PATCA की चौंकाने वाली रिपोर्ट: ऑस्ट्रेलिया में दलित, आदिवासी, मुस्लिम, ईसाई, सिख और तमिल समुदाय कैसे झेल रहे हैं जातिवाद

न्यू साउथ वेल्स संसद की कानून और सुरक्षा समिति में PATCA की रिपोर्ट में उठाए गंभीर मुद्दे
PATCA ने संसद की कानून और सुरक्षा समिति को सबमिट रिपोर्ट में बताया कि 'हिंदुत्व' और 'ब्राह्मणवाद' की विचारधारा से प्रेरित लोग और संगठन दक्षिणपंथी हिंदू उग्रवाद फैला रहे हैं।
PATCA ने संसद की कानून और सुरक्षा समिति को सबमिट रिपोर्ट में बताया कि 'हिंदुत्व' और 'ब्राह्मणवाद' की विचारधारा से प्रेरित लोग और संगठन दक्षिणपंथी हिंदू उग्रवाद फैला रहे हैं।ग्राफिक- आसिफ निसार/द मूकनायक
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सिडनी-  ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों के बीच धार्मिक और जातिगत भेदभाव की समस्या गंभीर रूप लेती जा रही है। 'पेरियार अंबेडकर थॉट्स सर्किल ऑफ ऑस्ट्रेलिया' (PATCA) ने न्यू साउथ वेल्स की संसद में एक विस्तृत रिपोर्ट पेश करके बताया है कि कैसे दलित, बहुजन, आदिवासी, मुस्लिम, ईसाई, सिख और तमिल समुदाय के लोग इस भेदभाव का सबसे ज्यादा शिकार हो रहे हैं।

यह रिपोर्ट 22 जनवरी को संसद की कानून और सुरक्षा समिति को सौंपी गई। 14 पन्नों के इस दस्तावेज़ में PATCA ने दावा किया है कि जातिगत भेदभाव सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि ऑस्ट्रेलिया की धरती पर भी भारतीय मूल के लोग इसे झेल रहे हैं। PATCA ने अपनी रिपोर्ट में साफ तौर पर उन समुदायों के नाम गिनाए हैं जो इस भेदभाव से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है, "यह प्रस्तुतिकरण उन जाति-उत्पीड़ित, दलित, बहुजन, आदिवासी, मुस्लिम, ईसाई, सिख, तमिल, दक्षिण एशियाई और अन्य हाशिए के समुदायों के जीवंत अनुभवों को केंद्र में रखता है जो इन विचारधाराओं से असम्मानजनक रूप से प्रभावित होते हैं।"

कैसे प्रकट हो रहा है भेदभाव?

PATCA के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया में जातिगत भेदभाव कई तरीकों से सामने आ रहा है:

सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार: रिपोर्ट में बताया गया है कि कई बार जाति के नाम पर लोगों का सामाजिक बहिष्कार किया जाता है। उन्हें समुदाय के कार्यक्रमों में शामिल नहीं किया जाता। कारोबार और रोजगार के मामलों में भी उनके साथ भेदभाव होता है।

मानसिक प्रताड़ना: जातिगत भेदभाव का शिकार होने वाले लोगों को मानसिक रूप से भी प्रताड़ित किया जाता है। उनकी पहचान को मिटाने की कोशिश की जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक, इससे उनके मन में डर और कलंक की भावना पैदा होती है जो पीढ़ियों तक चलती है।

बोलने पर रोक: जो लोग इस भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाते हैं, उन्हें चुप कराने की कोशिश की जाती है। उनकी बातों को झुठलाया जाता है और उन्हें गैसलाइट किया जाता है।

PATCA ने स्कूलों में हो रहे भेदभाव पर भी सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, स्कूलों में चलने वाले धार्मिक शिक्षा कार्यक्रमों (Special Religious Education) में बच्चों को जाति आधारित पदानुक्रम सिखाया जाता है।

रिपोर्ट में कहा गया है, "न्यू साउथ वेल्स में जाति को स्पष्ट रूप से मान्यता देने में विफलता के कारण स्कूलों और शैक्षिक कार्यक्रमों में जाति-आधारित बहिष्कार हुआ है। जातिवादी धार्मिक शिक्षा और पाठ्यक्रम सामग्री भी सामने आई है।"

रिपोर्ट में ऑस्ट्रेलियाई मानवाधिकार आयोग के उस बयान का हवाला दिया गया है जिसमें उसने माना था कि जातिगत भेदभाव नस्लवाद का एक रूप है। आयोग के मुताबिक यह भेदभाव ऑस्ट्रेलियाई लोगों को शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में प्रभावित कर रहा है। PATCA का कहना है कि नौकरी पाने में, प्रमोशन में और काम के माहौल में भी जाति के नाम पर लोगों के साथ भेदभाव हो रहा है।

PATCA ने अपनी रिपोर्ट में उन ताकतों के बारे में भी बताया है जो यह भेदभाव फैला रही हैं। उनके मुताबिक, 'हिंदुत्व' और 'ब्राह्मणवाद' की विचारधारा से प्रेरित लोग और संगठन यह काम कर रहे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक ये संगठन खुद को सांस्कृतिक, शैक्षिक या चैरिटी संस्था बताते हैं, लेकिन असल में ये जातिवादी विचारधारा फैलाने का काम करते हैं। ये संगठन सरकारी फंडिंग भी ले रहे हैं और स्कूलों, सामुदायिक कार्यक्रमों और धार्मिक आयोजनों के जरिए अपनी विचारधारा फैला रहे हैं।

