कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही बीजेपी एमएलसी एन. रविकुमार को सांप्रदायिक टिप्पणी करने पर पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि कलबुर्गी की डिप्टी कमिश्नर फौजिया तरन्नुम को ‘पाकिस्तान’ से जोड़कर बोलना स्वीकार्य नहीं है। जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने मौखिक टिप्पणी में कहा, “…वे राज्य की आईएएस अधिकारी हैं… सिर्फ इसलिए कि वे मुस्लिम हैं, उन्हें ‘पाकिस्तान’ से जोड़ने वाला बयान मैं माफ नहीं करूंगा। मैं इसे बर्दाश्त नहीं करूंगा। वे कर्नाटक राज्य की आईएएस अधिकारी हैं। आपने कैसा बयान दिया है…”
रविकुमार ने बेंगलुरु की विशेष अदालत (एमपी/एमएलए मामलों के लिए) में अपने खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की याचिका दायर की थी। आरोप है कि उन्होंने ‘कलबुर्गी चलो’ मार्च के दौरान फौजिया तरन्नुम पर यह आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। यह विरोध प्रदर्शन मई 2025 में विधान परिषद के विपक्ष के नेता और बीजेपी नेता चलवाड़ी नारायणस्वामी के सरकारी गेस्ट हाउस में नौ घंटे कथित नजरबंदी के मुद्दे पर आयोजित किया गया था।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उन्होंने केवल यह कहा था कि ‘सभी पुलिस अधिकारी प्रभारी मंत्री के गुलाम हैं’। राज्य सरकार ने बताया कि कलबुर्गी प्रशासन ने राष्ट्रीय ध्वज लेकर विरोध प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी।
अदालत ने साफ कहा कि विरोध करने और यात्रा निकालने का अधिकार है, लेकिन धर्म के आधार पर आईएएस अधिकारी को निशाना बनाना गलत है। जस्टिस नागप्रसन्ना ने कहा, “…आप आईएएस अधिकारी को धर्म के आधार पर कैसे बांधते हैं… मैं यात्रा के सवाल पर नहीं हूं… निश्चित रूप से आपको विरोध का अधिकार है। आप यात्राएं निकाल सकते हैं। लेकिन ऐसे बयान नहीं दिए जा सकते…”
अदालत ने राजनीतिक नेताओं से संयम बरतने की अपील की। पीठ ने कहा कि दोनों पक्षों को एक-दूसरे के खिलाफ बोलने के बजाय जनता की भलाई के मुद्दों पर बात करनी चाहिए। “…दोनों को बंद कर देना चाहिए। लोगों की भलाई के लिए क्या करना है, उसके बारे में बोलो। एक-दूसरे के खिलाफ नहीं। कोई नीतियां नहीं बताता। कोई जलते हुए मुद्दों पर नहीं बोलता। लोग एक-दूसरे के गंदे कपड़े धोने में रुचि नहीं रखते। वे अपनी भलाई में रुचि रखते हैं…”
रविकुमार के वकील ने बताया कि घटना के तुरंत बाद आईएएस अधिकारी को माफी पत्र भेज दिया गया था। अदालत ने पूछा कि क्या माफी पत्र से दिया गया बयान मिट जाएगा। “…आपका माफी पत्र आपके बयान को मिटा देगा? गुण-दोष पर आप जवाब दे सकते हैं, लेकिन यह तरीका सही नहीं है…”
जब वकील ने तर्क दिया कि यह ‘तिरंगा यात्रा’ थी और प्रशासन ने राष्ट्रीय ध्वज लेकर जाने से रोका, तो अदालत ने कहा कि कोई भी राष्ट्रीय ध्वज लेकर जाने से नहीं रोक सकता। अगर प्रशासन ने रोका तो उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है, लेकिन आईएएस अधिकारी पर ऐसे बयान नहीं दिए जा सकते।
अदालत ने राज्य को विरोध प्रदर्शन के प्रतिनिधित्व (रिप्रेजेंटेशन) के रिकॉर्ड पेश करने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा कि अगर रिकॉर्ड में राष्ट्रीय ध्वज लेकर जाने का जिक्र है और प्रशासन ने रोका तो उस पर कार्रवाई की जाएगी, लेकिन एमएलसी को भी ऐसे बयान देने के लिए नहीं छोड़ा जाएगा।
एक स्थानीय निवासी की शिकायत पर रविकुमार के खिलाफ बीएनएस की धारा 196(1)(ए)(बी) और धारा 353(2) के तहत मामला दर्ज किया गया है। अदालत ने तुच्छ मामलों से अदालतों के जाम होने पर भी चिंता जताई। “…आपराधिक अदालतें ऐसे तुच्छ मामलों से भरी पड़ी हैं। क्यों? क्योंकि आप अपनी जुबान नहीं रोकते। हत्या, जबरन वसूली के मामले इसलिए लंबित हैं क्योंकि ये मामले अदालतों में भरे पड़े हैं…”
मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त को होगी। तब तक राज्य को विरोध प्रदर्शन से जुड़े रिकॉर्ड पेश करने होंगे।
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