
नई दिल्ली/तिरुवनंतपुरम- आरएसएस से जुड़े रहे विचारक और भाजपा के पूर्व इंटेलेक्चुअल सेल संयोजक टीजी मोहनदास अपने एक लंबे यूट्यूब वीडियो में दिए गए बयानों को लेकर विवादों में घिर गए हैं। करीब 31 मिनट के इस वीडियो के कई छोटे-छोटे क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद उनके खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। हालांकि मोहनदास का कहना है कि उनके बयान व्यंग्यात्मक और काल्पनिक थे तथा उन्हें संदर्भ से काटकर पेश किया गया।
वायरल वीडियो में मोहनदास ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के संदर्भ में कहा कि यदि उनके पास अधिकार होता तो वे चार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में कर्फ्यू लगा देते, भीड़ को तीन बार हटने की चेतावनी देते और उसके बाद पुलिस फायरिंग का आदेश देते। उन्होंने कहा कि "कुछ लोग मर जाते, कुछ बच जाते, कुछ अपंग हो जाते। चार घंटे में स्थिति नियंत्रण में आ जाती और शवों को अस्पताल भेज दिया जाता।" इसी बयान के बाद सबसे बड़ा विवाद खड़ा हुआ।
इन विवादित बयानों के सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद विभिन्न छात्र और राजनीतिक संगठनों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। ऑल इंडिया यूथ फेडरेशन (AIYF) के लीडर्स टी.टी. जिस्मन, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF), और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) के महासचिव वी.एम. अलियार समेत कई नेताओं ने केरल के राज्य पुलिस प्रमुख और गृह मंत्री के समक्ष आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग की। शिकायतों का संज्ञान लेते हुए केरल गृह विभाग ने मामले की जांच साइबर सेल के आईजी पी. प्रकाश को सौंपी है। शिकायतों में कहा गया कि मोहनदास के बयान शांतिपूर्ण और संवैधानिक लोकतांत्रिक प्रदर्शनों पर सीधा हमला हैं तथा ये हिंसा भड़काने, भय फैलाने और अराजकता को बढ़ावा देने वाले हैं।
वीडियो के शुरुआती हिस्से में मोहनदास छात्र आंदोलनों के दौरान पुलिस कार्रवाई का बचाव करते हैं। उनका कहना है कि केवल छात्र होने के कारण किसी को कानून से छूट नहीं मिल सकती।
उन्होंने सवाल किया कि क्या भारतीय दंड कानून (BNS) में छात्रों को अपराध करने की छूट दी गई है? उनका कहना था कि यदि छात्र हिंसा, तोड़फोड़ या पुलिस पर हमला करते हैं तो उन्हें पीटा जाना चाहिए, गिरफ्तार किया जाना चाहिए और कानून के अनुसार मुकदमा चलना चाहिए।
उन्होंने कहा कि वे स्वयं छात्र आंदोलनों का हिस्सा रहे हैं और जेल भी जा चुके हैं, लेकिन उन्होंने कभी हिंसक गतिविधियों में हिस्सा नहीं लिया। उनके अनुसार शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हिंसक आंदोलन में फर्क किया जाना चाहिए।
मोहनदास ने वीडियो में वरिष्ठ वकीलों और अदालतों की कार्यवाही पर भी टिप्पणी की। उन्होंने पुलिस अधिकारियों की पहचान सार्वजनिक करने की मांग पर सवाल उठाते हुए कहा कि कानून के शासन (Rule of Law) का पालन होना चाहिए और अदालतें किसी पुलिस अधिकारी को सीधे कटघरे में खड़ा नहीं कर सकतीं।
उन्होंने कुछ समाचार चैनलों पर भी आरोप लगाया कि वे केवल चुनिंदा घटनाओं को दिखाते हैं, जबकि प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों पर हुए हमलों की अनदेखी करते हैं।
वायरल वीडियो में मोहनदास कहते दिखाई देते हैं कि यदि प्रशासन उनके हाथ में होता तो वे जंतर-मंतर के चार किलोमीटर के दायरे में कर्फ्यू लगा देते, प्रदर्शनकारियों को तीन बार तितर-बितर होने की चेतावनी देते और उसके बाद पुलिस फायरिंग का आदेश दे देते।
उन्होंने कहा:
"मैं जंतर-मंतर के चार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में कर्फ्यू लगा देता। भीड़ को तीन बार हटने की चेतावनी देता। फिर गोली चलवाता। कुछ लोग मर जाते, कुछ बच जाते, कुछ अपंग हो जाते। चार घंटे में स्थिति नियंत्रण में आ जाती। शवों को अस्पताल भेज दिया जाता।"
यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ और व्यापक आलोचना का कारण बना।
विवाद केवल फायरिंग वाले बयान तक सीमित नहीं रहा। उसी वीडियो के दूसरे हिस्से में मोहनदास ने "सामूहिक बलात्कार" का उल्लेख करते हुए दावा किया कि कुछ महिलाएं "रेप पसंद करती हैं"। उन्होंने यह टिप्पणी वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष समूहों की आलोचना करते हुए की। इस बयान को लेकर महिला संगठनों और विपक्षी नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और इसे महिलाओं के प्रति अपमानजनक तथा असंवेदनशील बताया।
