12 साल से UAPA में बंद दो आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट से जमानत; e-Courts पोर्टल पर ट्रायल रिकॉर्ड देखने के बाद कहा- 'अनुच्छेद 21 का घोर उल्लंघन'

सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि अभियोजन पक्ष ने इस मामले में कुल 197 गवाहों को पेश करने का प्रस्ताव रखा है। ट्रायल कोर्ट में अभी केवल अभियोजन गवाह संख्या 68 की गवाही चल रही थी। इतना ही नहीं, अदालत ने यह भी कहा कि जनवरी 2025 से जुलाई 2026 तक लगभग डेढ़ वर्ष की अवधि में केवल दो गवाहों की ही गवाही दर्ज हो सकी, जिनमें से एक गवाह की गवाही भी पूरी नहीं हो पाई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय तक विचाराधीन कैद और धीमे ट्रायल को सीधे अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़ते हुए आरोपियों को राहत प्रदान की।
सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय तक विचाराधीन कैद और धीमे ट्रायल को सीधे अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़ते हुए आरोपियों को राहत प्रदान की।
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नई दिल्ली- लगभग 12 वर्षों से जेल में बंद दो आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत देते हुए कहा है कि मुकदमे की सुनवाई की अत्यंत धीमी गति और उसके शीघ्र समाप्त होने की कोई संभावना नहीं होने के कारण उनकी निरंतर कैद भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का "घोर उल्लंघन" है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मोहम्मद साकिब अंसारी और वकार अज़हर की विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके द्वारा की गई टिप्पणियां केवल जमानत याचिकाओं के निस्तारण तक सीमित हैं और इन्हें ट्रायल कोर्ट में लंबित मुकदमे के गुण-दोष पर कोई राय नहीं माना जाएगा।

यह मामला दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा 22 नवंबर 2011 को दर्ज एफआईआर संख्या 54/2011 से जुड़ा है। इस एफआईआर में भारतीय दंड संहिता की धाराओं 471, 489B, 489C और 120B के अलावा आर्म्स एक्ट की धारा 25, गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धाराएं 17, 18, 18A, 18B, 19 और 20, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, 1908 की धाराएं 3, 4 और 5 तथा पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 12 के तहत आरोप लगाए गए थे। दोनों याचिकाकर्ता इसी एफआईआर के सिलसिले में न्यायिक हिरासत में थे।

दोनों आरोपियों की जमानत याचिकाएं पहले UAPA की धारा 43D(5) के तहत ट्रायल कोर्ट ने खारिज कर दी थीं। इसके बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम, 2008 की धारा 21 के तहत दिल्ली हाईकोर्ट में अपील दायर की गई, लेकिन 24 अप्रैल 2026 को दिल्ली हाईकोर्ट ने भी साझा निर्णय के माध्यम से दोनों अपीलों को खारिज कर दिया। इसी आदेश को चुनौती देते हुए दोनों आरोपी सर्वोच्च न्यायालय पहुंचे थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसने याचिकाकर्ताओं और राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल की दलीलों को सुना तथा पूरे रिकॉर्ड का अवलोकन किया।

सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय तक विचाराधीन कैद और धीमे ट्रायल को सीधे अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़ते हुए आरोपियों को राहत प्रदान की।
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पाकिस्तानी नागरिक की गिरफ्तारी के बाद सामने आया राजस्थान मॉड्यूल का दावा

दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने जांच के दौरान 21-22 नवंबर 2011 की रात एक पाकिस्तानी नागरिक मोहम्मद कतील सिद्दीकी को गिरफ्तार किया था। जांच एजेंसी का दावा था कि पूछताछ के दौरान उसने खुलासा किया कि इंडियन मुजाहिदीन का एक "राजस्थान मॉड्यूल" बनाया गया है, जिसका उद्देश्य दिल्ली और उसके आसपास आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देना था। उसने यह भी कथित रूप से बताया कि इस मॉड्यूल के सदस्यों के पास विस्फोटकों की खेप मौजूद है।

इसी जानकारी के आधार पर 23 मार्च 2014 को जोधपुर स्थित मोहम्मद साकिब अंसारी के परिसर की तलाशी ली गई। तलाशी के दौरान बारूद, अमोनियम नाइट्रेट, डेटोनेटर तथा विस्फोटक उपकरण तैयार करने में इस्तेमाल होने वाली अन्य सामग्री बरामद होने का दावा किया गया। यह सामग्री राजस्थान एटीएस को सौंप दी गई, जिसके बाद प्रतापनगर थाना, जोधपुर में एफआईआर संख्या 113/2014 दर्ज की गई। इस एफआईआर में विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धाराएं 4, 5 और 6, UAPA की धाराएं 16, 17, 18, 18A, 18B, 19, 20, 23 तथा भारतीय दंड संहिता की धाराएं 120B, 121, 121A, 122, 212, 465, 468 और 471 लगाई गईं।

