
नई दिल्ली: झारखंड हाईकोर्ट ने महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े कानूनी पहलुओं को स्पष्ट करते हुए एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया है कि रात के अंधेरे में किसी महिला के घर में घुसना और उसके कपड़े हटाने की कोशिश करना 'छेड़छाड़' या शील भंग करने का अपराध तो हो सकता है, लेकिन इसे सीधे तौर पर 'बलात्कार का प्रयास' नहीं माना जा सकता।
इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की अदालत ने 31 अगस्त को अपना फैसला सुनाया। उन्होंने महिला का शील भंग करने और रेप की कोशिश के बीच एक स्पष्ट कानूनी रेखा खींची है। सोमवार को जारी किए गए इस फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी की हरकतें बलात्कार के प्रयास की कानूनी सीमा को पार नहीं करती हैं।
इस फैसले के साथ ही उच्च न्यायालय ने पूर्वी सिंहभूम जिले की एक सत्र अदालत के 25 जुलाई के आदेश में बड़ा बदलाव किया है। निचली अदालत ने दोषी व्यक्ति को रेप की कोशिश के आरोप में चार साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट ने माना कि महिला के साथ आपराधिक बल का प्रयोग करने और उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाने के लिए सबूत पर्याप्त हैं, इसलिए इस छोटे अपराध के तहत उसकी सजा को संशोधित किया गया है। अदालत ने दोषी द्वारा जेल में बिताए गए लगभग आठ महीने की कैद को न्याय के लिए पर्याप्त मानते हुए उसे राहत दी है।
यह पूरा मामला 26 दिसंबर 1999 की रात का है। घटना के अगले ही दिन यानी 27 दिसंबर को पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया था। इसके बाद उसके खिलाफ बलात्कार के प्रयास का आरोप लगाते हुए आरोप पत्र दायर किया गया था। इसी मामले में निचली अदालत ने उसे दोषी ठहराते हुए चार साल की जेल की सजा मुकर्रर की थी, जिसके खिलाफ अपीलकर्ता ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।
जस्टिस श्रीवास्तव ने अपने फैसले में विस्तार से बताया कि कोई कृत्य तभी बलात्कार का प्रयास माना जा सकता है, जब वह कृत्य सीधे तौर पर बलात्कार को अंजाम देने के बेहद करीब हो। इस मामले में पेश किए गए साक्ष्य केवल यह साबित करते हैं कि महिला का शील भंग करने के इरादे से आपराधिक बल का प्रयोग किया गया था। उच्च न्यायालय ने यह तय किया कि यह साक्ष्य बलात्कार के प्रयास के अपराध को साबित करने के लिए काफी नहीं हैं।
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