
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने 15 अक्टूबर को एक अहम फैसले में कहा है कि किसी महिला पर भी सामूहिक दुष्कर्म (गैंग रेप) का आरोप लगाया जा सकता है। जस्टिस ए. जे. भंभानी ने एक नाबालिग लड़की के मामले में आरोपी महिला की याचिका खारिज कर दी और निचली अदालत का आरोप तय करने वाला आदेश सही ठहराया। फैसले की शुरुआत एक जर्मन कहावत से हुई, "जो सीढ़ी थामे रखता है, वह भी उतना ही दोषी है जितना चोर।"
मामला दिल्ली के भलस्वा डेयरी थाने में 9 जुलाई 2024 को दर्ज FIR का है। FIR नाबालिग पीड़िता की मां ने ही दर्ज कराई थी और शुरू में बेटी के अपहरण की बात कही थी। जांच के दौरान 1 अक्टूबर 2024 को पीड़िता खुद थाने पहुंची। मेडिकल जांच में उसने कहा कि उसके साथ यौन उत्पीड़न हुआ है। स्टेटस रिपोर्ट के मुताबिक उसने आंतरिक मेडिकल जांच कराने से मना कर दिया। 4 अक्टूबर 2024 को दर्ज बयान में पीड़िता ने कहा कि 23 दिसंबर 2023 को उसकी मां ने धमकी दी कि अगर उसने दूसरे आरोपी के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाए तो वह उसे जान से मार देगी। पीड़िता के अनुसार विरोध के बावजूद उसे संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया, और हर बार उसकी मां उसी कमरे में मौजूद रहती थी। उसने कहा कि दिसंबर 2023 से जुलाई 2024 के बीच उसके साथ कई बार ऐसा हुआ। उसके मुताबिक 23 दिसंबर 2023 की घटना का वीडियो मां के मोबाइल में मिलेगा। जब मां ने दोबारा धमकाया तो वह 8 जुलाई 2024 को घर छोड़कर चली गई। जांच पूरी होने पर 27 नवंबर 2024 की चार्जशीट में POCSO कानून के अपराध भी जोड़े गए।
रोहिणी कोर्ट की विशेष POCSO अदालत ने 17 जनवरी 2025 को दोनों आरोपियों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 70(2), 351(3), 64(2)(m) और POCSO एक्ट की धारा 6 के तहत आरोप तय किए। इसी आदेश को चुनौती देते हुए दोनों हाईकोर्ट पहुंचे। फैसले के अनुसार उन्होंने सिर्फ एक आधार पर चुनौती दी कि पहली आरोपी महिला है, इसलिए उस पर गैंग रेप का आरोप नहीं बन सकता। हाईकोर्ट ने 30 जनवरी 2025 को नोटिस जारी कर निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। बाद में 2 और 9 मई 2025 के आदेशों से रोक में इतनी ढील दी गई कि निचली अदालत पीड़िता की गवाही दर्ज कर सके, ताकि आरोपियों की जमानत अर्जी पर विचार हो सके। अदालत ने 6 मार्च 2025 को अधिवक्ता रोहन जे. अल्वा को न्यायमित्र (एमिकस क्यूरी) नियुक्त किया।
याचिकाकर्ताओं की वकील तान्या अग्रवाल ने दलील दी कि BNS की धारा 63 के मुताबिक दुष्कर्म सिर्फ "पुरुष" कर सकता है, इसलिए धारा 70 में लिखे "व्यक्तियों के समूह" का मतलब भी केवल पुरुषों का समूह है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट प्रिया पटेल बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2006) और राजस्थान राज्य बनाम हेमराज (2009) में यह सवाल पहले ही तय कर चुका है। प्रिया पटेल में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि "किसी महिला के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि उसकी दुष्कर्म करने की मंशा थी।" वकील ने यह भी कहा कि 2013 के संशोधन में विधायिका ने धारा 375 की पहली पंक्ति में “man” की जगह “person” नहीं किया, जबकि 2012 के विधेयक में ऐसा प्रस्ताव था। उनके मुताबिक जस्टिस जे.एस. वर्मा समिति की "लिंग की परवाह किए बिना" आरोपी बनाने की सिफारिश भी विधायिका ने नहीं मानी। उन्होंने "डीमिंग फिक्शन" यानी "मान लिए जाने" वाले प्रावधान पर भी बात की और कहा कि इसे सख्ती से और सिर्फ उसके मकसद तक सीमित रखकर पढ़ा जाना चाहिए, यह साक्ष्य के नियम और सजा तय करने के लिए है, अपराध का दायरा बढ़ाने के लिए नहीं।