वीडियो में उन्होंने छात्र आंदोलनों पर भी कहा कि यदि छात्र कानून तोड़ते हैं या हिंसा करते हैं तो पुलिस द्वारा उन्हें पीटना और जेल भेजना गलत नहीं है। उनका तर्क था कि कानून छात्रों के लिए अलग नहीं होता और हिंसक गतिविधियों में शामिल किसी भी व्यक्ति पर कार्रवाई होनी चाहिए।
मोहनदास ने वीडियो में युवा महिलाओं के कपड़ों और सोशल मीडिया रील्स पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कुछ लड़कियां शर्ट पहनती हैं और अंदर लो कट टी शर्ट होता है, कुछ जानबूझकर ऐसे कपड़े पहनती हैं जिनमें कैमरे का फोकस उनके शरीर पर जाता है। उन्होंने पर्यावरण और पशु अधिकार अभियानों में भाग लेने वाली महिलाओं का उदाहरण देते हुए भी ऐसी ही टिप्पणियां कीं। उन्होंने आगे कहा कि ऐसी लड़कियों को "एक थप्पड़ मारकर घर भेज देना चाहिए", क्योंकि उनके अनुसार इससे उनका भविष्य खराब हो रहा है। इन टिप्पणियों को सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से महिलाओं के प्रति अपमानजनक और स्त्री-विरोधी बताया गया।
टीजी मोहनदास भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पूर्व इंटेलेक्चुअल सेल के राज्य संयोजक रह चुके हैं। वह भारतीय विचार केंद्र के भी पूर्व पदाधिकारी रहे हैं, जिसे RSS के निकट माना जाता है। हालांकि विवाद के बाद केरल में RSS के वरिष्ठ प्रचारक एम. गणेशन ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में मोहनदास का संगठन से कोई आधिकारिक संबंध नहीं है।
विवाद बढ़ने के बाद RSS की दक्षिण केरल इकाई के सहकार्यवाह के.बी. श्रीकुमार ने मोहनदास के बयानों से संगठन को अलग करते हुए कहा कि हालिया प्रदर्शनों को लेकर की गई उनकी टिप्पणियां बेहद निंदनीय हैं। उन्होंने कहा, "ये उनके निजी विचार हैं। RSS इन टिप्पणियों या ऐसे विचारों से किसी भी तरह सहमत नहीं है।"
NDTV से बातचीत में टीजी मोहनदास ने कहा कि उन्होंने कभी भी प्रदर्शनकारियों पर वास्तविक गोली चलाने की वकालत नहीं की। उनके अनुसार पूरा विवाद इसलिए पैदा हुआ क्योंकि लोगों ने उनके 31 मिनट लंबे यूट्यूब कार्यक्रम को देखने के बजाय केवल एक से डेढ़ मिनट की क्लिप सोशल मीडिया पर साझा की।
उन्होंने कहा कि मलयालम भाषा के व्यंग्य, हास्य और मुहावरे अंग्रेज़ी में अनुवाद होने पर अपना मूल अर्थ खो देते हैं। इस कारण व्यंग्यात्मक या ट्रोलिंग के अंदाज़ में कही गई बातें शाब्दिक बयान की तरह प्रस्तुत कर दी गईं।
मोहनदास ने स्पष्ट किया कि फायरिंग संबंधी टिप्पणी पुलिस और प्रशासन द्वारा दंगों से निपटने की सामान्य प्रक्रिया का एक काल्पनिक उदाहरण थी। उनका कहना था कि दंगे की स्थिति में पहले कर्फ्यू लगाया जाता है, फिर बार-बार चेतावनी दी जाती है और केवल अंतिम विकल्प के रूप में बल प्रयोग किया जाता है। उनका दावा है कि वह इसी प्रक्रिया को समझाने के लिए काल्पनिक उदाहरण दे रहे थे, न कि वास्तविक रूप से गोली चलाने की मांग कर रहे थे।
उन्होंने यह भी कहा कि यह चर्चा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्णय लेने के तरीके पर थी। उनके अनुसार आम लोग भावनाओं में आकर कठोर कार्रवाई की मांग कर सकते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और व्यापक प्रशासनिक पहलुओं को ध्यान में रखकर निर्णय लेने पड़ते हैं।
मोहनदास की सफाई के बावजूद विवाद थमता नहीं दिख रहा है। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि चाहे बयान व्यंग्य के रूप में दिया गया हो या काल्पनिक उदाहरण के तौर पर, लोकतांत्रिक प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने और महिलाओं को लेकर की गई टिप्पणियां सार्वजनिक जीवन में स्वीकार्य नहीं मानी जा सकतीं। दूसरी ओर उनके समर्थकों का कहना है कि पूरे वीडियो को देखे बिना कुछ सेकंड की क्लिप के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
यह पूरा विवाद पिछले सप्ताह नई दिल्ली में हुए बड़े विरोध प्रदर्शन के बाद सामने आया। Cockroach Janta Party के नेतृत्व में हजारों प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर सहित देश के कई शहरों में एकत्र हुए थे। उनकी मांग थी कि NEET पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें।
20 जुलाई को दिल्ली में प्रदर्शन उस समय हिंसक हो गया जब बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों ने जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की। पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया, जिसके बाद झड़पें हुईं और कई लोगों को हिरासत में लिया गया।
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