इसी प्रकार, सह-आरोपी वकार अज़हर के जयपुर स्थित कब्जे से भी जांच एजेंसियों द्वारा विस्फोटक सामग्री और कथित तौर पर आईईडी बनाने में प्रयुक्त सामान बरामद किए जाने का दावा किया गया। इसके बाद राजस्थान एटीएस/एसओजी ने जयपुर के सीआईडी/एसओजी थाने में एफआईआर संख्या 03/2014 दर्ज की। इस मामले में प्रारंभिक रूप से विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धाराएं 4 और 5, UAPA की धाराएं 3, 10, 13, 16, 18 और 20 तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 120B के तहत मामला दर्ज किया गया।

2014 से लगातार जेल में रहे दोनों आरोपी

सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों याचिकाकर्ताओं को वर्ष 2014 में इन तीनों एफआईआर के संबंध में औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया था और तब से वे निरंतर हिरासत में रहे। हालांकि, राजस्थान में दर्ज मामलों में उन्हें बाद में राहत मिल गई थी।

जयपुर की एफआईआर संख्या 03/2014 में विशेष अदालत ने 30 मार्च 2021 को दोनों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम तथा UAPA की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराया था। अदालत ने अलग-अलग धाराओं में विभिन्न अवधियों की कठोर कारावास की सजा सुनाई, जिनमें विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और UAPA की विभिन्न धाराओं के तहत 10 वर्ष तक का कठोर कारावास भी शामिल था। आदेश के अनुसार सबसे अधिक सजा भारतीय दंड संहिता की धारा 121 के तहत आजीवन कारावास की थी।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि राजस्थान हाईकोर्ट ने 6 सितंबर 2024 को मोहम्मद साकिब अंसारी की सजा निलंबित कर दी थी। वहीं प्रतापनगर, जोधपुर की एफआईआर संख्या 113/2014 में ट्रायल अभी लंबित है, लेकिन उस मामले में भी राजस्थान हाईकोर्ट ने 7 नवंबर 2024 को उन्हें जमानत दे दी थी।

इसी प्रकार वकार अज़हर की सजा भी राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा निलंबित कर दी गई थी और उन्हें भी जोधपुर वाले मामले में जमानत मिल चुकी थी। इसके बावजूद दोनों आरोपी दिल्ली स्पेशल सेल की एफआईआर संख्या 54/2011 के कारण ही जेल में बने हुए थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में दोनों लगभग 12 वर्षों से निरंतर जेल में हैं और ट्रायल शीघ्र समाप्त होने की कोई संभावना दिखाई नहीं देती।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में सबसे पहले इस तथ्य का उल्लेख किया कि इस मामले के एक सह-आरोपी मोहम्मद मारूफ को पहले ही जमानत मिल चुकी है। अदालत ने कहा कि जब समान मामले में एक सह-आरोपी को राहत मिल चुकी है, तब वर्तमान याचिकाओं पर विचार करते समय इस तथ्य की भी अनदेखी नहीं की जा सकती।

इसके बाद पीठ ने मामले के समग्र रिकॉर्ड का विश्लेषण करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों याचिकाकर्ताओं को तीन अलग-अलग एफआईआर में एक-दूसरे से काफी हद तक मिलते-जुलते आरोपों के आधार पर अभियुक्त बनाया गया है। अदालत ने कहा कि जयपुर की एफआईआर संख्या 03/2014 में दोनों आरोपियों को दोषी ठहराया गया था, लेकिन उनकी सजा राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा निलंबित की जा चुकी है। वहीं जोधपुर की एफआईआर संख्या 113/2014 में भी दोनों आरोपियों को जमानत मिल चुकी है। ऐसे में उनकी वर्तमान हिरासत केवल दिल्ली स्पेशल सेल की एफआईआर संख्या 54/2011 के कारण ही जारी है।

सुप्रीम कोर्ट ने खुद ई-कोर्ट पोर्टल पर ट्रायल की स्थिति देखी

सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने केवल रिकॉर्ड तक सीमित न रहते हुए ई-कोर्ट्स सर्विसेज पोर्टल पर उपलब्ध ट्रायल की प्रगति का भी अवलोकन किया। आदेश में कहा गया कि सह-आरोपी मोहम्मद कफील की जमानत याचिका 20 जुलाई 2026 को ट्रायल कोर्ट द्वारा खारिज की गई थी और उस आदेश में ट्रायल की वास्तविक स्थिति दर्ज थी।

सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि अभियोजन पक्ष ने इस मामले में कुल 197 गवाहों को पेश करने का प्रस्ताव रखा है। ट्रायल कोर्ट में अभी केवल अभियोजन गवाह संख्या 68 (PW-68) की गवाही चल रही थी। इतना ही नहीं, अदालत ने यह भी कहा कि जनवरी 2025 से जुलाई 2026 तक लगभग डेढ़ वर्ष की अवधि में केवल दो गवाहों की ही गवाही दर्ज हो सकी, जिनमें से एक गवाह की गवाही भी पूरी नहीं हो पाई थी।

इसी आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रायल की गति पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा:

"ट्रायल की प्रगति अत्यंत धीमी रही है और निकट भविष्य में इसके समाप्त होने की कोई संभावना दिखाई नहीं देती।"

25 आरोपी, एक को पहले ही जमानत

अदालत ने राज्य सरकार द्वारा दायर जवाबी हलफनामे का भी उल्लेख किया, जिसमें बताया गया था कि इस पूरे मामले में कुल 25 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों का समग्र मूल्यांकन करते हुए कई पहलुओं को एक साथ देखना आवश्यक है।

पीठ ने कहा कि:

1. सह-आरोपी मोहम्मद मारूफ पहले ही जमानत पर रिहा हो चुका है।

2. जयपुर वाले मामले में दोनों याचिकाकर्ताओं की सजा राजस्थान हाईकोर्ट ने निलंबित कर दी है।

3. जोधपुर वाले मामले में भी दोनों को जमानत मिल चुकी है।

4. दिल्ली वाले मुकदमे का ट्रायल अत्यंत धीमी गति से चल रहा है।

5. मुकदमा शीघ्र समाप्त होने की कोई संभावना नहीं है।

इन सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा:

"मामले के समग्र तथ्यों एवं परिस्थितियों, विशेषकर सह-आरोपी को पहले ही जमानत मिल जाने, राजस्थान के मामलों में याचिकाकर्ताओं की सजा निलंबित होने तथा उन्हें जमानत दिए जाने और ट्रायल की धीमी प्रगति को देखते हुए, हम यह महसूस करते हैं कि इस मामले में याचिकाकर्ताओं की निरंतर हिरासत भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित स्वतंत्रता के अधिकार का घोर उल्लंघन है।"

यह टिप्पणी आदेश की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक टिप्पणियों में से एक मानी जा रही है, क्योंकि अदालत ने लंबे समय तक विचाराधीन कैद और धीमे ट्रायल को सीधे अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़ते हुए राहत प्रदान की।

इन निष्कर्षों के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों याचिकाकर्ताओं को जमानत देने का निर्देश जारी किया। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट अपने विवेक से उपयुक्त शर्तें निर्धारित करेगा और उन्हीं शर्तों के अधीन दोनों आरोपियों को दिल्ली स्पेशल सेल की एफआईआर संख्या 54/2011 में जमानत पर रिहा किया जाए।

हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह राहत केवल उसी स्थिति में लागू होगी जब वे किसी अन्य मामले में वांछित या आवश्यक न हों।

'यह आदेश मुकदमे के गुण-दोष पर टिप्पणी नहीं'

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट शब्दों में कहा कि:

"इस आदेश में की गई टिप्पणियां केवल वर्तमान जमानत याचिकाओं के निर्णय तक सीमित हैं और इन्हें ट्रायल कोर्ट में लंबित मुकदमे के गुण-दोष पर किसी भी प्रकार की राय नहीं माना जाएगा।"

पीठ ने दोनों आरोपियों को निर्देश दिया कि वे ट्रायल की पूरी प्रक्रिया में लगातार सहयोग करेंगे। अदालत ने यह भी कहा कि यदि ट्रायल कोर्ट या अभियोजन पक्ष को भविष्य में यह प्रतीत होता है कि आरोपी जानबूझकर मुकदमे में देरी कर रहे हैं, सुनवाई में सहयोग नहीं कर रहे हैं या जमानत की स्वतंत्रता का किसी प्रकार से दुरुपयोग कर रहे हैं, तो अभियोजन पक्ष इस संबंध में पुनः सर्वोच्च न्यायालय का ध्यान आकर्षित कर सकता है और उपयुक्त आदेश की मांग कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय तक विचाराधीन कैद और धीमे ट्रायल को सीधे अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़ते हुए आरोपियों को राहत प्रदान की।
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