न्यायमित्र रोहन अल्वा और राज्य की ओर से पेश एपीपी दिगम सिंह डागर ने इसका विरोध किया। एपीपी ने न्यायमित्र की दलीलें अपनाईं। न्यायमित्र ने कहा कि प्रिया पटेल और हेमराज 2013 से पहले के कानून पर आधारित थे, जब गैंग रेप सिर्फ धारा 376(2)(g) की एक व्याख्या में आता था। 2013 के बाद गैंग रेप को धारा 376D IPC के रूप में अलग और स्वतंत्र अपराध बनाया गया, जो अब BNS की धारा 70 है। उन्होंने कहा कि पुराने शब्द "उनकी सामान्य मंशा" की जगह अब "एक सामान्य मंशा" लिखा है, यानी मंशा पीड़िता से दुष्कर्म कराने की है, हर सदस्य का खुद दुष्कर्म करने की मंशा रखना जरूरी नहीं। उन्होंने इसी पीठ के सुंदरी गौतम बनाम दिल्ली राज्य (2024) का हवाला दिया, जिसमें POCSO की धारा 3 और 5 के कृत्यों को "अपराधी के लिंग की परवाह किए बिना अपराध" माना गया था। साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट के सुनीता पांडे फैसले का जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि महिला खुद दुष्कर्म नहीं कर सकती, लेकिन "यदि उसने लोगों के समूह के साथ दुष्कर्म के कृत्य को सुगम बनाया है, तो उस पर गैंग रेप का मुकदमा चलाया जा सकता है।"
जस्टिस भंभानी ने कहा कि 2013 से पहले गैंग रेप केवल दुष्कर्म का गंभीर रूप था और सीधे धारा 375 से जुड़ा था, जबकि अब यह अलग प्रावधान है। उन्होंने लिखा कि "गैंग रेप को धारा 376D IPC और धारा 70 BNS के तहत अलग प्रावधान के रूप में रखना दंड कानून में एक अलग, मूलभूत प्रावधान या अपराध स्थापित करने के लिए है," इसलिए इसकी व्याख्या बलात्कार की परिभाषा तक सीमित रखना जरूरी नहीं। अदालत ने साफ किया कि सवाल गैंग रेप का है, बलात्कार का नहीं, और "यह न्यायालय इस पर कोई राय व्यक्त नहीं कर रहा कि क्या कोई महिला बलात्कार कर सकती है।" अदालत के मुताबिक वह बलात्कार के दायरे को बढ़ा नहीं रही, बल्कि गैंग रेप के अपराध को उसका सीधा और सख्त अर्थ दे रही है, क्योंकि उसमें "व्यक्तियों" शब्द है, केवल पुरुषों का जिक्र नहीं।
अदालत ने कहा कि "व्यक्तियों" शब्द को केवल पुरुषों के समूह तक सीमित करने का कोई औचित्य या आधार नहीं है, और सामान्य मंशा भी केवल पुरुषों की मंशा तक सीमित नहीं की जा सकती। जज ने यह भी कहा कि कानून में "समूह गठित करने वाले व्यक्ति" और "सामान्य मंशा के अनुसरण में कार्य करने वाले" के बीच "और" नहीं, "या" लिखा है, इसलिए जरूरी नहीं कि सामान्य मंशा से काम करने वाला व्यक्ति दुष्कर्म का शारीरिक कृत्य करने वालों में भी शामिल हो। अदालत ने उदाहरण दिया कि "कोई महिला जो दुष्कर्म का भौतिक कृत्य करने वालों के समूह का हिस्सा नहीं है, फिर भी पीड़िता पर बलात्कार कराने की सामान्य मंशा के अनुसरण में कार्य कर सकती है।" कानून में लिखे "बलात्कार का अपराध करने वाला माना जाएगा" शब्दों को अदालत ने अहम बताया और कहा कि इसका मतलब है कि हर सदस्य का खुद दुष्कर्म करना जरूरी नहीं। अंत में अदालत ने निष्कर्ष दिया कि भले ही किसी ने खुद दुष्कर्म का कृत्य न किया हो, "वह लिंग की परवाह किए बिना गैंग रेप के अपराध के लिए आरोपित किए जाने योग्य है," और "यह मानने का कोई आधार नहीं है कि किसी महिला पर गैंग रेप का आरोप नहीं लगाया जा सकता।"
हालांकि अदालत ने एक सीमा भी तय की। उसने कहा कि "अकेली महिला पर गैंग रेप का आरोप नहीं लगाया जा सकता," क्योंकि यह प्रथम दृष्टया 2013 के बाद की धारा 375 IPC और धारा 63 BNS में दी गई बलात्कार की परिभाषा के अनुरूप नहीं होगा। अदालत ने यह भी कहा कि बलात्कार की विस्तारित परिभाषा में ऐसे कृत्य जुड़ गए हैं जो गैर-पुरुष भी कर सकता है, इसलिए यह सवाल किसी उचित मामले में फिर देखना पड़ सकता है। धारा 375 और 63 में आए शब्द “man” के लिंग-निरपेक्ष होने पर अदालत ने कोई राय नहीं दी। POCSO की धारा 6 के तहत तय आरोप को अदालत ने सुंदरी गौतम फैसले के आधार पर सही माना।
इन आधारों पर हाईकोर्ट ने 17 जनवरी 2025 का आरोप तय करने वाला आदेश बरकरार रखा और याचिका खारिज कर दी। लंबित आवेदन, यदि कोई हों, निपटा दिए गए।
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