
चेन्नई- तमिलनाडु में 23 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव के बीच राज्य की सियासत गरमा गई है। 15 मार्च से लागू आचार संहिता के बीच तीन महिलाओं ने सामने आकर सत्तारूढ़ द्रमुक (DMK) और उसकी आईटी विंग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। इन महिलाओं का कहना है कि पार्टी से जुड़े लोगों और सोशल मीडिया हैंडल्स ने उनके खिलाफ वर्षों तक व्यवस्थित रूप से ऑनलाइन अभद्रता, बदनामी, यौन उत्पीड़न की धमकियाँ और जान से मारने की धमकियाँ दीं। इन तीनों का आरोप है कि यह सब उन्हें चुप कराने के लिए किया गया क्योंकि वे महिला सुरक्षा, दलित अधिकारों और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाती थीं।
प्रमुख दलित नारीवादी लेखिका मीना कंडासामी, पूर्व पत्रकार और इन्फ़्लुएन्सर सोनिया अरुण कुमार और दलित अधिकार कार्यकर्ता तथा लेखिका शालिन मारिया लॉरेंस ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया है कि द्रमुक की आईटी विंग ने उन्हें निशाना बनाया। इन महिलाओं ने बताया कि जब-जब उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा, पुलिस की कार्रवाई, दलित अधिकारों या सरकार की जवाबदेही जैसे मुद्दे उठाए, तब-तब उन पर हमले तेज हो गए। अब आचार संहिता लागू होने के कारण उन्हें लग रहा है कि वे बिना किसी डर के अपनी बात रख सकती हैं।
मीना कंडासामी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन को एक भावुक खुला पत्र लिखा। उन्होंने लिखा कि द्रमुक से जुड़े सोशल मीडिया हैंडल्स ने उनके साथ “अकथनीय और लगातार अपमानजनक व्यवहार” किया। उन्हें “वेश्या” और “आरएसएस की सुप्त कोशिका” जैसे गंभीर शब्दों से नवाजा गया। उन्होंने बताया कि यह हमले तब और बढ़ गए जब उन्होंने सरकार के मुखर आलोचक यूट्यूबर सवक्कू शंकर का समर्थन किया। यह सब तब हुआ जबकि उन्होंने खुद मुख्यमंत्री स्टालिन के पिता एम. करुणानिधि की साहित्यिक जीवनी का अपने पिता के कहने पर अनुवाद किया था।
मीना ने अपने पत्र में लिखा, “एक माँ के रूप में मैं अपने बच्चों को यह कैसे समझाऊँ कि जब भी मैं पुलिस की अत्याचारों, महिलाओं के खिलाफ अपराधों, दलितों पर होने वाले अत्याचारों या कवि होने का दावा करने वाले एक छेड़छाड़ करने वाले व्यक्ति के संरक्षण पर कुछ भी आलोचनात्मक कहती हूँ, तो मुझ पर इतनी नफरत बरसाई जाती है? क्या मैं उन्हें बताऊँ कि ये लोग भी फासिस्ट हैं क्योंकि ये किसी भी आलोचना को बर्दाश्त नहीं कर सकते? या यह बताऊँ कि हमारी राजनीति में इतनी गहराई से दुराचारिता घुस चुकी है कि एक महिला अगर द्रमुक की विचारधारा से अलग राय रखती है तो वह अपने आप बेरहमी से हमले का निशाना बन जाती है।”
उन्होंने आगे कहा, “यह कैसे संभव है कि मैं फिलिस्तीनियों के नरसंहार पर लिख सकती हूँ, अमेरिकी साम्राज्यवाद को चुनौती दे सकती हूँ, ऑपरेशन खागर के दौरान अर्धसैनिक बलों के अत्याचारों पर केंद्र पृष्ठ लिख सकती हूँ और गृह मंत्री अमित शाह की आलोचना कर सकती हूँ, लेकिन एक तमिल महिला होने के नाते मैं आपकी सरकार या उसके तंत्र की हल्की सी आलोचना करने वाली एक ट्वीट नहीं लिख सकती बिना इसके कि मुझे गंदी गालियाँ और अकल्पनीय बदनामी का सामना न करना पड़े?”
