जंतर मंतर प्रदर्शनकारियों को गोली मारने और "रेप में मजा..." जैसे घटिया बयान देने वाले टीजी मोहनदास को कैसे मिली जमानत? जानिए कोर्ट ने क्या कहा | TM Analysis

गिरफ्तारी की प्रक्रिया पर कोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल; उम्र और सेहत का रखा ध्यान
मोहनदास ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों को गोली मारने की बात की और कहा कि प्रदर्शन में शामिल कुछ लड़कियों को बलात्कार पसंद है और ऐसी घटना होने पर वे शिकायत भी नहीं करेंगी।
मोहनदास ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों को गोली मारने की बात की और कहा कि प्रदर्शन में शामिल कुछ लड़कियों को बलात्कार पसंद है और ऐसी घटना होने पर वे शिकायत भी नहीं करेंगी।
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तिरुवनंतपुरम- दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों को गोली मारने और महिला प्रदर्शनकारियों को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोपों में गिरफ्तार किए गए टीजी मोहनदास को तिरुवनंतपुरम के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) की अदालत ने जमानत दे दी। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मिथुन गोपी जीएस ने अपने आदेश में कहा कि मामले में उनकी गिरफ्तारी से पहले BNSS की धारा 35(3) के तहत नोटिस जारी न करने के लिए जांच एजेंसी की ओर से दिए गए कारण पर्याप्त नहीं थे। अदालत ने यह भी माना कि उपलब्ध परिस्थितियों में आरोपी को आगे न्यायिक हिरासत में रखना जरूरी नहीं है।

अदालत ने ₹50,000 के बॉन्ड और इतनी ही राशि के दो जमानतदारों की शर्त पर उन्हें रिहा करने का आदेश दिया। उन्हें 12 और 13 अगस्त को सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे के बीच जांच अधिकारी के सामने पूछताछ के लिए उपस्थिति, इसके बाद दो महीने तक या अंतिम रिपोर्ट दाखिल होने तक प्रत्येक सोमवार शाम 5 से 6 बजे के बीच जांच अधिकारी के सामने पेश होना होगा।

अदालत ने उन्हें सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का सामान्य पत्रकारिता संबंधी इस्तेमाल करने की अनुमति दी है। हालांकि आदेश में स्पष्ट किया गया है कि वह संबंधित घटना के बारे में ऐसी सामग्री प्रकाशित, प्रसारित या साझा नहीं कर सकते जिसका उद्देश्य पीड़ित या किसी गवाह को प्रभावित, डराना, परेशान या नुकसान पहुंचाना अथवा जांच या न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना हो। शर्तों के उल्लंघन की स्थिति में अभियोजन जमानत रद्द करने की मांग कर सकता है।

मामला तिरुवनंतपुरम सिटी साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन के Crime No. 95/2026 से जुड़ा है। मोहनदास पर IT Act की धारा 66, केरल पुलिस एक्ट की धारा 120(o) तथा BNS की धाराओं 79, 192, 353(1)(b) और 351(3) के तहत आरोप लगाए गए हैं। अभियोजन के अनुसार, उन्होंने 24 और 25 जुलाई को यूट्यूब चैनल 'पत्रिका'  पर ऐसे वीडियो अपलोड किए जिनमें जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे कार्यकर्ताओं में भय और चिंता पैदा करने तथा सार्वजनिक शांति भंग करने वाली बातें कही गईं। अभियोजन का आरोप है कि इन वीडियो में महिला प्रदर्शनकारियों की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली टिप्पणियां भी थीं और छात्रों को गोली मारने की बात कही गई थी।

मोहनदास ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों को गोली मारने की बात की और कहा कि प्रदर्शन में शामिल कुछ लड़कियों को बलात्कार पसंद है और ऐसी घटना होने पर वे शिकायत भी नहीं करेंगी।
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गिरफ्तारी से पहले नोटिस क्यों नहीं दिया गया?

