
वर्धा/महाराष्ट्र - महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के छात्र-छात्राओं एवं शोधार्थियों ने आज विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा लंबे समय से शैक्षणिक मांगों की लगातार उपेक्षा किए जाने के विरोध में प्रशासनिक भवन के समक्ष अनिश्चितकालीन सत्याग्रह प्रारंभ कर दिया। छात्रों का कहना है कि यह आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय के शैक्षणिक भविष्य, शोध संस्कृति तथा विद्यार्थियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए है।
छात्रों ने बताया कि पिछले कई वर्षों से वे वर्ष 2022 से बंद पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया को पुनः प्रारंभ करने, स्त्री अध्ययन विभाग एवं फ़िल्म अध्ययन विभाग को वर्धा मुख्य परिसर में पुनः स्थापित करने तथा पूर्व की भाँति बंद किए गए डिप्लोमा कार्यक्रमों को पुनः शुरू करने की मांग कर रहे हैं। इस संबंध में कुलपति एवं विश्वविद्यालय प्रशासन को अनेक आवेदन, ज्ञापन तथा सैकड़ों विद्यार्थियों के हस्ताक्षरों सहित मांग-पत्र सौंपे गए, किंतु आज तक कोई ठोस, समयबद्ध और सार्वजनिक निर्णय नहीं लिया गया।
छात्रों का कहना है कि वर्ष 2022 से पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया बंद होने के कारण देशभर के सैकड़ों विद्यार्थियों और शोधार्थियों के उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अवसर प्रभावित हुए हैं। इससे न केवल विद्यार्थियों का शैक्षणिक भविष्य प्रभावित हुआ है, बल्कि विश्वविद्यालय की शोध संस्कृति, अकादमिक वातावरण और राष्ट्रीय प्रतिष्ठा पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय में वर्षों तक पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया बंद रहना उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
छात्रों ने कहा कि वर्ष 2022 में स्त्री अध्ययन विभाग को वर्धा मुख्य परिसर से इलाहाबाद परिसर स्थानांतरित कर दिया गया। छात्रों का दावा है कि स्थानांतरण के बाद विभाग में छात्र संख्या लगातार अत्यंत कम रही है तथा वर्तमान शैक्षणिक सत्र में भी केवल एक छात्र ने प्रवेश लिया है, जबकि विभाग में पाँच शिक्षकों की नियुक्ति है। छात्रों का कहना है कि इससे उपलब्ध संसाधनों के प्रभावी उपयोग तथा प्रशासनिक प्राथमिकताओं को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
छात्रों ने यह भी कहा कि वर्ष 2022 से पहले वर्धा परिसर में इस विभाग में सामान्यतः 25 से 30 विद्यार्थियों का नामांकन होता था। उनके अनुसार, विभाग को मुख्य परिसर से हटाए जाने के कारण महिला अध्ययन जैसे महत्वपूर्ण विषय की शैक्षणिक गतिविधियाँ गंभीर रूप से प्रभावित हुई हैं।
उन्होंने कहा कि स्त्री अध्ययन विभाग केवल महिलाओं से संबंधित अध्ययन का विभाग नहीं है, बल्कि संविधान, लैंगिक समानता, सामाजिक न्याय, महिला अधिकार, मानवाधिकार, शिक्षा, श्रम, ग्रामीण समाज तथा लोकतांत्रिक मूल्यों के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। ऐसे समय में, जब देशभर के विश्वविद्यालय जेंडर स्टडीज़ और महिला अध्ययन को सुदृढ़ कर रहे हैं, गांधी के नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय के मुख्य परिसर में इस विभाग का निष्क्रिय होना अत्यंत चिंताजनक है।
छात्रों ने यह भी कहा कि महात्मा गांधी ने महिलाओं की शिक्षा, सम्मान, समान भागीदारी और स्वावलंबन को राष्ट्र निर्माण का आधार माना था। उनकी कर्मभूमि वर्धा में स्थित विश्वविद्यालय में स्त्री अध्ययन विभाग का निष्क्रिय होना गांधी के विचारों और विश्वविद्यालय की स्थापना के मूल उद्देश्यों के अनुरूप प्रतीत नहीं होता।
