
आईआईएमयूएन ऑथर सीरीज के एक विशेष कार्यक्रम में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डॉ. धनंजय वाई. चंद्रचूड़ और कांग्रेस सांसद डॉ. शशि थरूर के बीच आरक्षण के मुद्दे पर एक गहन और विचारोत्तेजक चर्चा हुई. इस दौरान दोनों दिग्गजों ने आरक्षण की मौजूदा स्थिति, इसके राजनीतिक प्रभाव और मेरिट (योग्यता) की परिभाषा पर कई अहम बातें रखीं. यह कार्यक्रम आईआईएमयूएन की साहित्य संवर्धन नामक स्तंभ के अंतर्गत चल रही लेखक श्रृंखला का हिस्सा था।
DY चंद्रचूड़ ने आरक्षण की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि आजादी के 75 साल बाद भी देश में जातिगत भेदभाव जारी है. उन्होंने कहा, "हम खुद से यह सवाल पूछ सकते हैं कि क्या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ भेदभाव 75 साल में खत्म हो गया है? इसका जवाब साफ तौर पर 'नहीं' है. आज भी आईआईटी या दूसरे संस्थानों में एससी-एसटी के छात्र आत्महत्या कर रहे हैं."
चंद्रचूड़ ने आरक्षण के सामाजिक आधार को रेखांकित करते हुए कहा कि सिर्फ आर्थिक मानदंडों पर आरक्षण की नीति को सीमित नहीं किया जा सकता. उन्होंने स्पष्ट किया कि कई समुदायों के लिए, किसी खास जाति या समुदाय में जन्म लेना ही भेदभाव का सबसे बड़ा कारण है. उन्होंने कहा, "आज भी अगर आप गांवों में जाएं, तो किसी खास जाति या समुदाय में जन्म लेना भेदभाव का एक बहुत बड़ा स्रोत है. मुझे नहीं लगता कि भारत अभी उस स्तर पर पहुंच गया है, जहां हम कह सकें कि सभी जातियां एक समान स्थिति में हैं और आरक्षण खत्म किया जा सकता है."
उन्होंने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर आरक्षण नीति को और निष्पक्ष बनाने के प्रयास किए हैं - जैसे कि राज्य सरकारों को सबसे पिछड़े लोगों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाने के लिए 'उप-वर्गीकरण' की अनुमति देना और ओबीसी आरक्षण से 'क्रीमी लेयर' को बाहर करना.
डॉ. शशि थरूर ने इस बहस की शुरुआत करते हुए कहा कि आरक्षण के भीतर भी मेरिट (योग्यता) को बढ़ावा देना संभव है. उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि कानून के छात्रों के बीच यह राय बढ़ रही है कि आरक्षण के नाम पर मेरिट से समझौता किया जा रहा है. उन्होंने आरक्षण को भारतीय राजनीति की 'तीसरी रेल' बताते हुए कहा कि इसे छूना किसी भी राजनेता के लिए राजनीतिक आत्महत्या के समान है, इसलिए इसे खत्म करने की बजाय इसके भीतर ही सुधार लाने पर ध्यान देना चाहिए.
इस पर जवाब देते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने 'मेरिट' की पारंपरिक धारणा को चुनौती दी. उन्होंने कहा, "आप मेरिट से असल में क्या समझते हैं? क्या मेरिट सिर्फ नीट या क्लैट जैसी परीक्षाओं में मिले अंक हैं? ये कच्चे अंक खुद आपकी सांस्कृतिक और सामाजिक पूंजी का परिणाम होते हैं. जो छात्र सबसे अच्छे अंक लाते हैं, वे आमतौर पर वही होते हैं जिनके पास कोचिंग क्लासेस तक पहुंच है और अंग्रेजी पर अच्छी पकड़ है."
उन्होंने आगे कहा कि अगर मेरिट को शासन में जिम्मेदार पदों पर समाज के विभिन्न वर्गों को शामिल करने की क्षमता के रूप में परिभाषित किया जाए, तो आरक्षण मेरिट के खिलाफ नहीं, बल्कि उसे और आगे बढ़ाता है. उन्होंने कहा कि आज भी सबसे ऊपरी और महत्वपूर्ण पदों पर अनुसूचित जातियों का प्रतिनिधित्व बेहद कम है.
जहां थरूर ने कहा कि नेहरु सरीखे लीडर्स व संविधान निर्माता आरक्षण के खिलाफ थे और डॉ. अंबेडकर भी शुरुआत में इसे 10 साल के लिए ही चाहते थे, वहीं जस्टिस चंद्रचूड़ ने वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इसकी अनिवार्यता पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि भारत में आरक्षण ने सामाजिक संतुलन बनाए रखने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे समाज के सभी वर्गों को व्यक्तिगत और सामाजिक विकास का अवसर मिला है. हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि गवर्नमेंट लॉ कॉलेज जैसे संस्थानों में 50% से अधिक सीटें आरक्षित होने से सामान्य वर्ग के छात्रों को होने वाली परेशानी को भी समझा जा सकता है.
स्रोत: यह रिपोर्ट IIMUN ऑथर सीरीज के तहत आयोजित एक विशेष कार्यक्रम पर आधारित है, जिसमें पूर्व मुख्य न्यायाधीश डॉ. धनंजय वाई. चंद्रचूड़ और कांग्रेस सांसद डॉ. शशि थरूर ने ने अपनी पुस्तक "Our Living Constitution" के विमोचन के अवसर पर चर्चा की। इस संवाद को 27 फरवरी, 2026 को Brut India ने अपने मंच पर प्रस्तुत किया।
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