जमानत पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के Satender Kumar Antil v. Central Bureau of Investigation फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सात साल तक की सजा वाले अपराधों में BNSS की धारा 35(3) के तहत नोटिस देना सामान्य नियम है और गिरफ्तारी अपवाद। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि मोहनदास को ऐसा कोई नोटिस नहीं दिया गया था।

अभियोजन ने इसके जवाब में कहा कि यदि नोटिस दिया जाता तो आरोपी के फरार होने, डिजिटल साक्ष्य नष्ट करने और शिकायतकर्ता को प्रभावित करने की आशंका थी। लेकिन अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने पाया कि पुलिस आरोपी के ज्ञात आवास तक पहुंची थी, वहां तलाशी ली गई थी और कथित डिजिटल साक्ष्य भी बरामद किए गए थे।

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “सामग्री से ऐसी कोई विशिष्ट परिस्थिति सामने नहीं आती जिससे यह संकेत मिले कि आरोपी जांच से बचने का प्रयास कर रहा था या उसके फरार होने की संभावना थी।” कोर्ट ने यह भी कहा कि जिस व्यक्ति को पुलिस उसके ज्ञात पते पर खोज चुकी हो और जिसके घर में तलाशी भी ली जा चुकी हो, उसके फरार होने की आशंका के आधार पर धारा 35(3) का नोटिस न देना परिस्थितियों के अनुरूप नहीं है।

डिजिटल साक्ष्य नष्ट करने की आशंका पर भी कोर्ट की टिप्पणी

जांच एजेंसी ने यह आशंका भी जताई थी कि मोहनदास डिजिटल साक्ष्यों को नष्ट या उनसे छेड़छाड़ कर सकते हैं। इस पर अदालत ने कहा कि रिमांड रिपोर्ट में ऐसी कोई “विशिष्ट या ठोस परिस्थिति” नहीं बताई गई है जिससे यह साबित हो कि डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित करने के लिए तत्काल गिरफ्तारी जरूरी थी। कोर्ट के मुताबिक पुलिस आरोपी के आवास की पहचान कर चुकी थी और संबंधित सामग्री को सुरक्षित करने की स्थिति में थी।

अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, “साक्ष्य के नष्ट होने, उससे छेड़छाड़ या उसमें हेरफेर की महज आशंका, ऐसी परिस्थितियों के अभाव में जो तत्काल गिरफ्तारी की आवश्यकता दर्शाती हों, अपने आप मे BNSS की धारा 35(3) में दिए गए वैधानिक सुरक्षा उपाय को हटाने का आधार नहीं हो सकती।”

इसके बाद कोर्ट ने निष्कर्ष दिया कि “धारा 35(3) के तहत नोटिस जारी न करने के लिए बताए गए आधार पर्याप्त नहीं थे” और जांच एजेंसी नोटिस जारी न करने को संतोषजनक तरीके से उचित नहीं ठहरा सकी।

अभियोजन ने दलील दी कि जांच अभी शुरुआती चरण में है, कुछ गवाहों के बयान बाकी हैं, अन्य आरोपियों की भूमिका की जांच होनी है और  यूट्यूब चैनल 'पत्रिका'  के मालिक की पहचान भी की जानी बाकी है। इसलिए मोहनदास की कस्टोडियल इंटरोगेशन जरूरी है।

हालांकि अदालत ने इस दलील पर भी असहमति जताई। ACJM ने कहा, “यह अदालत यह समझ पाने में असमर्थ है कि अभियोजन द्वारा बताए गए किसी भी उद्देश्य के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ क्यों आवश्यक है।” कोर्ट ने आगे कहा कि सिर्फ यह कहना कि जांच शुरुआती चरण में है, कुछ गवाहों से पूछताछ बाकी है या यूट्यूब चैनल के मालिक की पहचान की जानी है, आरोपी को न्यायिक हिरासत में रखने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।

बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि कथित अपराध से जुड़े Vivo मोबाइल फोन, Seagate हार्ड डिस्क, DBC मॉडेम और JTP माइक्रोफोन आरोपी के घर की तलाशी के दौरान बरामद कर लिए गए हैं और उन्हें जब्ती के बाद अदालत के समक्ष पेश किया जा चुका है।

