कमज़ोर होती सेहत पर हौसले बुलंद : JNU में 16 दिन से अनशन पर 7 छात्र, अब राष्ट्रपति तक पहुंची गुहार | TM Special

अदिति, गोपिका, धनंजय समेत 7 छात्र अनशन पर; मांगपत्र में रस्टिकेशन रद्द करने, JNUEE और GSCASH की बहाली से लेकर हॉस्टल सुधार तक 13 मांगें
एक ओर छात्र 13 मांगों पर ठोस बातचीत और खासकर रस्टिकेशन व CPO मैनुअल की वापसी पर अड़े हैं, दूसरी ओर प्रशासन की ओर से अब तक कोई औपचारिक समाधान सामने नहीं आया है।
छात्रों ने 3 अक्टूबर को अधिकार मार्च का आह्वान किया था, जो अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल में बदल गया हड़ताल पर बैठे छात्रों की सेहत लगातार बिगड़ रही है। द मूकनायक (स्पेशल अरेंजमेंट)
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नई दिल्ली- जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) परिसर में जेएनयू छात्रसंघ (JNUSU) के पदाधिकारियों और अन्य छात्रों की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल 16 दिन पूरे कर चुकी है। 3 अक्टूबर को "अधिकार मार्च" से शुरू हुआ यह आंदोलन अब अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल का रूप ले चुका है। छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन उनकी बुनियादी मांगों पर गंभीर बातचीत करने को तैयार नहीं है। हड़ताल पर बैठे छात्रों की सेहत लगातार बिगड़ रही है। इसी बीच राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर मामले में तत्काल हस्तक्षेप की अपील की है।

द मूकनायक से बातचीत में अनशन पर बैठे छात्र धनंजय ने बताया कि हड़ताल का आज 16वां दिन है और इस समय सात साथी भूख हड़ताल पर बैठे हैं। इनमें JNUSU की अध्यक्ष अदिति, उपाध्यक्ष गोपिका, काउंसलर गुलाम वारिश, तनुज, अभिनव और सुमन शामिल हैं। इनके अलावा असलम और मृण्मयी भी पिछले कुछ दिनों से इस हड़ताल में शामिल हो गए हैं। बातचीत के दौरान धनंजय की आवाज़ में कमज़ोरी साफ़ महसूस हो रही थी, लेकिन उनका संकल्प उतना ही मज़बूत है।

छात्रों ने 3 अक्टूबर को 'अधिकार मार्च' का आह्वान किया था, जो अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल में बदल गया। छात्रों से 3 अक्टूबर की रात 9 बजे गंगा ढाबा पर जुटने की अपील की गई थी। इसी पर्चे में JNUSU छात्रसंघ के नाम से 13 मांगें दर्ज हैं।

 JNUSU छात्रसंघ के हडताली स्टूडेंट्स की मांगें
JNUSU छात्रसंघ के हडताली स्टूडेंट्स की मांगें स्पेशल अरेंजमेंट

मांगपत्र में क्या है

JNUSU के मांगपत्र में कुल 13 मांगें हैं। पहली मांग है कि CPO (चीफ प्रॉक्टर ऑफिस) मैनुअल वापस लिया जाए और JNUSU पदाधिकारियों का रस्टिकेशन, यानी निष्कासन, रद्द किया जाए। दूसरी मांग है कि यौन उत्पीड़न के मामलों को देखने वाली समिति GSCASH को बहाल किया जाए, और तीसरी मांग JNUEE, यानी जेएनयू प्रवेश परीक्षा, की बहाली की है। चौथी मांग में छात्रों ने बराक हॉस्टल में मेस और वाई-फाई की सुविधा सुनिश्चित करने को कहा है।

