
कोच्चि- केरल हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह केरल राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) की महिला बस कंडक्टरों के लिए वेतन सहित पीरियड अवकाश की मांग पर तीन महीने के भीतर निर्णय ले। अदालत ने कहा कि मासिक धर्म अवकाश महिलाओं के स्वास्थ्य, गरिमा और मानवीय कार्य परिस्थितियों से जुड़ा एक प्रगतिशील कल्याणकारी कदम है, जिस पर सरकार उचित नीति बनाने पर विचार कर सकती है।
यह आदेश जस्टिस विजू अब्राहम ने KSRTC की तीन महिला कंडक्टरों आशा एसएस, श्रीना एस और सजाला एम के साथ कर्मचारियों के संगठन फोरम फॉर जस्टिस (FFJ) एवं 'KSRTC एम्प्लॉइज एंड फैमिली वेलफेयर सोसाइटी' द्वारा दायर याचिका [Asha SS & ors v State of Kerala & ors] पर सुनवाई करते हुए दिया।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि KSRTC की महिला कंडक्टरों को रोज़ाना 8 से 16 घंटे तक लगातार ड्यूटी करनी पड़ती है। भीड़भाड़ वाली बसों में लगातार चलकर टिकट जारी करना और किराया वसूलना उनके काम का हिस्सा है। मासिक धर्म के दौरान यह कार्य और भी कठिन हो जाता है।
याचिका में कहा गया कि कई डिपो में स्वच्छ शौचालय, पानी, आराम करने की जगह और सेनेटरी उत्पादों के सुरक्षित निस्तारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, जिससे महिलाओं को शारीरिक असुविधा, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, KSRTC के संचालन विभाग में लगभग 3,000 महिला कर्मचारी कार्यरत हैं।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि कर्नाटक सरकार ने नवंबर 2025 में 18 से 52 वर्ष की आयु की सरकारी और निजी क्षेत्र की महिला कर्मचारियों के लिए हर महीने एक दिन का वेतन सहित मासिक धर्म अवकाश घोषित किया है। उन्होंने यह भी कहा कि बिहार और ओडिशा में भी ऐसी व्यवस्था मौजूद है।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि केरल में विभिन्न विश्वविद्यालयों की छात्राओं के लिए मासिक धर्म अवकाश की नीति लागू है, लेकिन यह सुविधा अभी तक सरकारी कर्मचारियों और KSRTC की महिला कर्मचारियों को नहीं दी गई है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मासिक धर्म अवकाश महिलाओं पर मासिक धर्म के शारीरिक और मानसिक प्रभाव को स्वीकार करने वाला एक प्रगतिशील कल्याणकारी उपाय है।
अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21, अनुच्छेद 15(3) और अनुच्छेद 42 की भावना के अनुरूप है, जो महिलाओं की गरिमा और न्यायसंगत एवं मानवीय कार्य परिस्थितियों के संरक्षण का समर्थन करते हैं।
न्यायालय ने यह भी माना कि महिला कंडक्टरों का कार्य लंबे समय तक खड़े रहने, लगातार चलने, लंबी ड्यूटी और स्वच्छ शौचालयों की सीमित उपलब्धता के कारण शारीरिक रूप से अत्यधिक चुनौतीपूर्ण है। ऐसे में गंभीर मासिक धर्म संबंधी तकलीफें उनके स्वास्थ्य, गरिमा और कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकती हैं।
हालांकि हाईकोर्ट ने स्वयं पीरियड लीव लागू करने का आदेश नहीं दिया, लेकिन राज्य सरकार से कहा कि वह महिला कंडक्टरों के कार्य की प्रकृति और परिस्थितियों को देखते हुए उचित शर्तों और सुरक्षा उपायों के साथ मासिक धर्म अवकाश नीति लागू करने पर विचार कर सकती है।
अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा 30 अक्टूबर 2025 को दिए गए प्रतिनिधित्व पर तीन महीने के भीतर निर्णय लिया जाए। आदेश पारित करने से पहले याचिकाकर्ताओं और KSRTC दोनों को सुनवाई का अवसर भी दिया जाएगा।
(हाईकोर्ट आदेश स्त्रोत: बार एंड बेंच)
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