
बिहार: पटना हाई कोर्ट ने एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए एक व्यक्ति की रेप की सजा को घटाकर छेड़छाड़ (शील भंग करने के प्रयास) में तब्दील कर दिया है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि बिना किसी मेडिकल या ठोस सुबूत के, केवल रात में महिला की झोपड़ी में घुसकर उसका मुंह दबाने और उसके ऊपर लेटने के आरोप को रेप साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
जस्टिस संदीप कुमार की सिंगल बेंच ने 8 अक्टूबर को मोहम्मद ऐनुल हक की आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। कोर्ट का यह विस्तृत फैसला मंगलवार को सार्वजनिक हुआ। हाई कोर्ट ने मामले की समीक्षा के बाद कहा कि यदि पीड़िता के बयान को पूरी तरह सच भी मान लिया जाए, तो भी उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह मामला ज्यादा से ज्यादा आपराधिक अतिक्रमण और मारपीट का बनता है, दुष्कर्म का नहीं।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह घटना 8 फरवरी 2010 की रात करीब 10 बजे की है। आरोप था कि मोहम्मद ऐनुल हक गलत नीयत से एक विधवा महिला की झोपड़ी में घुसा। उसने महिला का मुंह दबाया और उसके शरीर पर चढ़ गया। जैसे ही आरोपी ने महिला के मुंह से अपना हाथ हटाया, उसने शोर मचा दिया। पीड़िता की आवाज सुनकर उसके पड़ोसी सहित 10 से 15 ग्रामीण मौके पर पहुंच गए और उन्होंने आरोपी को पकड़ लिया था।
निचली अदालत में ट्रायल के दौरान पीड़िता को छोड़कर मामले के बाकी सभी गवाह अपने बयानों से मुकर गए थे। अभियोजन पक्ष अदालत में ऐसा कोई भी मेडिकल या भौतिक सुबूत पेश करने में विफल रहा जिससे रेप के आरोपों की पुष्टि हो सके। महिला के शरीर पर चोट, खरोंच या फटे-बिखरे कपड़ों का कोई भी साक्ष्य अदालत के सामने नहीं रखा गया। इसके बावजूद बेगूसराय की निचली अदालत ने 29 जुलाई 2013 को हक को दुष्कर्म का दोषी मानते हुए चार साल जेल और जुर्माने की सजा सुनाई थी।
अब हाई कोर्ट ने निचली अदालत के उस फैसले को संशोधित कर दिया है। कोर्ट ने आरोपी को दुष्कर्म के आरोप से मुक्त करते हुए, उसे महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से किए गए हमले का दोषी ठहराया है। अदालत ने मोहम्मद ऐनुल हक पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया है। यह राशि उसे तीन सप्ताह के भीतर पीड़िता को मुआवजे के तौर पर चुकानी होगी।
अपना फैसला सुनाते समय जस्टिस संदीप कुमार ने सुप्रीम कोर्ट के दो ऐतिहासिक फैसलों का भी प्रमुखता से हवाला दिया। इनमें 'अमन कुमार बनाम हरियाणा राज्य (2004)' और 'रूपन देओल बजाज बनाम केपीएस गिल (1995)' का मामला शामिल है, जो इस तरह के मामलों में कानूनी नजीर माने जाते हैं।
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