पांचवीं मांग इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार से जुड़ी है, जिसमें हॉस्टलों का नवीनीकरण, लाइब्रेरी में बैठने की क्षमता बढ़ाना, कावेरी, पेरियार और गोदावरी हॉस्टल में 24x7 लिफ्ट और उसका सुचारु संचालन, TEFLAS का नवीनीकरण, सभी सड़कों की मरम्मत, स्टेडियम का नवीनीकरण, जेंडर-न्यूट्रल वॉशरूम और स्वास्थ्य केंद्रों में सुधार शामिल हैं। छठी मांग मेस बिलों के ऑडिट, MCM (मेरिट-कम-मीन्स स्कॉलरशिप) की राशि बढ़ाने और SoE के छात्रों को भी MCM में शामिल करने की है। सातवीं मांग में EOC (समान अवसर प्रकोष्ठ) में रोहित एक्ट के अनुरूप सुधार और उसके वार्षिक ऑडिट की बात कही गई है। आठवीं मांग सिद्धांता नॉलेज फाउंडेशन को हटाने की है।

नौवीं मांग में JNUSU फंड बहाल करने और अकादमिक परिषदों में छात्र प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने को कहा गया है। दसवीं मांग सभी छात्रों को हॉस्टल देने और PhD जमा करने तक हॉस्टल आवास की गारंटी की है, साथ ही हॉस्टल आवंटन में आरक्षण का उचित पालन भी मांगा गया है। ग्यारहवीं मांग IQAC और कुमारस्वामी द्वारा की गई भर्ती में कथित भ्रष्टाचार की जांच की है। बारहवीं मांग है कि SOE, MBA, महानदी और मैरिड हॉस्टल की फीस JNU के मानक के अनुसार रखी जाए। तेरहवीं और अंतिम मांग आरक्षित सीटें लागू करने और ट्रांसजेंडर छात्रों के लिए आवास की व्यवस्था करने की है।

हमारी मुख्य मांग JNUSU पदाधिकारियों का रस्टिकेशन वापस लेने की है क्योंकि ये जेएनयू के छात्रों के मैंडेट से जीत कर आए हैं और हमारी लड़ाई लोकतंत्र बचाने की है।
धनंजय

'UGC की समानता नियमावली "रोहित एक्ट" के रूप में लागू हो'

धनंजय ने अपनी मुख्य मांगों को विस्तार से रखते हुए कहा कि सबसे पहली और अहम मांग JNUSU के निष्कासन (रस्टिकेशन) को वापस लेने की है। उनके मुताबिक यह छात्रों का लोकतांत्रिक अधिकार है, क्योंकि ये प्रतिनिधि पूरे जेएनयू के छात्रों के जनादेश से जीतकर आए थे। उन्होंने मांग की कि JNUEE की वापसी हो और उसी के आधार पर दाखिले दिए जाएं। धनंजय का आरोप है कि NTA जैसी एजेंसी पेपर लीक कराकर RSS-भाजपा के रिश्तेदारों तक पेपर पहुंचाती है। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि JNUEE में 90 अंक लिखित परीक्षा के और 10 अंक इंटरव्यू के हों, ताकि वंचित तबकों से आने वाले छात्रों के साथ भेदभाव न हो। उनके अनुसार अभी NTA 70 के परसेंटाइल को आधार बनाता है और 30 अंक इंटरव्यू के लिए रखता है।

सामाजिक न्याय के सवाल पर उन्होंने कहा कि UGC की समानता संबंधी नियमावली (equality regulations) को "रोहित एक्ट" के रूप में लागू किया जाए, ताकि OBC, SC और ST छात्रों को संबंधित समिति में भागीदारी मिल सके, क्योंकि कैंपस में इन वर्गों के छात्रों को जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ता है। निजीकरण का मुद्दा उठाते हुए धनंजय ने आरोप लगाया कि जेएनयू में निजीकरण की कोशिशें हो रही हैं, जिसके लिए सिद्धांता नॉलेज फाउंडेशन को परिसर में लाया गया है और वीडियो लेक्चर के ज़रिए कक्षाएं शुरू कराने की योजना बन रही है। उन्होंने इसे कैंपस को खत्म करने की साज़िश बताया।