PATCA ने चेतावनी दी है कि सबसे ज्यादा निशाने पर युवा हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, दूसरी पीढ़ी के युवा जो ऑस्ट्रेलिया में पैदा हुए या बड़े हुए हैं, उन्हें खास तौर पर निशाना बनाया जा रहा है।

इन युवाओं को युवा शिविरों, सांस्कृतिक कक्षाओं, धार्मिक शिक्षा कार्यक्रमों और ऑनलाइन माध्यमों से जोड़ा जा रहा है। उनमें यह भावना पैदा की जा रही है कि उनकी पहचान खतरे में है और उन्हें अपनी संस्कृति और धर्म की रक्षा करनी है।

रिपोर्ट में कहा गया है, "यह सौम्य सांस्कृतिक शिक्षा नहीं है। यह वैश्विक दक्षिणपंथी कट्टरपंथीकरण के तरीकों से मेल खाता है।"

PATCA ने संसद की कानून और सुरक्षा समिति को सबमिट रिपोर्ट में बताया कि 'हिंदुत्व' और 'ब्राह्मणवाद' की विचारधारा से प्रेरित लोग और संगठन दक्षिणपंथी हिंदू उग्रवाद फैला रहे हैं।
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PATCA का दावा है कि उनके पास ऐसे कई लोगों के अनुभव हैं जो इस भेदभाव का शिकार हुए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, पीड़ितों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है:

  • उनके साथ नफरत और बहिष्कार का व्यवहार सामान्य हो गया है

  • समाज में उनके साथ ऐसा व्यवहार होता है कि वे खुद को हीन महसूस करने लगते हैं

  • वे खुलकर बोलने से डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके खिलाफ और कार्रवाई हो सकती है

  • उनके बच्चे भी इस डर और कलंक के साथ बड़े हो रहे हैं

PATCA ने क्या मांग की है?

  1. सरकार आधिकारिक तौर पर "दक्षिणपंथी हिंदू उग्रवाद" को भी दक्षिणपंथी उग्रवाद के रूप में मान्यता दे।

  2. किसी भी व्यक्ति या संगठन के खतरे को आंकते समय उसकी जाति-आधारित विचारधारा को भी देखा जाए।

  3. जिन धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक संगठनों का विदेशी उग्रवादियों से संबंध है, उन्हें सरकारी फंड न दिया जाए।

  4. स्कूलों में चलने वाली धार्मिक शिक्षा कक्षाओं की स्वतंत्र जांच हो और पढ़ाई जाने वाली सामग्री की समीक्षा हो।

  5. जाति के नाम पर बहिष्कार या धर्म के नाम पर बदनामी जैसे गैर-हिंसक नुकसान की शिकायत दर्ज कराने के लिए समुदाय के नेतृत्व वाले रास्ते बनाए जाएं।

  6. NSW के भेदभाव-विरोधी कानूनों में जाति को भी एक संरक्षित श्रेणी के रूप में जोड़ा जाए।

संसदीय जांच क्या है?

यह पूरा मामला न्यू साउथ वेल्स की संसद में चल रही एक जांच से जुड़ा है। यह जांच नवंबर 2025 में हुई एक नव-नाजी रैली के बाद शुरू की गई थी। इस जांच का मकसद समझना है कि ऑस्ट्रेलिया में दक्षिणपंथी उग्रवाद कितना खतरा है और उससे कैसे निपटा जाए।

इस जांच में कई और संगठनों ने भी अपने बयान दिए हैं। NSW यहूदी बोर्ड ऑफ डेप्युटीज ने कहा है कि यहूदी-विरोधी भावना (antisemitism) तेजी से बढ़ रही है। ऑस्ट्रेलियन फेडरेशन ऑफ इस्लामिक काउंसिल ने मुसलमानों के साथ हो रहे भेदभाव के बारे में बताया है।

PATCA का कहना है कि जाति आधारित भेदभाव को भी उग्रवाद के इन्हीं रूपों की तरह गंभीरता से लिया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि हिंसा होने का इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि पहले से रोकथाम के उपाय करने चाहिए।

समिति अप्रैल 2026 तक अपनी अंतिम रिपोर्ट संसद में पेश करेगी। इस रिपोर्ट में बताया जाएगा कि दक्षिणपंथी उग्रवाद से निपटने के लिए क्या-क्या कदम उठाए जाने चाहिए। PATCA को उम्मीद है कि उनकी बातों को गंभीरता से सुना जाएगा और जाति आधारित भेदभाव को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे।

PATCA ने अपने रिपोर्ट के अंत में कहा है कि न्यू साउथ वेल्स में दक्षिणपंथी उग्रवाद को तब तक प्रभावी ढंग से नहीं रोका जा सकता, जब तक उसके सभी रूपों को नहीं पहचाना जाता। उनके मुताबिक, दक्षिणपंथी हिंदू उग्रवाद एक असली लेकिन कम पहचाना गया खतरा है, जो सामाजिक एकता, लोकतांत्रिक मूल्यों और हाशिए के समुदायों की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर रहा है।

PATCA ने संसद की कानून और सुरक्षा समिति को सबमिट रिपोर्ट में बताया कि 'हिंदुत्व' और 'ब्राह्मणवाद' की विचारधारा से प्रेरित लोग और संगठन दक्षिणपंथी हिंदू उग्रवाद फैला रहे हैं।
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