
दिल्ली- "मेरा कसूर सिर्फ इतना था कि मैं जंतर-मंतर पर बैठे छात्रों और उनके परिजनों को खाना और पानी उपलब्ध कराने में मदद कर रहा था।" इसी आरोप के साथ उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद निवासी जुनैद मलिक ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने प्रोफेसर मनोज कुमार झा द्वारा दायर रिट याचिका (क्रिमिनल) संख्या 283/2026 में हस्तक्षेप याचिका दाखिल करते हुए आरोप लगाया है कि शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन में भोजन वितरण करने की वजह से उन्हें और उनके परिवार को पुलिस की कथित प्रताड़ना का सामना करना पड़ा।
याचिका में जुनैद ने स्वयं को कानून स्नातक और सामाजिक कार्यकर्ता बताया है। उन्होंने कहा कि वे 20 जून से लगभग 35 दिनों तक जंतर-मंतर पर चल रहे NEET-UG 2026 आंदोलन में स्वयंसेवक के रूप में भोजन और पानी की व्यवस्था में लगे रहे। उनका कहना है कि वे आंदोलन के आयोजकों या नेतृत्व का हिस्सा नहीं थे, बल्कि केवल छात्रों और आम लोगों को भोजन उपलब्ध कराने का काम कर रहे थे। इसी भूमिका के कारण मीडिया में उनकी पहचान बनी और बाद में वे पुलिस कार्रवाई के निशाने पर आ गए।
याचिका के अनुसार, 24 जुलाई की रात लगभग 10:50 बजे जुनैद को कुत्ते ने काट लिया था। इलाज के लिए वे अपने एक मित्र के साथ डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल गए, जहां उन्हें एंटी-रेबीज इंजेक्शन लगाया गया। आधी रात के करीब अस्पताल से लौटते समय उन्होंने जंतर-मंतर जाने के लिए ऑटो लिया, लेकिन कुछ ही दूरी पर बिना नंबर प्लेट वाली एक सफेद स्कॉर्पियो ने ऑटो को रोक लिया। जुनैद का आरोप है कि 4-5 पुलिसकर्मियों ने उन्हें और उनके साथी को जबरन वाहन में बैठाया, सिर झुकाने और आंखों पर पट्टी बांधने के लिए मजबूर किया तथा करीब आधे घंटे तक अज्ञात स्थान पर ले गए। रास्ते में उनके मोबाइल फोन छीन लिए गए, पासवर्ड खुलवाकर उनका पूरा डेटा खंगाला गया।
जुनैद का कहना है कि उन्हें एक इमारत की दूसरी मंजिल पर बने पूछताछ कक्ष में पूरी रात रखा गया। अगले दिन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने उनसे बार-बार यही पूछा कि आंदोलन में भोजन का पैसा कहां से आता है, किसने फंडिंग की है और इसके पीछे कौन लोग हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि पूछताछ के दौरान उन्हें अपमानजनक भाषा में गालियां दी गईं और कई तरह की धमकियां भी दी गईं। कथित तौर पर अधिकारियों ने कहा कि यदि आंखों की पट्टी हट गई तो रिहाई की उम्मीद खत्म हो जाएगी, आंदोलन में दोबारा दिखाई दिए तो शौचालय जाने का वीडियो वायरल कर दिया जाएगा, अगली बार राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगा दिया जाएगा और "उत्तर प्रदेश से हो, ज्यादा इधर-उधर करोगे तो सीधे ऊपर पहुंचा देंगे।"
याचिका में आगे दावा किया गया है कि लगभग साढ़े ग्यारह बजे उन्हें यह कहकर दूसरी गाड़ी में बैठाया गया कि घर छोड़ा जा रहा है। लेकिन करीब पांच से छह घंटे तक लगातार वाहन चलाने के बाद पुलिसकर्मी उन्हें देहरादून-मसूरी रोड से लगभग 16 किलोमीटर दूर एक जंगलनुमा इलाके में ले गए। वहां उनसे पहाड़ों की ओर मुंह करके खड़े रहने को कहा गया और पुलिस उन्हें वहीं छोड़कर चली गई। मोबाइल फोन वापस करते हुए कथित तौर पर निर्देश दिया गया कि एक घंटे तक फोन चालू नहीं करना है। इसके बाद दोनों किसी तरह देहरादून पहुंचे और वहां से टैक्सी लेकर दिल्ली लौटे।
जुनैद ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि पुलिस कार्रवाई केवल उन्हीं तक सीमित नहीं रही बल्कि पूरे परिवार को दबाव में लेने की कोशिश की गई। उनके अनुसार 23 जुलाई को उनके पिता को गाजियाबाद स्थित घर से उठाकर मसूरी थाने ले जाया गया, जहां कई घंटों तक पूछताछ की गई। उनसे पूरे परिवार के बैंक खातों की जानकारी मांगी गई और यह पूछा गया कि जुनैद कहां हैं। पुलिस अधिकारियों ने कथित तौर पर उन्हें बताया कि उनका बेटा "राष्ट्र-विरोधी तत्वों" के साथ आंदोलन कर रहा है। शाम तक पूछताछ के बाद उन्हें छोड़ा गया।
याचिका के मुताबिक अगले ही दिन 10 से 12 पुलिसकर्मियों की एक टीम जुनैद के घर पहुंची। आरोप है कि तलाशी के दौरान बिस्तर तोड़े गए, अलमारियां जबरन खोली गईं और परिवार के सभी सदस्यों के बैंक खाते तथा पहचान संबंधी दस्तावेज मांगे गए। परिवार ने पुलिस टीम में शामिल दो अधिकारियों की पहचान प्रमोद कुमार और टिंकू त्यागी के रूप में की है।
जुनैद ने यह भी आरोप लगाया कि उसी दिन उनकी विवाहित बहन के मेरठ स्थित घर पर भी दूसरी पुलिस टीम पहुंची। वहां से उनके बहनोई और ससुर को उठाकर थाने ले जाया गया और कई घंटों तक पूछताछ के बाद वकीलों के हस्तक्षेप से छोड़ा गया। याचिका के अनुसार, पूरे परिवार पर लगातार यह दबाव बनाया गया कि वे जुनैद को आंदोलन छोड़ने के लिए कहें, उन्हें घर बुलाएं और आंदोलन की कथित फंडिंग के बारे में जानकारी दें।
सुप्रीम कोर्ट में दायर आवेदन में जुनैद ने आरोप लगाया है कि उन्हें और उनके परिवार को बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के हिरासत में रखा गया। न तो कोई गिरफ्तारी मेमो बनाया गया, न कोई डिटेंशन मेमो, न ही कोई जनरल डायरी एंट्री दर्ज की गई। उनका कहना है कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता का गंभीर उल्लंघन है। आवेदन में उन्होंने डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, मनेका गांधी, अनिता ठाकुर, रामलीला मैदान प्रकरण और मजदूर किसान शक्ति संगठन सहित कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा है कि शांतिपूर्ण विरोध और नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा करना राज्य का संवैधानिक दायित्व है।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि उन्हें मुख्य याचिका में हस्तक्षेप की अनुमति दी जाए, उनके और उनके परिवार के खिलाफ किसी भी प्रकार की दमनात्मक कार्रवाई पर रोक लगाई जाए तथा कथित अवैध हिरासत, परिवार को धमकाने और पुलिस अधिकारियों की भूमिका की स्वतंत्र जांच कर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
(याचिका कॉपी स्त्रोत: लाइव लॉ )
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