पूर्व पत्रकार सोनिया अरुण कुमार ने भी यह कहा कि वह कभी भी द्रमुक को वोट नहीं देंगी। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी के आईटी विंग और वरिष्ठ नेता आर.एस. भारती के बेटे साईं लक्ष्मीकांत से जुड़े लोगों ने उन्हें लगातार परेशान किया। उन्होंने हाल में एक पोस्ट में लिखा, “द्रमुक के सत्ता में आने के बाद मुझे साईं लक्ष्मीकांत द्वारा लगातार और लक्षित तरीके से उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। वर्षों तक मुझे परेशान किया गया, बदनाम किया गया और जानबूझकर निशाना बनाया गया। मेरे बारे में झूठी कहानियाँ गढ़ी गईं। यह सिर्फ कोई आम ट्रोलिंग नहीं थी। यह संगठित और व्यवस्थित चरित्र हनन था। इस लंबे समय तक चले मानसिक आघात ने मुझे अपने मीडिया करियर से दूर जाने पर मजबूर कर दिया। तमिलनाडु की डिजिटल दुनिया में महिला विभागाध्यक्षों में से एक के रूप में यह सिर्फ मेरा व्यक्तिगत नुकसान नहीं था, बल्कि यह उस प्रतिकूल माहौल को दर्शाता है जो स्वतंत्र रूप से अपनी जगह बनाने की कोशिश करने वाली महिलाओं के लिए बनाया जाता है।”
इन दोनों के बाद दलित अधिकार कार्यकर्ता शालिन मारिया लॉरेंस का बयान भी सामने आया। उन्होंने तमिल भाषा में एक प्रभावशाली पोस्ट लिखकर अपनी लंबी पीड़ा को बयान किया। उन्होंने लिखा, “इतने सालों से मुझे सबसे गंदी भाषा में गालियाँ दी गईं। मेरे शरीर को लेकर टिप्पणियाँ की गईं, मुझे बदनाम किया गया। मुझे लगातार बलात्कार और मौत की धमकियाँ मिलती रहीं। उस दौरान जब कोई मेरे समर्थन में नहीं बोलता था, क्योंकि सभी अपनी-अपनी पार्टियों, आंदोलनों या समूहों के प्रति वफादार थे, तब मैंने अपने तरीके से जवाब देना शुरू किया।”
उन्होंने कहा, “जब राजनीतिक बहस में कोई मुझसे कहता है, ‘चली जा, $%डी’, तो मैं केवल इतना कह सकती हूँ कि ‘मैं तुझे चप्पल मारूंगी।’ मैं उन्हें गोद में नहीं बिठा सकती और ‘कॉमरेड’ कहकर नहीं बुला सकती। जब मैं प्रताड़ित की जा रही होती हूँ तो आप चुपचाप देखते रहते हो, लेकिन जैसे ही मैं किसी को जवाबी गाली देती हूँ, तुम अचानक कूद पड़ते हो और कहते हो, ‘हे भगवान, देखो यह कितनी अश्लील भाषा बोलती है!’”
शालिन ने लिखा, “तुममें मदुर सत्या जैसे व्यक्ति की निंदा करने की हिम्मत नहीं है, जिसने महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया और उनके साथ बनाई अंतरंग वीडियो पूरे शहर में फैला दीं, लेकिन तुम्हें मुझे नैतिकता का पाठ पढ़ाने की औकात है क्योंकि मैं अपना अपमान करने वालों का अपमान करती हूँ। मैं ऐसे लोगों का बिल्कुल सम्मान नहीं करती।”
उन्होंने आगे कहा, “तुम सोशल मीडिया की इस गूंजगुफा में बैठे रहो, मेरे बारे में बातें करते रहो और अपनी गंदगी में ही सड़ते रहो। मैं बढ़ती रहूंगी और ऊपर उठती रहूंगी। और कोई नहीं, बिल्कुल कोई भी मुझे रोक नहीं सकता। बस।”
शालिन के इस बयान से पहले भी उनके खिलाफ द्रमुक से जुड़े हैंडल्स द्वारा जातिगत टिप्पणियाँ, शरीर पर ताने, धार्मिक हमले और धमकियाँ देने के मामले सामने आते रहे हैं, खासकर जब वह दलित अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाती हैं।
ये खुलासे द्रमुक की उस छवि पर सवाल खड़े कर रहे हैं जिसमें वह कलैग्नर मगलिर उरिमै थोगाई जैसी योजनाओं के माध्यम से खुद को सामाजिक न्याय, महिला सशक्तिकरण और फासीवाद-विरोधी मूल्यों की रक्षक बताती है। आरोप लग रहे हैं कि पार्टी ऑनलाइन दुराचार और धमकी के मामलों में कथित तौर पर विरोधाभासी रवैया अपनाती है।
विपक्ष भी इस मुद्दे पर महिलाओं के समर्थन में आगे आ रहे हैं, AIADMK के नेता राज सत्येन ने अपने ट्वीट में लिखा, " अगर आप सरकार के ज़ुल्मों की बुराई करते हैं, तो क्या दूसरी राय रखने वाली महिला को 'प्रॉस्टिट्यूट' कहना आपका द्रविड़ियन मॉडल है @mkstalin सर? अगर एक महिला जो हिम्मत से सेंट्रल सरकार की भी बुराई कर सकती है, वह तमिलनाडु में सिर्फ़ DMK सरकार की बुराई नहीं कर सकती, तो वो बोलने की आज़ादी कहाँ चली गई? आज मीना कंडासामी...कल हमारे घर की औरतें!क्या हमें इस स्टालिन-मॉडल सरकार के अराजक गैंग को सबक नहीं सिखाना चाहिए जो सत्ता के घमंड में एक महिला की इज़्ज़त को खत्म कर देता है?"
आचार संहिता लागू होने के बाद सामने आए इन बयानों को सोशल मीडिया पर अथाह समर्थन मिल रहा है। हजारों लोगों ने इन महिलाओं के समर्थन में पोस्ट किए हैं। महिला अधिकार संगठनों और विपक्षी दलों ने भी इन आरोपों को हाथों-हाथ लिया है। अब देखना यह होगा कि द्रमुक नेतृत्व इन आरोपों का जवाब कैसे देता है और आगामी विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा वोटर्स के फैसले को किस हद तक प्रभावित करता है।
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