छात्रों ने कहा कि विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा स्वयं एक वरिष्ठ महिला शिक्षाविद् हैं। ऐसे में विद्यार्थियों को उनसे यह स्वाभाविक अपेक्षा थी कि वे स्त्री अध्ययन विभाग को पुनः वर्धा मुख्य परिसर में सक्रिय करने की दिशा में प्राथमिकता के आधार पर पहल करेंगी। किंतु अब तक इस विषय में कोई ठोस प्रशासनिक निर्णय सामने नहीं आया है, जिससे विद्यार्थियों में निराशा और असंतोष व्याप्त है। छात्रों ने कुलपति से आग्रह किया कि वे इस विषय पर शीघ्र सकारात्मक निर्णय लेकर विश्वविद्यालय की शैक्षणिक एवं वैचारिक प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करें।
छात्रों का कहना है कि फ़िल्म अध्ययन विभाग मीडिया, पत्रकारिता, डिजिटल कंटेंट, डॉक्यूमेंट्री निर्माण, पटकथा लेखन, ओटीटी, दृश्य संस्कृति तथा रचनात्मक उद्योगों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अंतर्विषयी विभाग है। इसका बंद होना विद्यार्थियों के कौशल विकास, रोजगार और शोध के अवसरों को सीमित करता है।
इसी प्रकार, विश्वविद्यालय द्वारा पूर्व में संचालित अनेक डिप्लोमा कार्यक्रमों के बंद होने से हजारों विद्यार्थियों के लिए अल्पकालिक, कौशल-आधारित तथा रोजगारोन्मुखी शिक्षा के अवसर समाप्त हो गए हैं। छात्रों का कहना है कि यह स्थिति विश्वविद्यालय की बहुविषयी शिक्षा की अवधारणा के विपरीत है।
छात्रों का कहना है कि उन्होंने कुलपति एवं अन्य प्रशासनिक अधिकारियों से अनेक बार लिखित रूप में संवाद स्थापित करने का प्रयास किया, किंतु उनकी मांगों पर कोई ठोस पहल नहीं हुई। जब आवेदन, ज्ञापन और शांतिपूर्ण संवाद के सभी प्रयास निष्फल रहे, तब उन्होंने भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए अनिश्चितकालीन सत्याग्रह प्रारंभ करने का निर्णय लिया।
छात्रों ने स्पष्ट किया कि उनका आंदोलन पूरी तरह अहिंसक, लोकतांत्रिक और संवैधानिक है तथा यह महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांतों से प्रेरित है। छात्रों के आंदोलन को रोकने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन ने प्रशासनिक भवन के सभी प्रवेश द्वार बंद कर दिए हैं। इसके कारण छात्रों तथा कर्मचारियों की प्रशासनिक भवन में आवाजाही पूरी तरह बाधित हो गई है।
1. वर्ष 2022 से बंद पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया तत्काल पुनः प्रारंभ की जाए।
2. स्त्री अध्ययन विभाग को वर्धा मुख्य परिसर में पुनः स्थापित किया जाए।
3. फ़िल्म अध्ययन विभाग को वर्धा मुख्य परिसर में पुनः संचालित किया जाए।
4. बंद किए गए सभी डिप्लोमा एवं प्रमाणपत्र कार्यक्रम शैक्षणिक सत्र 2026–27 से पुनः प्रारंभ किए जाएँ।
5. इन सभी मांगों पर विश्वविद्यालय प्रशासन समयबद्ध एवं लिखित निर्णय सार्वजनिक करे।
छात्रों ने कहा कि जब तक उनकी न्यायोचित शैक्षणिक मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक उनका अनिश्चितकालीन सत्याग्रह जारी रहेगा। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन से पुनः अपील की कि गांधी की कर्मभूमि वर्धा में संवाद, संवेदनशीलता और शैक्षणिक उत्तरदायित्व की परंपरा को पुनर्जीवित किया जाए तथा विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़े इन महत्वपूर्ण प्रश्नों पर शीघ्र निर्णय लिया जाए।
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