अदालत ने रिमांड रिपोर्ट के आधार पर पाया कि आरोपी से पुलिस पूछताछ कर चुकी थी और तलाशी तथा जब्ती की कार्रवाई भी पूरी हो चुकी थी। इसलिए अभियोजन यह दिखाने में पर्याप्त आधार नहीं दे पाया कि आगे भी कस्टोडियल इंटरोगेशन जरूरी है।

अदालत ने आदेश में कानून के पालन को लेकर बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा, “यह अदालत इस तथ्य से आंखें नहीं मूंद सकती कि मामला माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुपालन से जुड़ा है।” अदालत ने आगे कहा कि “किसी भी कार्यवाही को कानून की स्थापित स्थिति के विपरीत तरीके से जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि ऐसा करना पुलिस अधिकारियों को कानून की प्रक्रिया से हटकर कार्य करने की अनुमति देने और कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग के समान होगा।”

उम्र और स्वास्थ्य को भी कोर्ट ने माना महत्वपूर्ण

मोहनदास की ओर से अदालत को बताया गया कि वह 71 वर्ष के हैं, पेशे से वकील, राजनीतिक बहसकर्ता और वरिष्ठ पत्रकार हैं। बचाव पक्ष ने उनके पूर्व स्ट्रोक, सोरायसिस और शुरुआती चरण के पार्किंसन जैसी स्वास्थ्य समस्याओं का भी उल्लेख किया। अभियोजन की ओर से इन स्वास्थ्य संबंधी दलीलों को खारिज करने के लिए कोई विशेष सामग्री प्रस्तुत नहीं की गई।

अदालत ने अंततः कहा कि फरार होने, गवाहों को प्रभावित करने या जांच में हस्तक्षेप करने की अभियोजन की आशंकाओं को कड़ी जमानत शर्तों के जरिए नियंत्रित किया जा सकता है। “आरोपी को आगे न्यायिक हिरासत में रखना इस स्तर पर आवश्यक नहीं है।” कोर्ट ने यह निष्कर्ष नोटिस जारी न किए जाने, सामान की बरामदगी, पुलिस जांच में आरोपी के सहयोग तथा उसकी उम्र और स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए दिया।

टीजी मोहनदास ने जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारियों के बारे में क्या कहा था?

मोहनदास ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों को गोली मारने की बात कही और महिलाओं के बारे में उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली टिप्पणियां कीं।

मोहनदास ने कहा था कि यदि जंतर-मंतर के प्रदर्शन को संभालने की जिम्मेदारी उनके पास होती तो वह करीब चार वर्ग किलोमीटर के इलाके में कर्फ्यू लगाते, प्रदर्शनकारियों को तीन बार हटने की चेतावनी देते और इसके बाद गोली चलाने का आदेश देते। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि लोग भागेंगे, कुछ लोग मारे जाएंगे और कुछ घायल होंगे तथा कुछ घंटों में स्थिति शांत हो जाएगी, जिसके बाद शवों को अस्पताल ले जाया जाएगा।

इसी वीडियो/वीडियो श्रृंखला में महिला प्रदर्शनकारियों को लेकर भी बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी सामने आई थी। उन्होंने यह दावा किया कि प्रदर्शन में शामिल कुछ लड़कियों को बलात्कार पसंद है और ऐसी घटना होने पर वे शिकायत भी नहीं करेंगी।

इन टिप्पणियों के बाद छात्र संगठनों ने कार्रवाई की मांग की और केरल पुलिस ने मामला दर्ज किया। बाद में RSS ने भी मोहनदास के बयान से दूरी बनाते हुए कहा कि वे संगठन के किसी स्तर पर पदाधिकारी नहीं हैं और उनकी टिप्पणियां उनके “व्यक्तिगत विचार” हैं, जिनकी कड़ी निंदा की जानी चाहिए।