महिला सुरक्षा पर उन्होंने मांग की कि इंटरनल कंप्लेंट कमेटी (ICC) को हटाकर GSCASH को बहाल किया जाए, जो विश्वविद्यालय में यौन उत्पीड़न के मामलों को देखती है और महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाई गई थी। उनका कहना है कि ICC में छात्र प्रतिनिधियों की भागीदारी बेहद कम है। परिसर की बदहाली की ओर ध्यान दिलाते हुए धनंजय ने कहा कि हॉस्टलों का इंफ्रास्ट्रक्चर जर्जर हो चुका है और कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है, इसलिए इसे तुरंत दुरुस्त किया जाए। उन्होंने यह भी बताया कि बराक हॉस्टल में अब तक मेस और वाई-फाई की सुविधा नहीं लगाई गई है।

सांसद जॉन ब्रिटास ने राष्ट्रपति को याद दिलाई विज़िटर की शक्तियां

भूख हड़ताल के 16वें दिन राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर मामले में तत्काल हस्तक्षेप का अनुरोध किया है। "माननीय राष्ट्रपति जी" को संबोधित इस पत्र का विषय है, “JNU छात्रों की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल: तत्काल हस्तक्षेप का अनुरोध।” ब्रिटास ने लिखा है कि JNUSU प्रतिनिधियों और अन्य छात्रों की यह भूख हड़ताल 3 अक्टूबर 2026 से जारी है और आज इस "अत्यंत शांतिपूर्ण विरोध" का सोलहवां दिन है। उनके अनुसार विश्वविद्यालय प्रशासन छात्र समुदाय की वास्तविक और दीर्घकालिक चिंताओं का समाधान करने में विफल रहा है। इसी वजह से यह आंदोलन जारी है और हड़ताल में शामिल छात्रों की सेहत बिगड़ रही है, जिससे तत्काल हस्तक्षेप की स्थिति पैदा हो गई है।

पत्र में पूर्व JNUSU अध्यक्ष सहित निर्वाचित छात्रसंघ प्रतिनिधियों के लगभग आठ महीने से जारी निष्कासन पर गंभीर चिंता जताई गई है। ब्रिटास का कहना है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों को विश्वविद्यालय से बाहर रखने से छात्रसंघ का कामकाज सीधे प्रभावित होता है और छात्रों के सामूहिक रूप से अपनी शिकायतें रखने का तंत्र कमज़ोर पड़ता है। उन्होंने चीफ प्रॉक्टर ऑफिस (CPO) मैनुअल के लगातार लागू रहने पर भी आपत्ति जताई है। उनके अनुसार इसमें विभिन्न प्रकार के विरोध और जमावड़ों पर भारी जुर्माने और कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान है, जो विश्वविद्यालय में वैध लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति की जगह को सीमित करता है।

अपने छात्र जीवन का ज़िक्र करते हुए ब्रिटास ने लिखा कि उन्होंने भी JNU में बहस, चर्चा और लोकतांत्रिक गतिविधियों में हिस्सा लिया है, इसलिए वे ऐसे माहौल को बचाए रखने का महत्व समझते हैं जहां छात्र स्वतंत्र रूप से अपनी बात रख सकें, मनमाने फैसलों पर सवाल उठा सकें और सामूहिक रूप से अपनी चिंताएं उठा सकें। उन्होंने चिंता जताई कि अनुपातहीन अनुशासनात्मक कदम इस जगह को सीमित कर सकते हैं और छात्र दंडात्मक कार्रवाई के डर से जायज़ शिकायतें उठाने से हिचक सकते हैं। पत्र के अनुसार इसका असर सिर्फ सीधे प्रभावित लोगों तक सीमित नहीं रहता, खासकर तब जब लैंगिक न्याय, समान अवसर, प्रवेश प्रक्रिया और बुनियादी कैंपस सुविधाओं से जुड़े मुद्दे अनसुलझे पड़े हैं। ब्रिटास ने कहा कि यह गतिरोध अब गंभीर रूप ले चुका है, खासकर हड़ताल में शामिल छात्रों की सेहत और सुरक्षा के खतरे को देखते हुए।

कानूनी आधार की बात करते हुए ब्रिटास ने याद दिलाया कि JNU की स्थापना संसद द्वारा पारित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय अधिनियम, 1966 के तहत हुई है। इस अधिनियम में सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक जीवन पद्धति को विश्वविद्यालय के बुनियादी सिद्धांतों में गिना गया है। अधिनियम राष्ट्रपति को विश्वविद्यालय का विज़िटर नामित करता है और उन्हें कामकाज की समीक्षा करने तथा उचित निर्देश जारी करने की शक्तियां देता है।

