
नई दिल्ली- हाल ही साइंस जर्नी पॉडकास्ट में सीनियर आईआरएस अधिकारी नेत्रपाल ने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर शांतिश्री धुलिपुडी पंडित के विवादास्पद बयान पर तीखा हमला बोला। उन्होंने बताया कि मैडम कह रही हैं कि दलितों को विक्टिमहुड का नशा हो गया है, वे सदियों से पानी नहीं मिलने जैसी बातें करके विक्टिम खेलते हैं। नेत्रपाल ने इसे स्पष्ट पूर्वाग्रह और प्रिजुडिस बताया तथा कहा कि यह बयान देने वाली व्यक्ति संस्थान की हेड हैं, जहां एससी-एसटी-ओबीसी छात्रों की संख्या बहुत अधिक है। उन्होंने जोर देकर कहा कि पूरे भारत में यूनिवर्सिटीज में एससी-एसटी-ओबीसी के लगभग 9 करोड़ छात्र पढ़ रहे हैं, जो बहुत बड़ी संख्या है, फिर भी ऐसी मानसिकता दिखाना पूर्वाग्रह को उजागर करता है।
नेत्रपाल ने तुलनात्मक डेटा पेश करते हुए बताया कि हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, जो दुनिया की टॉप-10 यूनिवर्सिटीज में शामिल है,अपनी 2023 की डायवर्सिटी रिपोर्ट में स्पष्ट करती है कि फैकल्टी ऑफ कलर यानी नॉन-व्हाइट फैकल्टी का प्रतिनिधित्व 22 प्रतिशत है, जिसमें 232 में से ब्लैक, हिस्पैनिक आदि शामिल हैं। वहीं आईआईटी में एससी-एसटी-ओबीसी फैकल्टी का प्रतिनिधित्व मात्र 1.92 प्रतिशत है, जबकि आईआईएम में यह 0.8 प्रतिशत से भी कम है। यह पांच-छह साल पुराना डाटा है जिसमे कुछ मामूली सुधार हुआ होगा लेकिन ज्यादा फर्क नहीं है।
उन्होंने कहा कि अमेरिका में ब्लैक समुदाय पर सदियों से अत्याचार हुआ, फिर भी अफर्मेटिव एक्शन की वजह से उनका प्रतिनिधित्व अच्छा है, जबकि भारत में दलित-ओबीसी-आदिवासी समुदाय की समस्या विश्व में अनोखी और ब्लैक विक्टिमहुड से भी अधिक गंभीर है। 85 प्रतिशत से अधिक आबादी वाले इस समुदाय का आईआईटी-आईआईएम जैसे संस्थानों में मात्र 2 प्रतिशत प्रतिनिधित्व भी नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि यह तुलना गलत है क्योंकि भारत में निजी क्षेत्र में भी कोई सकारात्मक कार्रवाई नहीं है।
पॉडकास्ट में नेत्रपाल ने यूजीसी 2026 रेगुलेशन पर उठे विवाद का भी गहराई से विश्लेषण किया। उन्होंने बताया कि विरोध करने वाले कह रहे हैं कि यह रेगुलेशन हिंदू समाज को विभाजित कर देगा और ओबीसी को राजनीतिक वजह से शामिल किया गया है, लेकिन सच्चाई यह है कि 2012 का यूजीसी रेगुलेशन केवल एससी-एसटी के लिए था और ओबीसी को बाद में संसदीय समिति की सिफारिश पर जोड़ा गया। 31 सदस्यीय संसदीय समिति, जिसमें बहुमत अपर कास्ट का था, ने डेटा देखते हुए ओबीसी पर हो रहे अत्याचारों को स्वीकार किया और उन्हें शामिल करने की सिफारिश की। रोहित वेमुला और पायल तड़वी आत्महत्या मामलों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी 2012 रेगुलेशन को ठीक से लागू करने को कहा था। नेत्रपाल ने स्पष्ट किया कि 2006 में ओबीसी रिजर्वेशन लागू होने के बावजूद यूनिवर्सिटीज में इसे 2013 से लागू किया गया और चिकित्सा शिक्षा में तो 2021 में लागू हुआ।
उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ भी दिया कि ब्रिटिश काल में हिंदू कॉलेज जैसे संस्थानों में 'शूद्रों' को प्रवेश नहीं मिलता था, केवल कुछ कायस्थों को छूट दी गई क्योंकि उनकी सामाजिक स्थिति अपर कास्ट के समान थी। 1901 की जाति जनगणना से लेकर वर्तमान डेटा तक दिखाया गया कि ओबीसी में 50-70 प्रतिशत अत्यधिक पिछड़े हैं, जिन्हें हायर एजुकेशन और सरकारी नौकरियों में प्रवेश नहीं मिला। नेत्रपाल ने कहा कि एससी-एसटी को 1947 के बाद रिजर्वेशन मिल गया लेकिन ओबीसी को 1990 तक लड़ना पड़ा और यूनिवर्सिटीज में 2012 तक इंतजार करना पड़ा, जिससे उनकी कई पीढ़ियां बर्बाद हो गईं।
शिक्षा संबंधी आंकड़ों में बताया कि प्राइमरी स्तर पर जनरल कैटेगरी का प्रतिनिधित्व मात्र 11.85 प्रतिशत है, जो हायर एजुकेशन में 50 प्रतिशत तक पहुंच जाता है, जबकि एससी-एसटी-ओबीसी छात्र प्राइमरी में अधिक होते हैं लेकिन ड्रॉपआउट बढ़ने से हायर एजुकेशन में घट जाते हैं। एससी में प्राइमरी 21 प्रतिशत से सेकेंडरी में 14.82 प्रतिशत और इंजीनियरिंग में 4.72 प्रतिशत रह जाता है। ओबीसी में भी यही हाल है। आईआईटी में ड्रॉपआउट और आत्महत्या के आंकड़े एससी-एसटी-ओबीसी में अधिक हैं, जबकि अन्ना यूनिवर्सिटी जैसे संस्थान में ऐसा नहीं होता, जो संस्थागत भेदभाव को साबित करता है। सेंट्रल यूनिवर्सिटीज में ओबीसी प्रोफेसर मात्र 1.1 प्रतिशत हैं, जबकि स्टेट यूनिवर्सिटीज में 33 प्रतिशत। मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व 45 प्रतिशत तक है क्योंकि उनके अलग संस्थान हैं।
"यूनिवर्सिटी में ऑटोमेटिकली एससी एसटी ओबीसी लोग माइनॉरिटी है क्योंकि सारे टॉप पोजीशनंस में सारे फैकल्टीज में इस वर्ग से कोई नहीं है। आईआईटी में 1-2% लोग हैं। मैक्सिमम 10% लोग होंगे और अगर एडमिनिस्ट्रेशन में भी नॉन फैकल्टी का कैडर में भी बहुत कम होते हैं। यहां पर एससी, एसटी, ओबीसी लोग बहुत माइनॉरिटी है। बाहर बहुत ज्यादा है लोग। इसलिए वो पिछड़े हैं ना? वी आर नॉट गेटिंग हायर एजुकेशन सो इजीली। सो इस जगह पे क्या है? डिस्क्रिमिनेशन तो हमारे ऊपर ही हो रहा है ना। "
सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा फैकल्टी पदों की रिक्तियों का है। सेंट्रल यूनिवर्सिटीज में ओबीसी प्रोफेसर पदों में 95.5 प्रतिशत रिक्त हैं, एसोसिएट प्रोफेसर में 91.95 प्रतिशत, जबकि एससी में 78 प्रतिशत रिक्त हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रिंसिपल पदों पर कोई एससी-एसटी नहीं है। नेत्रपाल ने कहा कि यह संस्थागत भेदभाव है, जहां इंटरव्यू में कम मार्क्स, एनएफएस और रिक्तियां जानबूझकर बनाई जाती हैं। एससी-एसटी अत्याचार मामलों में उत्तर प्रदेश में दोषसिद्धि दर 70-80 प्रतिशत है, जो मर्डर-रेप से कहीं अधिक है, फिर भी फर्जी केस का रोना रोया जाता है।
पॉडकास्ट के अंत में नेत्रपाल ने निष्कर्ष निकाला कि एससी-एसटी-ओबीसी के लगभग 5 करोड़ छात्र इस रेगुलेशन से प्रभावित होंगे। शिक्षा उनके पास एकमात्र हथियार है, इसलिए भेदभाव सहन नहीं किया जा सकता। अधिकारों की मांग को विक्टिमहुड नहीं कहा जा सकता। उन्होंने बौद्ध माइनॉरिटी यूनिवर्सिटी खोलने का सुझाव भी दिया। पॉडकास्ट में कहा गया कि डेटा कभी झूठ नहीं बोलता और बहुजन समाज को यह जानकारी फैलानी चाहिए ताकि समानता और न्याय सुनिश्चित हो सके।
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