्र बिना किसी भेदभाव के अपनी क्षमता का पूर्ण उपयोग कर सके।

Attachment
PDF
1881254_UGC-Promotion-of-Equity-in-HEIs-Regulations-2026
Preview
यूजीसी के नए नियमों का उद्देश्य धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान या दिव्यांगता के आधार पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और दिव्यांगजनों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करना है। साथ ही, संस्थान के सभी हितधारकों यानी छात्रों, संकाय सदस्यों, कर्मचारियों और प्रबंध समिति के सदस्यों के बीच पूर्ण समता और समावेशन को मजबूत करना भी इनका लक्ष्य है।
जामिया में विवाद: मुस्लिम अत्याचार पर सवाल पूछने वाले दलित प्रोफेसर के सस्पेंशन से छात्र उखड़े, सिग्नेचर कैंपेन चलाएंगे!
यूजीसी के नए नियमों का उद्देश्य धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान या दिव्यांगता के आधार पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और दिव्यांगजनों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करना है। साथ ही, संस्थान के सभी हितधारकों यानी छात्रों, संकाय सदस्यों, कर्मचारियों और प्रबंध समिति के सदस्यों के बीच पूर्ण समता और समावेशन को मजबूत करना भी इनका लक्ष्य है।
'काली लड़की डॉक्टर बनेगी?': बेंगलुरु की 23 वर्षीय डेंटल छात्रा के सुसाइड ने खोली समाज में रंगभेद की बदरंग तस्वीर!
यूजीसी के नए नियमों का उद्देश्य धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान या दिव्यांगता के आधार पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और दिव्यांगजनों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करना है। साथ ही, संस्थान के सभी हितधारकों यानी छात्रों, संकाय सदस्यों, कर्मचारियों और प्रबंध समिति के सदस्यों के बीच पूर्ण समता और समावेशन को मजबूत करना भी इनका लक्ष्य है।
तमिलनाडु में दलित म्यूजिक स्टूडेंट पर जातिगत जुल्म: "सरकारी नौकरी चाहिए तो संगीत भूल जाओ, वो करो जो तुम्हारी जाति..."

द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.

The Mooknayak - आवाज़ आपकी
www.themooknayak.com