इन्हीं परिस्थितियों में उन्होंने राष्ट्रपति से अनुरोध किया है कि वे JNU अधिनियम की धारा 8 के तहत विज़िटर को मिली शक्तियों का प्रयोग करते हुए छात्रसंघ प्रतिनिधियों के निष्कासन आदेश रद्द कराएं, CPO मैनुअल के आपत्तिजनक प्रावधान वापस करवाएं और छात्रों की लंबित शिकायतों का शीघ्र समाधान सुनिश्चित करें।

एक ओर छात्र 13 मांगों पर ठोस बातचीत और खासकर रस्टिकेशन व CPO मैनुअल की वापसी पर अड़े हैं, दूसरी ओर प्रशासन की ओर से अब तक कोई औपचारिक समाधान सामने नहीं आया है।
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JNU विवाद की पृष्ठभूमि: रस्टिकेशन से हड़ताल तक

इस साल फरवरी में JNU प्रशासन ने JNUSU के चार पदाधिकारियों समेत पांच PhD छात्रों को निष्कासित किया था। इन्हें डॉ. बी.आर. आंबेडकर केंद्रीय पुस्तकालय के फेशियल रिकग्निशन गेटों में तोड़फोड़ का दोषी पाया गया था, और दो सेमेस्टर के लिए पूरे कैंपस से "आउट ऑफ बाउंड्स" घोषित कर प्रत्येक पर 20,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया। निष्कासित किए गए छात्रों में अध्यक्ष अदिति मिश्रा और उपाध्यक्ष गोपिका के. बाबू भी शामिल थे। JNUSU ने इस कार्रवाई को छात्रों की आवाज़ दबाने की कोशिश बताया था।

हाल ही में एक और घटनाक्रम सामने आया है। 9 अक्टूबर की तारीख वाले एक नोटिस में अदिति मिश्रा को 22 अक्टूबर को प्रॉक्टोरियल कमेटी के सामने पेश होने को कहा गया है। इसमें सितंबर में सुरक्षाकर्मियों से कथित दुर्व्यवहार और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का आरोप है। यह नोटिस भूख हड़ताल के दौरान जारी हुआ है।

16 अक्टूबर को JNUSU ने दावा किया कि कुलपति शांतिश्री धूलिपुडी पंडित पहली बार भूख हड़ताल स्थल पर आईं, लेकिन उन्होंने निष्कासित छात्रों से बात करने से इनकार कर दिया। छात्रसंघ के अनुसार अध्यक्ष अदिति मिश्रा ने बताया कि कुलपति ने प्रदर्शनकारियों से कहा कि उनकी मांगें पूरी हो चुकी हैं और उन्हें हड़ताल खत्म कर देनी चाहिए। JNUSU का कहना है कि वह "परिपक्व, ईमानदार और व्यापक बातचीत" के लिए तैयार है, लेकिन प्रशासन प्रक्रिया को टाल रहा है।

हड़ताल के 16 दिन पूरे होने के बावजूद गतिरोध बना हुआ है। एक ओर छात्र 13 मांगों पर ठोस बातचीत और खासकर रस्टिकेशन व CPO मैनुअल की वापसी पर अड़े हैं, दूसरी ओर प्रशासन की ओर से अब तक कोई औपचारिक समाधान सामने नहीं आया है। छात्रों की बिगड़ती सेहत और एक सांसद की ओर से राष्ट्रपति तक पहुंची अपील के बाद अब सबकी नज़रें इस पर टिकी हैं कि क्या विज़िटर के स्तर पर कोई हस्तक्षेप होता है।

एक ओर छात्र 13 मांगों पर ठोस बातचीत और खासकर रस्टिकेशन व CPO मैनुअल की वापसी पर अड़े हैं, दूसरी ओर प्रशासन की ओर से अब तक कोई औपचारिक समाधान सामने नहीं आया है।
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