मोहनदास ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों को गोली मारने की बात की और कहा कि प्रदर्शन में शामिल कुछ लड़कियों को बलात्कार पसंद है और ऐसी घटना होने पर वे शिकायत भी नहीं करेंगी।
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आपत्तिजनक टिप्पणियों के मामलों में जमानत का न्यायिक रुख

टीजी मोहनदास मामले में तिरुवनंतपुरम ACJM का आदेश यह संकेत देता है कि जमानत का सवाल कथित बयान की स्वीकार्यता से अलग, गिरफ्तारी की वैधानिक आवश्यकता और जांच की वास्तविक जरूरत पर भी निर्भर करता है। केरल हाईकोर्ट के अधिवक्ता आदित्य कहते हैं, "कोर्ट ने कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों की मेरिट पर अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया, बल्कि पाया कि पुलिस ने BNSS की धारा 35(3) का नोटिस दिए बिना गिरफ्तारी की और फरार होने, डिजिटल साक्ष्य नष्ट करने या शिकायतकर्ता को प्रभावित करने की आशंकाओं के समर्थन में पर्याप्त ठोस सामग्री नहीं रखी। साथ ही, डिजिटल उपकरण पहले ही जब्त हो चुके थे और आरोपी से पूछताछ भी हो चुकी थी।"

यह दृष्टिकोण पूरी तरह असाधारण भी नहीं है। केरल हाईकोर्ट ने जनवरी 2025 में अभिनेता हनी रोज के खिलाफ कथित अश्लील/दोअर्थी टिप्पणियों के मामले में व्यवसायी बॉबी चेम्मनूर को जमानत देते हुए एक ओर कहा था कि “हमारे समाज में बॉडी शेमिंग स्वीकार्य नहीं है ”और प्रथम दृष्टया आरोपों में अपराध के तत्व मौजूद हैं, लेकिन दूसरी ओर “ज़मानत नियम है और जेल अपवाद है” के सिद्धांत के आधार पर जमानत दी।

इसी तरह, 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अशोक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद को महिला सैन्य अधिकारियों पर उनकी सोशल मीडिया टिप्पणियों से जुड़े मामले में जमानत दी, हालांकि अदालत ने सोशल मीडिया और मामले पर सार्वजनिक टिप्पणी को लेकर प्रतिबंध लगाए।

2026 में राजस्थान हाईकोर्ट ने एक आरोपी को महिला की गरिमा/यौन उत्पीड़न और साइबर-स्टॉकिंग से जुड़े मामले में जमानत देते हुए एक साल तक सोशल मीडिया इस्तेमाल करने पर रोक लगाई- यह दिखाता है कि अदालतें कई बार जमानत से इनकार करने के बजाय कठोर शर्तों के जरिए पीड़ित, गवाह और जांच की सुरक्षा का रास्ता अपनाती हैं।

इस संदर्भ में मोहनदास का आदेश महत्वपूर्ण है क्योंकि कोर्ट ने उन्हें सोशल मीडिया के सामान्य पत्रकारिता उपयोग की अनुमति दी, लेकिन संबंधित घटना के बारे में ऐसी सामग्री प्रकाशित या प्रसारित करने से रोका जो पीड़ित/गवाह को प्रभावित करे या जांच और न्याय-प्रक्रिया में हस्तक्षेप करे; उल्लंघन पर जमानत रद्द करने का रास्ता खुला रखा गया है।

अदालत का जमानत देना कथित टिप्पणियों को सही ठहराना नहीं है; बल्कि यह फैसला मुख्यतः इस सवाल पर है कि क्या आरोपी को हिरासत में रखना जांच के लिए आवश्यक था और क्या गिरफ्तारी कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार हुई थी। मोहनदास मामले में कोर्ट का जवाब दोनों प्रश्नों पर अभियोजन के खिलाफ गया।

मोहनदास ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों को गोली मारने की बात की और कहा कि प्रदर्शन में शामिल कुछ लड़कियों को बलात्कार पसंद है और ऐसी घटना होने पर वे शिकायत भी नहीं करेंगी।
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